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छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का अनोखा त्यौहार जिसमें करते हैं वे अपने औजारों की पूजा

छत्तीसगढ़ के गाँव में कई त्यौहार बड़े ही धूम-धाम से मनाए जाते हैं, जिनमें से एक लोकप्रिय त्यौहार है हरेली। छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी गाँव में इस त्यौहार को मनाया जाता है।


हरेली त्यौहार गाँव में हरियाली आने पर और फसल लगाने के बाद मनाया जाता है। नीलकंठ कोराम, बिंझरा के निवासी बताते है, “हरेली पर्व जून महीने से ही शुरू हो जाता है लेकिन इस पर्व को तब मनाया जाता है जब खेतों में फसल या रोपा लग जाए।”


वो आगे बताते हैं, “यह हरेली का पर्व किसानों के लिए उपहार के समान होता है, जो उनके चेहरों पर खुशी लाता है। किसानों को इसका इंतज़ार रहता है। इसका नाम हरेली इसलिए है, क्योंकि इस त्यौहार को तब मनाया जाता है, जब हमारे आसपास खेत-खलियान फसलों से हरे-भरे दिखाई देते है।”


हरेली से पहले हुआ स्वच्छता अभियान

गाँव की सफाई करते ग्रामीण। फोटो साभार- वर्षा पुलस्त


इस हरेली त्यौहार के उपलक्ष में पूरे गाँव की साफ-सफाई की जाती है और स्वच्छता अभियान चलाया जाता है। त्यौहार से पहले लोग अपने-अपने घरों की लिपाई-पुताई करते हैं। घर के आसपास जितना भी कूड़ा कचरा होता है, उसे साफ करते हैं।


सफाई करने के लिए गाँव के सभी लोग शामिल होते हैं। लोग स्वेच्छा से अपने साधन लाते हैं और इस अभियान में एक- दूसरे की मदद करते हैं। लोग अपनी-अपनी गाड़ी, ट्रैक्टर, पिकअप लाते हैं और उसमें कूड़ा-कचरा उठाकर गाँव की सफाई करते हैं।


हरेली में करते हैं किसान अपने औजारों की पूजा

अपने वाहन लाकर गाँव की सफाई करते लोग। फोटो साभार- वर्षा पुलस्त


हरेली त्यौहार से पहले सभी लोग अपने घर के आसपास के वातावरण को साफ तो करते ही हैं लेकिन इसके साथ-साथ किसान अपने किसानी औजारों (फावड़ा, गयती, कुदारी, हल) को भी साफ करने के लिए नदी या तालाब में ले जाते हैं।


इन्हें साफ करके घर लाया जाता है और उस जगह पर नदी से बालू रेत लाकर रखते हैं। इस बालू के ऊपर ही औजारों को रखा जाता है। इन औजारों की पूजा की जाती है और इन पर बंदन लगाया जाता है। इसके साथ-साथ यहां चावल से बनी हुई छोटी-छोटी रोटियां, नारियल, अगरबत्ती, धूप और चावल को रखकर पूजा करते हैं।

औजारों का पूजा स्थल। फोटो साभार- वर्षा पुलस्त


बच्चों को भी यह हरेली त्यौहार बड़ा पसंद है, क्योंकि उन्हें इस त्यौहार में अपने घरवालों की तरफ से खेलने के लिए गेड़ी दी जाती है। यह गेड़ी लकड़ी की बनी होती है और बच्चे गेड़ी पर चढ़कर पूरे गाँव में घूमते हैं।


हर साल इस त्यौहार के समय गाँव में खुशी का माहौल होता है। इस साल लॉकडाउन की वजह से हर्ष-उल्लास नहीं था। लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन तो किया लेकिन इसकी वजह से वे एक-दूसरे के साथ ज़्यादा समय व्यतीत नहीं कर पा रहे थे और किसी के घर जाकर अपनी खुशी ज़ाहिर नहीं कर कर पा रहे थे।


गाँव में हम सब एक परिवार के समान हैं और हर साल यह त्यौहार सब मिलकर मनाते हैं। हम सब अगले साल की प्रतीक्षा कर रहे है, जब हम फिर से धूम-धाम से यह पर्व मना सकेंगे।



नोट: यह लेख ‘Adivasi Awaaz’ प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है। इसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्थान’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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