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छत्तीसगढ़ में हाथियों ने किया आदिवासी घरों का नुक़सान, टूट गयी सोशल डिस्टन्सिंग की कड़ी

कोरोना वायरस की वजह से देश के कई राज्यों में आज भी लॉकडाउन जारी है। छत्तीसगढ़ में भी लोगों ने लॉकडाउन का पालन बखूबी से निभाया हैं और लॉकडाउन की सराहना भी लोगों द्वारा की जा रही है। लॉकडाउन का पालन करने एवं करवाने का ज़िम्मा कई ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों ने लिया है। पंचायत में बाहरी लोगों के आना और पंचायत के लोगों का बाहर जाने पर कड़ी पाबंदी लगी है। सभी लोग अपनी- अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहें हैं।


जिला कोरबा के ग्राम पंचायत सरभोका के लोगों ने भी लॉकडाउन का पालन अच्छे से किया और सामाजिक दूरियाँ भी बरकरार रखी। ग्रामीणों ने उपलब्ध साधनों से ही अपना गुजरा कर, शासन द्वारा निर्देशित नियमों का पालन किया। लेकिन मई में ऐसे घटनाएँ घटी, जिससे यहाँ के लोगों को ताला बंदी करके, रात्रि बिना सोए पहरेदारी करनी पड़ी।

ग्राम पंचायत सरभोका के समीप जंगल में हाथियों का झुंड।


यहाँ गजराज ने लोगों के होश उड़ा रखे हैं। ग्राम पंचायत सरभोका में हाथियों ने 21-22 एप्रिल को सरभोका के नज़दीक स्थित जंगलों में अपना अड्डा जमाया। 21 एप्रिल को ग्रामीणों द्वारा जंगल में हाथियों को देखा गया एवं इसकी सूचना वन विभाग को दी गई। वन रक्षकों द्वारा पंचायत के लोगों को जागरूक किया गया। उन्होंने लोगों को जंगल ना जाने की और रात्रिकालीन घर के पास बाड़ी, आंगन में आग जला कर रखने की सूचना दी। लोगों ने अपने घर आस पास उजाला रखने के लिए बाड़ी- कोला में आग जलाई और बल्ब लगाए।

जंगल में आग जलाकर हाथी को भगाने की कोशिश करते लोग।


हाथियों ने किया घरों और धान का नुक़सान


24 एप्रिल को रात्रि में हाथी ग्राम केसारू पारा (कोरकोटपारा) में आकर खड़े हुए। वन रक्षकों और ग्रामीणों के लाख कोशिशों के बावजूद भी वे हाथियों को नहीं रोक पाए। तीन हाथियों ने बारी बारी से पवन सिंह बिंझवार और धीरपाल बिंझवार के घरों को फोड़ दिया और घरों में घुस कर धान और चावल को खा लिया। तीन हाथियों में एक हाथी छोटा था, जिसने घर के दरवाज़े से होकर अंदर जाकर घुस कर धान- चावल को खा लिया।

श्री सहदेव लकड़ा और उनका घर, जिसे हाथी ने तोड़ा


दूसरे और तीसरे दिन लगातार हाथियों ने उराओं और बिंझवार आदिवासी समुदाय के रामायण सिंह, सहदेव लकड़ा और ज्ञान सिंह के घरों को धराशाई कर धान- चावल को हानी पहुँचाई। सहदेव लकड़ा जी ने बताया कि उनका लाखों का नुक्सान हुआ है। हाथियों ने ग्राम में पांच घरों को नुक्सान पहुंचाया। उनकी इस तरह की तोड़-फोड़ ने ग्रामीणों के होश उड़ा दिया थे। हाथियों की इन हरकतों से लोग परेशान होकर, गाँव में इकट्ठा होकर, हाथियों को ग्राम स्थित जंगलों से भगाने के लिए दो-तीन दिन तक प्रयास करते रहे, लेकिन वे असफल रहे।

श्री ज्ञान सिंह बिंझवार का घर।


पक्के मकानों के छतों पर सोए बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएँ, युवा ने लगाया रात्रि का पहरा


इसके बाद कोई और पर्याय ना होने के कारण ग्रामीणों ने घर छोड़कर बाहर पक्के मकानों के छतों पर, यानी स्कूलों के छत, प्रधान मंत्री आवास के छतों पर गाँव की महिलाएँ, बच्चे, वृद्ध सोने लगे। युवा रातों में गाँव की पहरेदारी करते रहे। हर मोहल्ले में आग जला कर पहरेदारी की जा रही थी। हाथी भगाने के लिए तैयारी कर मशाल, टॉर्च आदि व्यवस्था के साथ लोग रात्रि काल में बैठकर पहरा देते रहे। इस समय लोगों का कहना था कि, “अब तक जो हो गया सो हो गया। अब हाथी को घर के नज़दीक ही नहीं आने देंगे।”

पक्के मकानों के छतों में सोते थे बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ।


हाथियों की वजह से टूटी सामाजिक दूरियों की कड़ी


हाथियों को भगाने के लिए इकट्ठा होने से और अन्य बिल्डिंग के छतों पर एक साथ सोने से सामाजिक दूरियों का पालन नहीं हो पाया। शोसल डिस्टन्सिंग की कड़ी टूट गई। यदि लोगों ने सावधानी नहीं बरती तो ऐसे समय में गाँव में बीमारी आने की संभावना तो है ही। गाँव में हर चीज का गहरा प्रभाव पड़ता है। एक तरफ़ लॉकडाउन के प्रभाव से ग्रामीण मुकाबला कर रहे थे और दूसरी तरफ़ हाथी के आने पर ग्रामीणों को कई तरह की नई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था।


स्तिथी का उठाया दुकानदारों ने फ़ायदा, टॉर्च की क़ीमत 3X बढ़ाई


रात में पहरा देते समय भी कई परेशनियाँ था। लोगों ने बांस और साल मूनगा की लकड़ी में मशाल सरलता से बना तो ली थी, लेकिन टॉर्च, जो इस समय में बहुत महत्वपूर्ण है, इसकी व्यवस्था करने में लोगों को दिक़्क़त हो रही थी। आस-पास के दुकानदार ग्रामीणों की मजबूरियों का फायदा उठा रहे थे।

बांस से बनी मशालें


श्री राजकुमार जी ने बताया की, “मैं दुकान गया था टॉर्च लेने के लिए। वहाँ 400 रुपए के टॉर्च की कीमत दुकानदार 1200 रुपए बता रहा था। ग्राम में हाथी आने से पूर्व श्री बनाफर मिंज द्वारा यही टॉर्च 450 रुपए में खरीदा गया था। अभी इसी टॉर्च को श्री श्याम और भारत यादव ने 1200 रुपए में ख़रीदा है। एक ही कम्पनी के उसी टॉर्च की कीमत 400-450 से बढ़कर 1200 रुपए कैसे हो सकती है?” ऐसी क़ीमतों का ग़रीबों पर बहुत भारी प्रभाव होता है। हाथी भागना भी बहुत क़ीमती काम होता है।

एक ही कम्पनी (रॉक लाईट) का टॉर्च, पर अलग अलग कीमतें, 400 से लेकर 1200 तक


सरकार के द्वारा हाथी भगाने का कोई उपाय नहीं, नुक़सान भरपाई बहुत ही कम


पिछले साल सितम्बर महीने में सरभोका में ही एक हाथी ने दो व्यक्तियों की जान ली थी। इस साल उन्होंने पाँच घरों को ढहा दी। इस जन धान की हानियों की भरपाई सिर्फ चंद रुपयों में की जाती है। सरकार ने अभी तक हाथियों को भगाने का कोई उपाय नहीं निकाला है। क्रोध में आकर ग्रामीण व्यक्ति यदि हाथी को नुक्सान पहुँचाता है, तो सरकार इसका कठोर जवाब देगी और पूछताछ करेगी की हाथी को किसने नुक्सान पहुँचाया, कैसे नुक्सान पहुँचाया, क्यों नुकसान पहुँचाया। मुलज़िम को पकड़ने के लिए वह धन-बल का प्रयोग करेगी। लेकिन हाथी को भगाने का कोई उपाय न नहीं देगी। सरकार को हाथी को भगाने के लिए कोई ठोस कदम उठाने चाहिए और लोगों को ठीक से नुक़सान भरपाई देनी चाहिए।


अगर आप हमारी मदद करना चाहते हो और अगर आप भी सहमत हो की लोगों को इस नुक़सान के लिए ठीक से भरपाई हो, तो कृपया वन विभाग कोरबा के कटघोरा वनमंडल अधिकारी को 07815-250157 पर फ़ोन करें और उनसे यह माँग करें।


देखिए सरभोका के हाथियों ने किया हुआ नुक़सान-

यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजैक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, और इसमें Prayog Samaj Sevi Sanstha और Misereor का सहयोग है।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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