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छत्तीसगढ़ के इस गाँव के आदिवासी कैसे मनाते हैं होली का त्यौहार

नेचर का हर रंग आप पर बरसे

हर कोई आपसे होली खेलने को तरसे,

रंग दे आपको सब मिलकर इतना

कि वह रंग उतरने को तरसे।


भारत में होली बहुत धूम-धाम से मनाई जाती है। होली का त्यौहार हर साल फाल्गुन यानी मार्च के महीने में आता है जिसे विभिन्न प्रकार के रंगों में डूबकर मनाया जाता है।


हमारा गाँव भी इस साल होली के रंगों से खिल उठा। हमने भी होली का त्यौहार क्या खूब मनाया। बहरहाल, बात छत्तीसगढ़ के एक गाँव भैसादादर में मनाई जाने वाली होली की।


खा के गुजिया भांग लगा के थोड़ा-थोड़ा सा रंग

बजा के ढोलक और मृदंग खेले होली हम तेरे संग।


भैसादादर गाँव में होली


सबसे पहले हमारे आदिवासी लोग “मैहां” यानी “महुआ”को बिनते हैं और उसे सुखा लेते हैं। जब त्यौहार का दिन आता है, उस दिन मैहां फल को पकाते हैं। इसे देवी-देवताओं के लिए पत्ते पर निकाला जाता है और उनके लिए दिया जलाया जाता है।


उसके बाद मैहां के पत्ते को देवी-देवताओं के सामने रखते हैं। फिर पूजा की जाती है। देवी-देवताओं को चढ़ाने के लिए नारियल, चावल, धूप और अगरबत्ती भी लाते हैं और उन्हें भी रंग लगाते हैं। मैहां से जो शराब बनती है, उसे देवताओं को थोड़ा-थोड़ा चढ़ाते हैं तभी वह संतुष्ट होते हैं।


ज्ञात हो कि मैंहा और नारियल को मिक्स करके खाया जाता है, जो खाने में बड़ा ही स्वदीष्ट लगता है।


पूजा का दृष्य देखने लायक होता है


पूजा करते समय सभी परिवार एक ही घर में इकट्ठा होते हैं। सभी लोग इस दिन अपने सारे गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं। होली हम सभी को आपस में जोड़ता है और रिश्तों में प्रेम और अपनत्व के रंग भरता है।


हमारी भारतीय संस्कृति का सबसे खूबसूरत रंग होली के त्यौहार के रूप में स्वीकारा जा सकता है। सभी त्यौहारों की तरह होली के त्यौहार के पीछे भी कई मान्यताएं प्रचलित हैं।


क्या है होली से सम्बंधित मान्यता?


कहानी ऐसी है कि प्राचीन समय में हिरण्यकश्यप नाम का एक असुर हुआ करता था। उसकी एक दुष्ट बहन थी जिसका नाम होलिका था। हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानता था। हिरण्यकश्यप का एक पुत्र था जिसका नाम प्रहलाद था।


वो भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे। हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु के विरोधी थे। उन्होंने प्रहलाद को विष्णु की भक्ति करने से बहुत रोका लेकिन प्रहलाद ने उनकी एक भी बात नहीं सुनी।


इससे क्रोध में आकर हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को जान से मारने का प्रयास किया। इसके लिए हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से मदद मांगी, क्योंकि होलिका को आग में ना जलने का वरदान मिला हुआ था।


उसके बाद होलिका प्रहलाद को लेकर चिता में बैठ गई लेकिन जिस पर विष्णु की कृपा हो उसे क्या हो सकता है? प्रहलाद आग से सुरक्षित बच गया, जबकि होलिका उस आग में जलकर भस्म हों गई।

तात्पर्य यह है कि बुराई पर अच्छाई की जीत अवश्य होती है। आज भी लोग लकड़ी, घास और गोबर के ढेर को रात में जलाकर होलिका दहन करते हैं।

होली के त्यौहार पर दोस्तों और रिश्तेदारों को संदेश और शुभकामनाएं देना तो आम बात है लेकिन इस बार मैंने अपने किसी खास को शुभकामनाएं दीं। वह भी अपनी आदिवासी भाषा में। आशा है मेरे और भी आदिवासी भाई-बहन ऐसा करने की सोचें।


खुदा करे हर साल चांद बनकर आए

दिन का उजाला शान बनकर आए,

कभी ना दूर हो आपके चेहरे से हंसी

होली का यह त्यौहार ऐसा मेहमान बनकर आए।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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