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कैसे कोविड-19 छीन रहा है आदिवासियों से उनके रोज़गार के साधन

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तेंदूपत्ता (Diospyros Melanoxylon) आदिवासियों के जीवन का अहम भाग है। कई राज्यों के आदिवासी इन पत्तों को तोड़कर बेचते हैं और अपना जीवन-यापन करते हैं। छत्तीसगढ़ के लगभग पूरे ग्रामीण क्षेत्र में तेंदूपत्ता की उपज अधिक होती है जिस पर आदिवासी निर्भर रहते है। तेंदूपत्ता को हरा सोना भी कहा जाता है। तेंदू का पेड़ जंगलों में ही पाया जाता है। वन विभाग के अनुसार, होली के बाद मार्च के महीने से लेकर मई तक आदिवासी जंगल से तेंदू फल का संग्रह कर बाज़ार में बेचते हैं, जिससे उन्हें नियमित आय मिलती है। तेंदू के पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने में होता है।

तेंदू के पत्तों की होती है मई में तुड़ाई

तेंदूपत्ता तोड़ती हुई आदिवासी महिला। फोटो साभार- खगेश्वर मरकाम


हर साल 4 मई से 25 मई तक तेंदूपत्ता की तुड़ाई का कार्य चलता है, जिसका संग्रहण वन विभाग द्बारा कराया जाता है। तेंदूपत्ता तुड़ाई के कार्य से वनों के आसपास रहने वाले आदिवासियों को इससे अच्छी-खासी आय मिल जाती है।

इस साल मई महीने में तेंदूपत्ता तुड़ाई प्रारंभ की गई। 7 मई को तेंदूपत्ता तोड़ने आदिवासी अपने परिवार सहित सुबह 5:00 बजे से जंगल में तेंदूपत्ता तोड़ने गए।

कोरोना वायरस के चलते इस साल सिर्फ ग्राम केरगाँव के ही लोगों ने इसमें भाग लिया, क्योंकि गाँव का पूरा बॉर्डर सील कर दिया गया है और बाहरी व्यक्तियों को गाँव में आने की अनुमति नहीं थी। पहले तो बाहर से भी लोग पत्ता तोड़ने के लिए आते थे।

तेंदूपत्ता को इकट्ठा करने का मौसम आने से पहले कई तैयारियां की जाती हैं। जैसे- पत्ता बांधने के लिए रस्सी की व्यवस्था करना एवं घर के राशन-पानी, लकड़ी इत्यादि की व्यवस्था करना।

फोटो साभार- फोटो साभार- खगेश्वर मरकाम


इस दिन के लिए वन विभाग द्वारा भी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई थी। ज़िले में तेंदूपत्ता संग्रहकों की संख्या लगभग 60000 है, और इसमें केरगाँव की जनसंख्या 100 है। मौसम को देखते हुए इस साल तेंदूपत्ता तुड़ाई 4- 5 दिनों तक चलाई गई। कई गाँव में 1 सप्ताह तक चलाई गई।

आदिवासी पत्ता तोड़कर उन्हें घर लाते हैं और 52 पत्तों की गड्डी बनाते हैं। इन पत्तों को फिर सुखाने के लिए फड़ ले जाते है। इन पत्तों की एंट्री मुंशी जी कार्ड में करते हैं। पत्ते सूख जाने के बाद पलटाए जाते है, दोनों तरफ से पत्ते सूख जाने पर उसे हुडी करते हैं। अर्थात सब पत्तों को एक जगह इकट्ठा करते हैं फिर पत्तों पर पानी मारा जाता है और तिरपाल से ढक दिया जाता है।

पत्ते मुलायम होने के बाद उनकी गिनती करके बारदाना में भर दिए जाते हैं और इस गिनती को रिकॉर्ड में लिख दिया जाता है फिर पत्तों को अपनी-अपनी समितियों में इकट्ठा करते हैं। इस ज़िले में 70 लघुवनोपज सहकारी समितियां हैं और इनके द्वारा ही तेन्दूपत्ता संग्रहण कार्य किया जाता है।

तेंदू वृक्ष के अन्य उपयोग

तेंदु पेड़ एक ऐसा पौधा है, जिसकी जड़, शाखाएं, पत्ते और फल आदि सभी को उपयोग में लाया जाता है। तेन्दु फल मार्च-अप्रैल-मई माह में मिलता है। यहां के जंगलों में तेंदू वृक्ष इस समय गोल आकार वाले पीले रंग के तेंदू फलों से लदे होते हैं।

गर्मी के दिनों में घर से निकलने के पहले आदिवासी इस फल को खाते हैं ताकि वे गर्मी के प्रकोप से बच पाएं। आयुर्वेद चिकित्सकों का भी कहना है कि तेंदू का फल पौष्टिक होने के साथ-साथ पाचन के लिए भी उपयोगी होता है।

आदिवासियों को झेलनी पड़ रही हैं कठिनाइयां

जंगल में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले तेंदू के पेड़ भी अब वनों की कटाई से कम होते जा रहे हैं। इससे आदिवासियों के जीवन में कठिनाइयां खड़ी हो रही हैं। कभी-कभी भारत भर के आदिवासियों को वन विभाग के लोग तेंदूपत्ता काटने नहीं देते और उनसे पत्ते छीन लेते हैं।

इस साल कोरोना वायरस और बेमौसम बारिश की वजह से कई पत्तों का नुक़सान हुआ है जिससे समस्याएं और भी बढ़ गई हैं। तेंदूपत्तों के भुगतान को लेकर भी कई आदिवासियों ने आवाज़ उठाई है

उन्हें बैंक में पेमेंट होने से कठिनाई होती है, क्योंकि हर बार पैसों के लिए वे बैंक नहीं जा सकते। आदिवासियों के लिए महत्वपूर्ण तेंदूपत्तों और उनके भुगतान की ओर सरकार को और भी ध्यान देना चाहिए।


नोट: यह लेख ‘Adivasi Awaaz’ प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है और इसमें प्रयोग समाजसेवी संस्थान और Misereor का सहयोग है।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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