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छत्तीसगढ़: आदिवासी गाँवों में छोटे बच्चों की सिकाई और मालिश का परंपरागत उपाय

नवजात शिशुओं की देखभाल करते समय पुराने समय के बहुत से आज़माए और परखे हुए पुराने नुस्ख़े काम आते हैं। विशेष रूप से गाँवों में, जहाँ आधुनिक शिशु-पालन के साधन-संसाधन अभी तक उपलब्ध नहीं हो पाए हैं, वहाँ ये पुराने घरेलु उपाए ही काम आते हैं।


ऐसा ही एक शिशु की देखभाल का तरीका ग्रामीण अंचल क्षेत्रों में निवासरत आदिवासी समुदाय जैसे गोड़, कंधर, भील, पंडो तथा बीहड़ जंगलों में निवास करने वाली अन्य जनजातियों द्वारा अपनाया जाता है। यह उपाय छोटे बच्चों की सिकाई के लिए किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः चार वस्तुओं का प्रयोग होता है- गोबर, बांस की कलमी, गोरसी और सरसों का तेल।


गोबर के कंडे


छत्तीसगढ़ में गोबर के कंडों को छेना बोलते हैं। ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों में अधिक संख्या में गाय-बैल, भैंस पाले जाते हैं। इनसे हमें दूध के साथ-साथ गोबर भी मिलता है। गोबर जैविक खाद का बहुत ही महत्वपूर्ण स्त्रोत है।


इसके साथ ही यह कंडे बनाने के काम भी आता है। इसके लिए धान का भूसा जिसे परोसी कहा जाता है, गोबर में अच्छे से मिलाकर एक मिश्रण तैयार किया जाता है। अब इस मिश्रण की लोइयां बनाकर इन्हें गोल आकार दिया जाता है।


एक गोबर के कंडे का माप दो-तीन रोटी के आटे को मिलकर बनाई गई रोटी के बराबर होता है, हालाँकि इसकी मोटाई अधिक होती है। इन्हें फिर दीवाल पर या ज़मीन पर थोपा जाता है। इन गोबर के कंडों को अच्छी तरह से धूप में सुखाया जाता है। सूखने के बाद उसे फिर पलटा जाता है ताकि यह दोनों ओर से अच्छी तरह से सूख जाएँ।

गोबर के कंडे


बांस की कलमी


यह बांस की पतली, सूखी लकड़ी होती है। इसे हाथों से आसानी से तोड़ा भी जा सकता है।


गोरसी


इसे ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं द्वारा मिट्टी से बनाया जाता है। इसे बनाने के लिए पुरानी मटकी के बाहरी हिस्से पर मोटी परत लगाकर धूप में सुखाया जाता है।

जब मिट्टी पूरी तरह सूख जाए तब गोरसी को मटकी से सावधानीपूर्वक अलग कर लिया जाता है ताकि मटकी और गोरसी ना टूटे।

सरसों का तेल


गोरसी तैयार होने पर उसमें कंडे और बांस की कलमी को जलाया जाता है। इससे बनी अंगेठी में धीमी आंच उठने पर सरसों के तेल में लहसुन डालकर तेल को अच्छी तरीके से पकाया जाता है।


सामान्यतः जब तक कंडे और कलमी पूरी तरह जल न जाएं, तब तक सरसों के तेल को पकाया जाता है।

लहसुन डालकर पकाया हुआ सरसों का तेल


सिकाई की प्रक्रिया


सिकाई के लिए सब कुछ तैयार हो जाने के बाद सिकाई शुरू की जाती है। इसके लिए धीमी आंच पर पके तेल से बच्चे के पेट पर हल्की मालिश करते हैं। लहसुन और सरसों के तेल दोनों के ही तासीर गर्म होती है। इसको बच्चे के पेट और छाती पर मलने से उनका शरीर गर्म रहता है।


ऐसा करने से नवजात शिशु से सर्दी ख़ासी, बुख़ार आदि बीमारियाँ कोसों दूर रहती हैं। इसके अलावा गोरसी पर हाथ सेंक कर उन गर्म हाथों का सेंक बच्चों के पेट पर देने से उनकी पाचन क्रिया सही रहती है। बच्चों के कान में सरसों का तेल डालकर सिकाई करने से बच्चों के कान में मैल नहीं जमता और कान में किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं होती।


बच्चों की रोज़ाना मालिश के लिए भी यही सरसों का तेल काम आता है। मालिश करने से बच्चों के शरीर में ख़ून का बहाव बेहतर होता है और उन्हें नींद भी अच्छी आती है। अंत में बच्चों को बहुत ही सावधानी से ऊपर उछाला जाता है ताकि धीरे-धीरे बच्चे का डर कम हो सके।


इस प्रक्रिया को दिन में दो बार करना उपयुक्त है। आदिवासी गाँव में जिन घरों में छोटे बच्चे होते हैं, वहां यह रोज़ की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया से बच्चा शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से स्वस्थ रहता है।

बच्चे मी मालिश करती हुई महिला


क्या क्या सावधानियां बरतें?


बच्चों की मालिश करते समय जो भी सावधानियां बरतनी चाहिए, वे इस प्रकार हैं-


तेल गर्म करने के लिए जलाई गई अंगेठी बच्चे से उचित दूरी पर रखें। मालिश करने वाली महिला इस तरह बैठे कि अपना हाथ बढ़ाने पर वो आसानी से हाथ सेंक सके परन्तु चिंगारी व् लपटों से स्वयं भी सुरक्षित रहे और बच्चे को भी रखे।


लहसुन डालकर पकाया हुआ सरसों का तेल थोड़ा गुनगुना हो जाने पर ही मालिश शुरू करें। नवजात शिशु का शरीर बहुत कोमल और नाज़ुक होता है। इसलिए बहुत ही ध्यानपूर्वक और हल्का दबाव देते हुए बच्चों की मालिश की जाए।


ऐसे करते है छत्तीसगढ़ के आदिवासी गाँव में बच्चों की सेंकाई और मालिश। पीढ़ियों से आदिवासी इस प्रक्रिया का पालन करते आ रहें है।


लेखक के बारे में- राकेश नागदेव छत्तीसगढ़ के निवासी हैं और मोबाइल रिपेयरिंग का काम करते हैं। यह खुद की दुकान भी चलाते हैं। इन्हें लोगों के साथ मिलजुल कर रहना पसंद है और यह लोगों को अपने काम और कार्य से खुश करना चाहते हैं। इन्हें गाने का और जंगलों में प्रकृति के बीच समय बिताने का बहुत शौक है।



यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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