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आदिवासी संस्कृति बचाने के लिए चोकटिया भुंजिया समुदाय की बैठक

चोकटिया भुंजिया समाज द्वारा ग्राम तेंदू, बाय स्थान बुद्धेश्वर नाथ धाम में बैठक स्थापित की गई थी जिसमें सात सर्कल के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, एवं सचिव उपस्थित थे। साथ ही समाज प्रमुख राजा जी, श्री दशरथ भुंजिया, श्री हीरऊ राम झारखंड, ग्वाल सिंह सोरी जी, श्री दुखीराम, श्री नाथूराम भुंजिया, पति राम भुंजिया और समाज के कार्यकर्ता गन उपस्थित थे।

बैठक मे उपस्थित सर्कल कार्यकर्ता और समाज प्रमुख


बैठक का एजेंडा

  1. महासभा की तैयारी

  2. भुंजिया विकास अभिकरण से संबंधित जानकारी

  3. भुंजिया समाज की बोली भाषा

  4. समाज के नियम कानून

  5. वन अधिकार से संबंधित वनों की कटाई पर रोक एवं पौधे लगाना

  6. शिक्षा पर ज़ोर

  7. गोत्र से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराना।

1 . महासभा की तैयारी


सात सर्कल के बुजुर्ग-सियानों द्वारा महासभा रखने की तैयारी की गई, जिसमें महिलाएँ, पुरुष एवं युवा-युवती भाग लेंगे।

2 . भुंजिया विकास अभिकरण


भुंजिया समाज को योजना के तहत भुंजिया विकास अभिकरण गरियाबंद से संचालित शासन प्रशासन की योजना अनुसार लाभ नही मिल रहा है, जिससे जंगल में रहने वाले आदिवासी मूलनिवासीयों को भारी तकलीफ़ का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए समाज के बुजुर्गों एवं युवाओं द्वारा शासन प्रशासन से लाभ लेने के लिए योजना तैयार प्रस्ताव पारित करने का निर्णय लिया गया है और केन्द्रीय शासन से जुड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

3. भुंजिया समाज की बोली भाषा – (भुंजिया समाज द्वारा निर्णय)


हमारे समाज की भाषा अलग है जो लुप्त होती जा रही है। आज के युवा-युवतियों को अपनी ही भाषा बोलने मे कठिनाइयों का सामना करना पड रहा है। ये बात समाज के लिए बड़े दुख की बात है। सब बुजुर्ग-सियानों ने इस बात पर विचार मंथन किया, तो यह बात सामने आई, कि घर में अब बुजुर्ग, या घर के मुखिया लोग ही अपनी भाषा में बात नहीं करते है, तो बच्चे कहां से सीखेंगे? समाज प्रमुखों द्वारा निर्णय लिया गया, कि सब लोग अपने-अपने घर में भुंजिया भाषा में बात करें, ताकि घर-परिवार के लोगों को बोलने में तकलीफ़ ना हो। तभी सब लोग सीख पायेंगे, और हमारे समाज की भाषा भी लुप्त नहीं होगी। समाज प्रमुखों द्वारा आदेश निर्देश दिया गया कि अपने समाज के लोगों को सिखाए और सीखें, अन्यथा भुंजिया समाज की बैठक में बोलने की अनुमति नहीं दी जाएगी।


4 . समाज के नियम कानून


समाज के रीति-रिवाज़ या नियम-कानून को समाज में सजोकर रखने के लिए, जो पुराने रीति-रिवाज़ चलते आ रहे हैं, उन्हें चलाएँगे क्योंकि वह पूर्वजों की देन है। उदाहरण के तौर पे, भुंजिया समाज में शादी-विवाह में रात भर गीत गाते हैं। दिनवारी द्वारा मऊर बनवाना, पुतले को मिलता मारना, तीर कमान चलाना, मंद तरपनी, तेल-हल्दी चढ़ाना, हल्दी खेलना, वर और वधू का उपवास करना, पेड़-पौधों की पूजा करना, लड़का पक्ष से लड़की पक्ष को श्रिंगार देना, रात भर गीत गाकर नाचना, जिसे मडवा जागरण कहते हैं, जिससे एक दूसरे को गीत के माध्यम से जोड़ते हैं। इन सब से शादी में और भी रंग आ जाता है। फिर तो शादी के आनंद कुछ और ही है। देवी देवता का पूजा पाठ, डुमा सनम और ऐसे और भी बहुत से नियम है, जिसे समाज में सजोकर रखना है। ऐसा बुजुर्गों द्वारा विचार विमर्श कर प्रस्तावित किया गया।


5. वन अधिकार से संबंधित वृक्षों को काटने से रोक लगाना


अन्य समुदाय के लोग वन अधिकार पट्टा मांग कर जंगल को नुकसान कर रहे हैं, अर्थात पेड़-पौधे काट रहे हैं। उस पर रोक लगाना और अपनी ज़मीन पर लगे पेड़-पौधों को सुरक्षित रखने का प्रस्ताव रखा गया। वन अधिकार पट्टा के लालच में लोग पेड़-पौधों की अन्धाधुन कटाई कर देते हैं। जिससे हमारा ही नुकसान हो रहा है । और शासन कहता है कि आदिवासी लोग पेड़-पौधे काटते हैं। शासन अभी पता नहीं करता कि आदिवासी की आड़ में अन्य लोग मौके का फायदा उठाते हैं। बैठक ने निर्णय लिया कि अपनी ज़मीन के आस-पास कोई भाई पेड़-पौधे काटेगा तो उसको मना करना है।


6 . शिक्षा पर ज़ोर


हमारे भुंजिया समाज शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पीछे है, क्योंकि हमारे आदिवासी लोग जंगल पहाड़ में बसे रहते हैं। और उनके पालक शिक्षित नहीं हैं, इसलिए बच्चों को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है। इससे आधे रास्ते में जाकर बच्चा भटक जाता है। इसलिए सभी पालकों को अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए पढ़ाने की सूचना दी जाएगी। पढ़ाई लिखाई में कोई समस्या आने पर बच्चों को समाज के बीच रखने की बात करी ताकि उस समस्या का निवारण हो सके। इस तरह से बैठक मे शिक्षा के संबंध में चर्चा की गई।


7 . भुंजिया जाति के गोत्र से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराना


हमारे भुंजिया समाज में 21 गोत्र होते हैं और हर गोत्र की अलग-अलग पहचान है। हर गोत्र में अलग-अलग देवी-देवता पाए जाते है और उनके पूजा-पाठ अलग अलग तरीके से किए जाते है। हर गोत्र की माटी एवं गढ़ होते है और वहीं से उस गोत्र का अनमन-जन्मन होता है। जैसे कि बभंवर गढ़िया का अनमन-जन्मन इतिहास भंवरगढ़ से हुआ इसलिए उन्हें भंवरगढ़िया कहते हैं। उसी तरह से 21 गोत्र है और सबका अलग अलग इतिहास है। बुजुर्गों ने समाज में बात रखते हुए कहा की अपने-अपने गोत्र के रीति-रिवाज़ एवं देव माटी को समझना जरूरी है। इसके लिखित रूप में रजिस्टर बना कर समाज में रखा जाए, ताकि आने वाली पीढी इसे देख कर अपने इतिहास के बारे में जाने समझे। इस तरह से व्यवस्था बनाने का विचार विमर्श किया गया।


अंत में 3:00 बजे बुढ़ा देव का पूजा पाठ कर बैठक का समापन किया गया।


यह थी हमारे गाँव में एक बैठक के झलक। क्या आपके गाँव में आदिवासियों की समस्याएँ सुलझाने के लिए बैठक की जाती है?

लेखक के बारे में- खगेश्वर मरकाम छत्तीसगढ़ के मूल निवासी हैं। यह समाज सेवा के साथ खेती-किसानी भी करते हैं। खगेश का लक्ष्य है शासन-प्रशासन के लाभ आदिवासियों तक पहुंचाना। यह शिक्षा के क्षेत्र को आगे बढ़ाना चाहते हैं।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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