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जानिए गर्मी में आदिवासियों द्वारा मनाए जाने वाले ठंडाई पर्व के बारे में

Updated: Jan 31, 2021

भारत में मई से जुलाई तक काफी तेज़ गर्मी होती है। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ के आदिवासी भाई-बहनें ऐसा त्यौहार मना रहे होते हैं, जिसे ठंडाई का पर्व कहा जाता है। यह आदिवासियों का सबसे प्राचीन पर्व है। आदिवासियों का मानना है कि जब सृष्टि की रचना हुई थी, तभी से हम इस त्यौहार को मनाते हैं।


शीतला माता की पूजा


ठंडाई पर्व को जुलाई महीने में मनाया जाता है। ठंडाई पर्व में शीतला माता की मुख्य रूप से पूजा की जाती है। शीतला माता शीतलता और ताज़गी देती हैं, जिससे जीवन में नई स्फूर्ति आती है। इसमें सभी बड़े जोश और उल्लास से भाग लेते हैं। गाँव में माता का एक मंदिर होता है। यह मंदिर बस्ती में रहने से सभी बस्ती वाले महफूज़ महसूस करते हैं। इस दिन गाँव के सभी बूढ़े-बच्चे और युवा माता के दर्शन के लिए मंदिर जाते हैं।


इस त्यौहार में देवी देवताओं की पूजा की जाती है। फोटो सोर्स-खाम सिंह मांझी


नीम के रस का छिड़काव


ठंडाई पर्व की एक बहुत रोचक रीति होती है, इसमें नीम की पत्तियों को निचोड़कर उनका रस निकाला जाता है। फिर उस रस में पानी मिलाकर बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी के ऊपर छिड़काव किया जाता है।


मंदिर में देवी देवता। फोटो सोर्स- खाम सिंह मांझी


ऐसा करने के पीछे यह मान्यता है कि नीम से शरीर के रोग दूर हो जाते हैं। लोग नीम के इस मिश्रण को अपने परिवार में लाकर अपने-अपने घरों में छिड़काव करते हैं। इससे बीमारियां दूर होती हैं। सभी परिवार नीम के मिश्रण को अपने घरों में लाकर मुर्गियों, बकरियों और मवेशियों पर भी लगाते हैं, जिससे उनकी बीमारी भी दूर रहे।


बलि की परंपरा


इस त्यौहार पर देवी-देवताओं को बकरियों और मुर्गियों की बलि चढ़ाई जाती है। इस दिन लोग झूम-झूमकर नाचते हैं और माना जाता है कि देवी-देवताएं भी मनुष्य के शरीर में घुसकर नाचते हैं।


नीम के रस को मवेशियों पर भी लगाए जाता है। फोटो सोर्स-खाम सिंह मांझी


इस परंपरा के चरित्र चित्रण से आदिवासियों की संस्कृति, परम्पराएं और नियम-कानून के बारे में जानने और उन्हें बचाए रखने की कोशिश की जा रही है। इन्हें धीमे-धीमे भुलाया या मिटाया जा रहा है। इस परंपरा को हम युगों-युगों तक ज़िन्दा रखना चाहते हैं।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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