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ऐसे करते हैं छत्तीसगढ़ के आदिवासी औषधि के रूप में मुनगा पेड़ का उपयोग

नोट- यह आर्टिकल केवल जानकारी के लिए है, इसके ज़रिये किसी भी प्रकार का उपचार सुझाने की कोशिश नहीं है। यह आदिवासियों की पारंपारिक वनस्पति पर आधारित अनुभव है। कृपया आप इसका इस्तेमाल किसी डॉक्टर को पूछे बगैर ना करें। इस दवाई का सेवन करने के परिणाम के लिए लेखक किसी भी प्रकार की ज़िम्मेदारी नहीं लेता है।



गाँव क्षेत्रों में अनेक प्रकार के गुणों से संपन्न फल-फूल और पेड़ -पौधे पाए जाते हैं। दुनिया में जितने भी पेड़ पौधे हैं, उन सब का कुछ ना कुछ उपयोग तो होता ही है। हर पौधा, हर पेड़ अपने आप में एक औषधि होता है। हमें सिर्फ़ इन गुणों को जानने की जरूरत है।


भारत और दुनिया भर में कई आदिवासी समुदाय गाँव में निवास करते हैं, पहाड़ों ,पर्वतों और प्रकृति के बीच में रहते हैं और उन्हें इन औषधि के बारे में बढ़िया जानकारी होती है। हमारे गाँव के आदिवासी बहुत सारी बीमारीयों का इलाज अपने आस-पास पाए जाने वाले पेड़-पौधों से ही करते हैं। एक ऐसा पेड़ है मुनगा का, जिसके जड़ से लेकर फल-फूल और तना पत्ते तक- हर भाग का लोग उपयोग करते हैं।

मुनगे का पेड़


मुनगा (Moringa oleifera) एक उष्णकटिबंधीय पेड़ है, जो हर मौसम में अपने आप को मौसम के अनुरूप ढाल सकता है। कड़ी गर्मी में भी यह पेड़ जीवित रह सकता है और गर्मी के दिनों में इसके पत्ते निकलने लगते हैं। जनवरी से लेकर मार्च तक इसमें फल, फूल लगने लगते हैं।


यह पेड़ बहुत ही नाज़ुक होता है और इस पर ज्यादा दूरी तक चढ़ा नहीं जा सकता क्योंकि यह चढ़ने पर टूट जाता है। लोग इसके फल को तोड़ने के लिए किसी लंबी लकड़ी का सहारा लेते हैं। इसके पेड़ को अगर हम आधे में काट कर कहीं और ज़मीन में गाड़ देते हैं, तो दूसरा पौधा मिल जाता है। इसके तने का रोपण गीली, नमी जगह पर नहीं किया जा सकता और इसका रोपण सिर्फ मार्च से मई-जून तक ही किया जा सकता है।

मुनगे की सब्जी


इसके फूल, जो गहरे सफेद रंग के होते हैं, गुच्छों में फूलते हैं। इसके फल हरे रंग के होते हैं जिसकी लंबाई एक फूट की होती है। मुनगा दो प्रकार के होते हैं- पहला, जिसे छत्तीसगढ़ी में बरमसी मुनगा कहते हैं और दूसरा, जो सगवान मुनगा हैं। बरमसी मुनगा 12 माह फल देता है लेकिन जो पेड़ गाँव में पाया जाता है, वह सगवन मुनगा होता है और वह साल में सिर्फ एक बार (जनवरी से मार्च-अप्रैल तक) फल, फूल देता है।


मुनगा फल-फूल, पत्तों और बीजों का उपयोग


जो मौसमी फल इस पेड़ से मिलता है, उसे आदिवासी बहुत ही प्यार से बना कर खाते हैं, क्योंकि यह साल भर में एक ही बार मिलता है। इसके फल-फूल और पत्ते को सब्जी बनाकर भी खाया जाता है, जो बहुत ही स्वादिष्ट सब्ज़ी होती है। जब किसी के शरीर में कमज़ोरी होती है, तो यह सब्ज़ी उन्हें खिलाई जाती है।


इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है और इसके फल, फूल, पत्तों और बीजों में विटामिन, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन-ए, सी और बी कॉम्पलैक्स मौजूद है। इसको सप्ताह भर खाने से ही शरीर में परिवर्तन आने लगता है। हमारे गाँव में परंपरा है की गर्भवती महिलाओं को इसके पत्तों को सब्जी बनाकर खिलाया जाता है।यह पेड़ से बनी औषधि पाचन से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी काम आती है।


मछली मारने के लिए जड़ और चाल का उपयोग

मुनगा का फला


मुनगे के फल-फूल और पत्ते को खाने के साथ साथ इसे मछली पकड़े के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। इस पेड़ के छाल और जड़ बहुत ज़हरीले होते है, जिसे आदिवासी मछली मारने के लिए उपयोग करते है। जब तालाब में या बहते हुए झरने में आदिवासी मछली पकड़ने जाते है, यहाँ ज़्यादा मछलियाँ होने का अनुमान हो, वहाँ मुनगे की छाल एवं जड़ को अच्छे से पत्थर में कूट कर डाल देते हैं।


यह करने के 10-15 मिनट बाद यह अपना काम करना शुरू कर देता है और इस पानी में मछलियाँ अगर बहती है, तो तुरंत भागने लगती है। अगर किसी जगह पर पानी ठहर गया है, वहाँ तक पहुँचकर मछलियाँ मरने लगती हैं। मुनगा के जड़ और चाल सिर्फ़ छोटे-छोटे जीव-जंतुओं के लिए हानिकारक है, इंसानों पर इसका परिणाम नहीं होता।


मुनगा पेड़ आदिवासी के खान-पान और जीवन का अहम भाग है और इसके फ़ायदों की जानकारी रखने से आदिवासियों का भी फ़ायदा होता है। क्या आप भी मुनगा खाते है? अगर नहीं तो ज़रूर खाएँ!



नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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