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दोना पत्तल- आदिवासियों के सहयोग और पर्यावरण सुरक्षा का चिन्ह

लेखक- मनोहर एक्का


छत्तीसगढ़ के कोरबा के गाँव में कोई भी कार्य हो, वहां के लोगों में ज्यादातर आपसी ताल मेल की भावना देखी जाती है। गांवों में कोई भी कार्यक्रम हो- शादी हो, या दशगात्र आदि का कार्यक्रम हो- लोग आपसी सहयोग की भावना से आगे बढ़ते हैं।इन ख़ास दिनों पे कोई खाना पकाएँगे, कोई पानी ढोएंगे, तो कोई बुजुर्ग व्यक्ति आए हुए लोगों के साथ बैठेंगे, उनकी देख-रेख करेंगे। अलग से खाना बनाने, पानी ढोने के लिए बावर्ची की व्यवस्था नहीं की जाती। जिस घर में कार्यक्रम हो रहा हो, उस घर में आर्थिक बोझ न पड़े इसलिए सब अपने-अपने घर से १/२ किलोग्राम चावल, १०₹ /२०₹ पैसा, चावल साथ लेकर आते हैं। साथ ही साथ में हर घर से दोना पत्तल अपने साथ लेकर आते हैं। इस तरह से लोग एक दूसरे का आपसी सहयोग करते हैं।


वैसे तो जंगलों में कई प्रकार के पत्ते होते है जिससे दोना पत्तल बनाया जाता है। मुख्य रूप से साल के पत्ते, मोहलाइन के पत्ते, पलास आदि पत्तों से दोना पत्तल बनाया जाता है। गाँव में अधिकतर साल के पत्तों से बनाए गए दोना पत्तल का ही उपयोग किया जाता है।


इन पत्तों का उपयोग कैसे और क्यूँ होता है?


ग्राम पंचायत सरभोका से श्रीमती जूलियाना एक्का जी ने बताया,” हम गांवों में होने वाले हर कार्यक्रम में जंगल से साल के पत्ते तोड़ कर लाते हैं। दोना पत्तल सिलाई से पहले हम सिखुन (चरी) घर – घर में बांटते हैं।(जो बांस से निकाली गई पतली – पतली लकड़ी होती है।) जंगल से लाए गए साल के पत्ते से हम दोना पत्तल बनाते हैं। दोना पत्तल हर घर में तैयार किया जाता है। जितना हो सके १०- २० पत्तल हो रहे कार्यक्रम स्थल पर ले कर आते हैं। हम उन्हीं दोना पत्तल में ही आए हुए मेहमानों और उपस्थित गांव के लोगों के लिए भोजन परोसते हैं।”

श्रीमती – जूलियाना एक्का और श्रीमती फलोरा बड़ा दोना पत्तल बनाते हुए


इसके पीछे का कारण समझते हुए जूलियाना जी बताती है,”यह दोना पत्तल स्वयं स्वयं बनाए जाते है। इसलिए इसे शुद्ध तथा साफ माना जाता है। इस लिए हम इसका उपयोग करते हैं। गांव में होने वाले कार्यक्रम एक दिन हो या चार दिन हो।स्वयं के द्वारा बनाए गए साल के दोना पत्तल का ही उपयोग करते हैं। उन्हें अलग से दोना पत्तल खरीदने की आवश्यकता नहीं होती है। इस तरह से लोगों का गाँव में आपसी आर्थिक सहयोग होता है।”


पर्यावरण के अनुकूल दोना पत्तल


बाजार से लाए गए दोना पत्तल आसानी से नहीं सड़ते, उन्हें जलाना पड़ता है। दूसरी तरफ़ जंगल के पत्ते से बनाए गए साल के दोना पत्तल बड़े आसानी से सड़-गल जाते है और खाद बन जाते है। बाजार के दोना पत्तल को जलाने से वायु प्रदूषण होता है और बाड़ी में फेंके तो मृदा प्रदूषण होता है। यदि पालतू पशु जैसे गाय – बैल, भैंस, बकरी आदि बाजार के दोना- पत्तल को खाने लगें, तो इससे इनकी मृत्यु होने की संभावना होती है। मवेशी के इन चीजों को खाने से पचन क्रिया नहीं होती, जिससे की जानवरों की मृत्यु हो जाती है।

आदिवासियों में ज़्यादातर सामूहिकता की भावना देखने मिलती है। मैं इस संस्कृति और प्रथा में बहुत गर्व रखता हूँ। क्या आपके समुदाय में भी ऐसी प्रथाएँ होती है?


लेखक के बारे में: मनोहर एक्का छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। यह खिलौने बनाना, सजौटी समान बनाना, बांसुरी बजाना, पेंटिंग करना पसंद करते हैं। यह पेंटर बनना चाहते हैं।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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