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जानिए भुंजिया आदिवासी समाज की प्रथा और उनके रोटी खानी त्योहार के बारे में

छत्तीसगढ़ के अनेक आदिवासी समुदायों में से एक है भुंजिया समाज। इस समुदाय के आदिवासी लोग बहुत ही भोले और प्रिय जनक हैं। यह ऐसा समुदाय है जिसमें सबसे ज्यादा नियम और नीति है, जिसका लोग कड़ाई से पालन करते है रखने।


भुंजिया समाज के उद्गम की कहानी


इस जाती के उद्गम के पीछे रामायण से जुड़ी कहानी है। जब भगवान श्री राम लक्ष्मण और माता जानकी को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो वे तीनों जंगल में एक कुटिया बना कर रहा करते थे। जब भगवान श्री राम और लक्ष्मण बाहर पहरा लगाया करते थे, तब इस कुटिया में माता जानकी अंदर बैठके राह करती थी। अन्य जाती के लोगों को इस कुटिया को छूना मना था, क्योंकि अंदर में माता जानकी रहा करती थी।


ऐसा कहा जाता है की भुंजिया समाज की उत्पत्ति वही से हुई। इस प्रथा को तब से आज तक भुंजिया समाज के आदिवासी चलाते आ रहे है। आज भी हम रसोई घर में, जिसे हम अपनी भाषा में रधनी घर या लाल बंगला कहते है, कोई भी अन्य जाती के व्यक्ति को छूने नहीं देते। अगर कोई रसोई घर को छू भी देता है, तो तुरंत रसोई घर के ऊपर का छप्पर (जिसे हम अपनी भाषा में छानी बोलते है) उखाड़ कर फेंक देते है। उसके बाद इसे फिर से नया बनाते हैं। जितनी बार किसी दूसरे जाती का आदमी हमारे रसोई घर को छुएगा, उतनी बार यह उखाड़ कर फैंक दिया जाएगा।

यह इसलिए करते है क्योंकि उस रसोईघर में हमारी देवी देवता विराजमान रहते हैं। हमारे समाज की महिलाएं अन्य जाति के आदमी या औरत का दिया हुआ खाना नहीं खा सकती।


भुंजिया आदिवासियों का रोटी खानी त्योहार


भुंजिया समुदाय में अनेक त्योहार मनाए जाते है, लेकिन इनका सबसे मुख्य त्योहार है रोटी खानी। रोटी खानी त्यौहार भुंजिया समाज बड़े धूमधाम से मनाते हैं।


रोटी खानी का दो-दिवसीय त्यौहार हर वर्ष दिसंबर महीने में मनाया जाता है। दिसंबर महीने में नए धान की फसल काटते हैं और चावल निकालते हैं। इस त्योहार के लिए चावल निकालने के बाद उसे पानी में लगभग 2 घंटे तक भिगोकर किसी बर्तन में रख देते है, ताकि हमें पत्थर से पीसने में आसानी हो जाए। जब चावल अच्छे से भीग जाता है तो उसमें थोड़ा-थोड़ा पानी डाल कर पत्थर से पीसते है। जब यह अच्छे से पीस जाए, एक सरेग के पत्ते (साल के पत्ते) से हम चावल को पत्ते में लिपट लेते है, रोटी बनाने के लिए। इसे फिर आग में डाला जाता है। आग में डालने के बाद, यह अच्छे से पकने के बाद, इस रोटी को देवी-देवताओं को थोड़ा छोटा काटकर चढ़ाते है और नारियल तोड़ते हैं। रोटी खानी के त्योहार के दिन गाँव के लोग सफ़ेद कपड़े ही पहनते है। देवी देवताओं के स्थान पे जाने से पहले पैर धोना अनिवार्य होता है।

देवी का मंदिर


यह पूजा आरम्भ करने से पहले गाँव के सभी बुजुर्गों को बजा बजाकर उनका स्वागत करते है। ऐसा कहते है की पूजा के समय किसी एक व्यक्ति में देवी आ जाती है। इस व्यक्ति से लोग आशीर्वाद लेते है और अपनी समस्याओं का हल माँगते है। इस त्योहार के समय बकरी या मुर्गी की बली देते हैं और उसे प्रसाद के रूप में सभी एक स्थान पर इकट्ठा होकर खाते हैं।

यह त्योहार भुंजिया समाज के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है और लोग इस त्योहार के रीति-रिवाजों का आज तक कड़ाई से पालन करते आ रहें है।


लेखक के बारे में- खाम सिंह मांझी छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। उन्होंने नर्सिंग की पढ़ाई की है और वह अभी अपने गाँव में काम करते हैं। वह आगे जाकर समाज सेवा करना चाहते हैं।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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