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पेड़-पौधों की कटाई और चारागाह की कमी से घटते जा रहे हैं छत्तीसगढ़ के गाँवों में गाय-बैल

ग्रामीण क्षेत्रों में गायों और बैलों की संख्या हमेशा से ज़्यादा रही है, क्योंकि लोगों को इससे बहुत फायदा होता है। गोबर हो या मल-मूत्र, गाय और बैल खाद के निर्माण में बहुत उपयोगी होते हैं। इन गाय-बैलों का जीवन पहले भी कठिन था लेकिन अभी उनकी समस्या और भी बढ़ गई है।


किसानों का दर्द उन्हीं की ज़ुबानी


खुरुनला के निवासी राम कुंवर, जिनकी उम्र 40 वर्ष है, गाँव में चारागाह का काम करते हैं, वो कहते हैं, “अब गाँव में पहले जैसे गाय-बैलों और चारागाह के लिए स्थान नहीं हैं, जिसके कारण हमें बहुत परेशानी झेलनी पड़ती है।”


वो आगे कहते हैं, “अब गाँव में भी बहुत ही कम गाय-बैल देखने को मिलते हैं, क्योंकि गाँव में भी अब चारागाह की समस्या आ पड़ी है। पहले तो गाँव में जो खुली जगह होती थी, जंगलों के किनारे मैदान होता था, वहां गाय-बैल चरने जाते थे लेकिन अब गाय-बैल चराने के लिए चारागाह ही नहीं हैं।”


पेड़-पौधों की कटाई से गाय-बैलों को चराने की जगह हो रही है गायब

रोड के बीच में घूम रही है गाय।


बाहर से आए हुए लोग जंगलों के किनारे घर बना चुके हैं, तो सड़कों के किनारे कहीं ढाबा बना दिया गया है, जिससे बहुत सारे पेड़-पौधे और हरियाली को हटाना पड़ा। विकास के साथ-साथ पेड़-पौधों की बड़ी मात्रा में कटाई होती गई, जिससे आज गाय-बैलों के चरने के लिए जगह नहीं बची है।


गाँव से बाहर गाय-बैल को चराने के लिए ले जाया जाता है लेकिन जंगल के पास ज़्यादा चारा प्राप्त नहीं होता है, तो चारागाह को गाँव से दूर दूसरे गाँव की तरफ गाय-बैलों को ले जाना पड़ता है, ताकि पशुओं को अच्छे से चारा प्राप्त हो जाए। इस समस्या की वजह से लोग गाय-बैलों को चराने के लिए इनकार कर देते हैं।


कुछ साल पहले गाय-बैलों को चराने के लिए गाँव के लोग गाँव से ही एक आदमी को चुनते थे लेकिन चारा नहीं मिल पाने की वजह से गाँव के लोग गाय-बैल को इस वर्ष नहीं चराना चाहते। अब गाँव के जितने भी गाय-बैल हैं, उन्हें गाँव के लोग आज़ाद छोड़ देते हैं, जिससे फसल को बहुत ही ज़्यादा नुकसान होता है। तो गाँव के कुछ लोग अपने गाय-बैल को घर से दूर जंगलों में ले जाकर छोड़ देते हैं, जिससे उन्हें अन्य जानवरों से खतरा भी होता है।


इस स्थिति की वजह से हर साल गाय-बैलों की संख्या में कमी होती नज़र आ रही है। गाय-बैलों को ऐसे ही आज़ाद छोड़ देने से वे रोड के किनारे बैठे रहते हैं। कहीं-कहीं देखा गया है कि पशु रोड के बीच में ही बैठे रहते हैं, जिससे ददुर्घटनाएं होती हैं और गाय-बैलों की मृत्यु हो जाती है।


गाय-बैल ना होने से किसानों को नुकसान

आवारा घूम रहे गाय-बैल।


अगर गाँव में गाय व बैल ना हों, तो गाँव के लोगों को नुकसान उठाना पड़ेगा, क्योंकि गाय-बैलों से ही खेत को उपजाऊ बनाया जा सकता है और खेती की उपजाऊ शक्ति बढ़ाई जा सकती है। गाय के गोबर से खाद बनाया जाता है, उसके मूत्र से कीटनाशक दवाई बनाई जाती है, उसके दूध से विभिन्न प्रकार के मिष्ठान बनते हैं।


गाँव में अभी गौठान तो बना हुआ है लेकिन गौठान में गाय-बैलों को नहीं ले जाया जा रहा और गाँव में गाय-बैल ऐसे ही आवारा घूमते रहते हैं, जो फसल को खा जाते हैं, जिससे किसानों को समस्या का सामना करना पड़ता है। ज़ाहिर सी बात है कि अगर गाय-बैल को चारा नहीं मिल पाएगा, तो वे फसल का नुकसान ज़रूर ही करेंगे। गाँव में चारागाह की समस्या का निष्कर्ष निकालने का प्रयास करना चाहिए और पेड़-पौधों की जो अंधाधुंध कटाई हो रही है, उस पर रोक लगाना चाहिए ताकि आने वाले कल में चारागाह की समस्या ना रहे।


नोट: यह लेख आदिवासी आवाज़ प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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