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छत्तीसगढ़ के गाँव वाले कैसे अपनी फसलों को आवारा मवेशियों से बचाते हैं

भारत के गाँवों ने हमेशा ऐसी नीति बनाई हैं, जिनमें संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को अच्छी तरह से संतुलित किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ के गाँव में एक पारंपरिक व्यवस्था है ‘रोका छेका’, जिसके अंतर्गत गाँव वाले अपनी फसलों को आवारा मवेशियों से बचाने के लिए उन्हें एक गौशाला में रखते हैं।


गाँव के लोग बैठक करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि परित्यक्त गाय और बैल को भी आश्रय मिलनी चाहिए। इस प्रणाली के कारण आवारा पशुओं की समस्या गाँव में उत्पन्न नहीं होती है। शहरों में आप अक्सर आवारा पशुओं को सड़क के किनारे टहलते हुए या सड़क के बीच में आराम करते हुए देखेंगे। ‘रोका-छेका’ यह सुनिश्चित करता है कि जिन गाँवों में यह लागू है, उनमे ऐसा ना हो।


इस पारंपरिक नीति की सफलता को देखने के बाद राज्य सरकार ने इसे पूरे राज्य में लागू कर दिया है। इस नई व्यवस्था के अनुसार, प्रदेशभर में 5000 गौठानों का निर्माण किया जा रहा है। इनमें से 2200 गौठान का निर्माण पूरा हो चुका है, तथा 2800 गौठानों का निर्माण किया जा रहा है।


रोका छेका कार्यक्रम

छत्तीसगढ़ के कोरबा ज़िले के बिंझरा गाँव की 45 वर्षीय सरपंच चंद्रिका देवी पोर्ते ने हमें बताया, “छत्तीसगढ़ के सभी गाँवों में ‘रोका छेका’ कार्यक्रम करना ज़रूरी है, ताकि आवारा मवेशियों की समस्या का निपटारा किया जा सके। इसके और भी कई फायदे हैं। सबसे पहला कि इस परंपरा के तहत मवेशी खेतों में घुसकर फसल बर्बाद नहीं कर पाएंगे। मवेशियों को गौठानों में रखने से दोनों पक्ष का फायदा होता है। मवेशी भी सुरक्षित रहते हैं और खेत की फसल भी।”


सरपंच चंद्रिका देवी का कहना है कि अगर हर गाँव में यह परंपरा लागू हो जाए, तो इससे रोज़गार भी बढ़ेगा, क्योंकि गौठानों की देखभाल के लिए कर्मियों की ज़रूरत पड़ेगी।


इस विषय में हमने भूतपूर्व सरपंच शंभू शरण से भी बात की। उन्होंने हमें बताया कि ‘रोका छेका’ कार्यक्रम पीढ़ियों से चली आ रही है। भूतकाल में गौठान को ‘खैरखा दाढ़’ भी कहा जाता था।

इन दिनों कृषि क्षेत्र में बायो फर्टिलाइज़र्स के उपयोग को बढ़ावा देने पर नया ज़ोर है। ये ना केवल मिट्टी की गुणवत्ता को संरक्षित करते हैं, बल्कि प्रदूषण पर भी अंकुश लगाते हैं। गाँव में गौठान बनने से गाँव वाले गोबर से कम्पोस्ट खाद बना सकते हैं, जिसे खेतों में इस्तेमाल किया जा सकता है।


कम्पोस्ट खाद को सभी फसल के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। इसके साथ-साथ गोमूत्र से फसल में लगे कीड़ों को भी मारा जा सकता है।

गोमूत्र में कड़वे पत्ते, जैसे कि नीम के पत्ते या भुलिम के पत्ते को मिलाकर कीटनाशक दवाई बनाई जाती है और इसका फसलों में छिड़काव किया जाता है, ताकि फसल में लगे हुए कीड़े मर जाएं और फसल अच्छी हो।


इस ग्राम सुराजी योजना द्वारा गाँव के लोगों को रोज़गार मिल सकेगा


इस योजना से एक-दो साल में गाँव वालों और मवेशियों के लिए अच्छे परिणाम हो सकते हैं, क्योंकि ‘रोका छेका’ के अंतर्गत ‘नरवा, गरुवा, घुरवा, बाड़ी योजना’ शामिल किया गया है। इस योजना से गाँव वालों की आर्थिक स्थिति अच्छी होगी। गाँव के लोग गोबर से कम्पोस्ट खाद बनाकर उसे अच्छे मूल्य में बेच सकते हैं और अपनी दैनिक स्थिति सुधार सकते हैं।


इस कार्यक्रम के तहत गौठान गाँव से बाहर जंगल इलाके में बनाया जाता है ताकि गाय और बैल को चारा अच्छे से उपलब्ध हो सके। हालांकि यह जंगल में रहने से भी नुकसान होता है, क्योंकि जंगलों में और भी जानवर रहते हैं, जो मवेशियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

इस विशिष्ट समस्या का समाधान यह है कि गौशालाओं के चारों ओर एक दीवार खड़ी कर दी जाए, जिससे गायों और बैलों की रक्षा हो सके। ‘रोका छेका’ के अंतर्गत जो नई गौशालाएं बनाई गई हैं, उनमें ईंट के चबूतरे बनाए गए ताकि मवेशी एक जगह रह सके। चबूतरे को खंभे गाड़ कर बनाया जाता है और उसके ऊपर में पॉलीथिन रख देते हैं। इससे मवेशियों को धूप और बारिश से बचाया जाता है। इस पूरी व्यवस्था में गाँव के ही लोग शामिल होते हैं।

मवेशियों की स्थिति में हुआ सुधार

‘रोका छेका’ के लागू होने से पहले आवारा मवेशी खुलेआम घुमा करते थे। ऐसे मवेशियों को पकड़कर एक कांजीहौस में बंद कर दिया जाता था, जहां गाय और बैलों को खाने के लिए चारा या पीने के लिए पानी भी उपलब्ध नहीं होता था।

आवारा पशुओं को सात दिनों तक ऐसे ही रखा जाता था। उसके बाद इन पशुओं की नीलामी कर दी जाती थी, क्योंकि उनको कोई लेने नहीं आता था। इसका तात्पर्य यह है कि पशुओं के मालिक ने उनका त्याग कर दिया है।

इस नई नीति के साथ ऐसे परित्यक्त मवेशियों को एक रिटायरमेंट होम मिल गया है, जहां उनकी देखभाल ठीक से की जाती है। इतना ही नहीं, ग्रामीणों ने अपनी कृषि उपज को सुरक्षित रखते हुए अधिक रोज़गार भी पाया है।


नोट: यह लेख आदिवासी आवाज़ प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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