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मशीनों के बावजूद छत्तीसगढ़ के इस गाँव ने जीवित रखी है कड़िया-मूसर से धान कूटने की परम्परा

छत्तीसगढ़ में कई सदियों से आदिवासी रहते आ रहे हैं। वे जंगलों और जंगलों के आसपास निवास करके अपना जीवन बिताते थे और कई आदिवासी समुदाय आज भी इन्हीं इलाकों में रहते हैं, जहां अभी गाँव बसे हैं।


छत्तीसगढ़ के कोरिया में आज भी आदिवासियों ने सालों से चली आई प्रथाओं को जीवित रखा है। इन प्रथाओं में से एक है घर में मूसर से धान कूटना। सोनकुंवर दीदी पैनारी गाँव की निवासी हैं, जिनके घर में आज भी पुरानी पद्धतियों से धान कूटा जाता है।


वो बताती हैं, “हमारे पूर्वज अपने हाथों से बनाए हुए कड़िया-मूसर से धान से चावल निकालकर अपना भोजन ग्रहण करते थे। आजकल यह पद्धति ज़्यादा इस्तेमाल नहीं होती है। सरकार ने गाँव-गाँव में इतनी सुविधा कर दी है कि लोगों को हाथ से कोई काम करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, सब मशीनों द्वारा काम कराते हैं। रोपाई से लेकर कटाई-मिशाई और कुटाई तक सब काम मशीनों से करवाया जाता है। सरकार ने पानी की भी इतनी सुविधा कर दी है कि नहाने-धोने के लिए भी घर से बाहर नहीं जाना पड़ता है।”

सोनकुवंर दीदी के घर में लकड़ी और मिट्टी से बना कड़िया।


वो बताती हैं, “एक बटन चालू करने से घर के अंदर ही पानी आ जाता है। विज्ञान ने लोगों के कई काम बहुत आसान कर दिए हैं, घर बैठे ही लोग ऑफिस, स्कूल और पंचायत के हर काम कर लेते हैं।”


इस सुविधाओं के बावजूद छत्तीसगढ़ के आदिवासियों ने कई पुरानी पद्धतियों को जीवित रखा है। पुराने दिनों में धान कूटने वाली मशीन यानि चक्की नहीं हुआ करती थी। ऐसे समय में आदिवासी अपने हाथों से मेहनत कर अपना धान कुटाते थे।


अब गाँव-गाँव में चक्की तो आ गई है लेकिन कोरिया के आदिवासी बहुत कम मात्रा में चक्की से धान कुटाते हैं। यदि घर में कुछ कार्यक्रम जैसे, शादी-विवाह या कोई त्यौहार हो जहां गाँव के कई लोगों के लिए खाना बनाना पड़ता है या हाथ से धान कूटने का समय ना हो, तभी चक्की का इस्तेमाल होता है।


ऐसे कूटा जाता है छत्तीसगढ़ के आदिवासी गाँवों में धान


सोनकुवंर दीदी ने हमें धान कूटने का तरीका दिखाया। सबसे पहले धान को एक घंटे तक धूप में सुखाया जाता है। यह करने से धान का जो चावल है, वह कूटने से नहीं टूटता। एक घंटे बाद धान को उठाकर छाया में रखकर थोड़ी देर तक धान को ठंडा होने के लिए रखा जाता है।


धान कूटने के लिए भी कई वस्तुओं की ज़रूरत पड़ती है, जैसे कड़िया, मुसर, चलनी और सूप। सबसे पहले चलनी से धान को चाल लेते हैं, जिससे धान में जो कंकड़ और पत्थर होते हैं, वे निकल जाते हैं। फिर सूप से धान को साफ कर लेते हैं और उसके बाद कूटना शुरू करते हैं। धान को तीन बार कूटना पड़ता है। हमारी आदिवासी भाषा में पहली बार को मूड़ फोड़ना, दूसरी बार को पछालना और तीसरी बार को छंटना बोलते हैं।

सोनकुवंर दीदी चलनी से धान चालते हुए।


मूसर के बारे में बताते हुए सोनकुवंर दीदी कहती हैं, “हमारे यहां मेरे पिताजी अपने हाथों से मूसर बनाते थे। यह बनाने के लिए वजनदार लकड़ी की ज़रूरत होती है। जैसे- खैर, ताकि मूसर बनाने के बाद फटे ना। मूसर के नीचे घोड़े की नाल जैसे- लोहे को लगाया जाता है। कड़िया के अंदर गोल लकड़ी की 5-6 इंच की गहराई बनाई जाती है।


इसके किनारे की थोड़ी चौड़ाई बढ़ाकर मिट्टी से छाप दिया जाता है। कड़िया के अंदर जो खोल होता है, इसमें धान डालकर उपर से मुसर को उठाकर कड़िया में गिराते हैं। इन दोनों के टकराव मे धान कूटा जाता है। दीदी ने यह भी बताया कि कड़िया में धान कूटने का यह नियम है कि तीन बार कूटे बिना उस चावल का भोजन नहीं बना सकते।


कड़िया-मूसर से धान कूटकर भोजन बनाने के लाभ


आदिवासियों का मानना है कि कड़िया-मूसर से कूटे हुए चावल का भोजन बनाने से शरीर को बहुत लाभ होता है। बहुत दिनों से बिमारियों से लड़ रहे लोगों को घर के कूटे हुए चावल का माड़ बनाकर प्रतिदिन पिलाने से मरीज़ के शरीर में ताकत बढ़ जाती है।

ऐसी है हमारे गाँव की परम्परा। क्या आप भी कोई पुराने पद्धति का इस्तेमाल आज भी करते हैं?


नोट: यह लेख आदिवासी आवाज़ प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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