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महिलाओं को सम्मानित करें, लेकिन उनका सम्मान करना ना भूले

लेखिका- वर्षा पुलस्त


हर एक महिला हमेशा कामकाजी जीव होती है।


विश्व भर में 8 मार्च को महिलाओं को उनके काम और मानव जात में योगदान के लिए पहचाना और सम्मानित किया जाता है। शहरों में तो इसके प्रति काफी जानकारी है। लेकिन छत्तीसगढ़ में बसे एक छोटे से आदिवासी गांव, बिंझरा में भी गांववासियों ने इसे बड़े हर्श उल्हास से इस दिवस को मनाया और महिलाओं को प्रोत्साहित करने का प्रण लिया।


राजनीतिक अधिकारों से हुआ महिलाओं का उत्थान


बिंझरा गांव में महिला दिवस के लिए खास कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें समस्त गांव और ग्राम सभा प्रस्तुत थे। ग्राम सभा में महिलाओं का खास योगदान रहा है। इसलिए भूतपूर्व सर पंच श्री शंभू शरण जी ने महिला पंच एवं गांव के सभी महिलाओं को श्री फल द्वारा सम्मानित किया गया।


महिलाओं के उत्थान के लिए सभी महिलाओं को जागरूक किया गया। प्रगति करने के लिए महिलाओं का पथ प्रदर्शन किया गया कि किस तरीके से आगे बढ़ सकें। महिलाओं के उत्थान के लिए आशीर्वचन बोले गए।


1993 में संविधान में 73 वीं और 74 वीं संशोधन ने महिलाओं के लिए पंचायत और मुनिसिपल में 33% सीट आरक्षित किए गए। परन्तु आज भी महिलाओं को चुनाव लड़ने और भागी होने का अवसर तो मिलता है, लेकिन प्रोग्राम्स और नीतियों में फैसला लेने और उन्हें लागू करने का हक सीमित है।

महिलाओं को सम्मानित किया गया


महिलाओं और गांव के विकास को साथ लेकर चलें


आदिवासियों ने समझा है कि महिलाओं के उत्थान को प्रमुख विकास से अलग नहीं देखा जा सकता। यानी, अगर पूरे गांव का विकास होगा तभी महिलाएं भी प्रगति करेंगी। उसी प्रकार,जब महिलाएं उन्नति करेंगी, तभी गांव का भी विकास होगा। इन दोनों को साथ लेकर चलना ही उचित है।


गांव के विकास के लिए गोंठन विकसित करने की योजना बनाई गई। गांव के स्थानीय भाषा में लोग गोशले को गोंठन कहते हैं। इसे स्थापित करने के लिए महिलाओं की समिति गठित हुई।


व के विकास के लिए “नरवा गरवा घुरवा” से संबंधित कुछ चर्चा की गई। नरवा गरवा घुरवा यानी गाय को रखने का स्थान, उन्हें भोजन देने और उनके गोबर से ऊर्जा बनाने के पूरे प्रक्रिया को बोलते हैं। इसके बनाने और संभालने की पूरी ज़िम्मेदारी महिला समिति को सौंपी गई। महिलाओं को प्रशिक्षण देने की भी बात हुई कि मवेशियों के सेहत का ध्यान किस प्रकार रखना है और गोबर से जैविक खाद कैसे बनाना है। इस खाद को फिर बेचा जाएगा जिससे महिलाओं को रोज़गार मिलेगा।


महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और रासायनिक खाद का प्रयोग कम होगा जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति नष्ट होने से बचेगी। साग सब्जी की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और पौष्टिक होगी जिससे बीमारी कम होगी। महिलाओं की उन्नति से पूरे गांव का विकास होगा।


महिला दिवस का इतिहास


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक मज़दूर आंदोलन से उपजा है। इसका आंदोलन का बीज रोपण साल 1908 में हुआ था जब 15,000 औरतों ने न्यूयॉर्क शहर में मोर्चा निकालकर नौकरी में कम घंटों की मांग की थी। इसके अलावा उनकी मांग थी कि उन्हें बेहतर वेतन दिया जाए और मतदान करने का अधिकार भी दिया जाए। एक साल बाद सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने इस दिन को पहला राष्ट्र महिला दिवस घोषित कर दिया। हर साल 8 मार्च को महिलाओं को सम्मानित किया जाता है और महिला दिवस मनाया जाता है।


इस दिन की शुरुआत पहली बार 1909 में हुई थी। अमेरिका में पहली बार 28 फरवरी को महिला दिवस मनाया गया था। यूरोप में महिलाओं ने 8 मार्च को पीस ऐविट विस्टस का समर्थन करने के लिए रैलियाँ की थी। वही अधिकारी तौर पर यूनाइटेड नेशंस ने 8 मार्च 1975 को पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया था।


सम्मानित करना, लेकिन सम्मान नहीं


महिला दिवस पर महिलाओं को सम्मान दिया जाता है। इसमें विश्व स्तर पर हम विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों का सम्मान करते हैं। उन महिलाओं के व्यक्तित्व को स्वीकार करते हैं जिन्होंने अपने क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। पुरस्कारों और भाषणों से सम्मानित किया जा सकता है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वे असल में इज़्ज़त होती।


महिला दिवस पर सम्मानित होना गर्व की बात होगी। लेकिन मणिपुर की 8 साल की जलवायु परिवर्तन एक्टिविस्ट्स, लिसिप्रिया कंगुजम ने प्रधान मंत्री द्वारा निमंत्रण को ठुकरा कर मिसाल कायम की है। उनका कहना है कि अगर प्रधान मंत्री उनकी बात नहीं सुनते और पर्यावरण की रक्षा नहीं करते, तो उन्हें सम्मानित करने का कोई तुक नहीं बनता।

महिलाओं के लिए अनमोल वचन


बिंझरा के कार्यक्रम में ये प्रण लिए गए:

  1. नारी सृष्टिकर्ता की सर्वोत्तम कृति होती है। वह सृष्टि के संपूर्ण सौंदर्य को आत्मसात किए रहती है।

  2. नारी की कर्बला अंतर्गत का उच्चतम विकास है, जिसके बल पर समस्त सदाचार ठहरे हुए हैं।

  3. किसी भी समाज की उन्नति उस समाज की औरतों की उन्नति से मापी जा सकती हैं।

  4. हर दुख दर्द सहकर वह मुस्कुराती है, पत्थरों की दीवारों को औरत ही घर बनाती है

  5. नारी ही शक्ति है। नारी घर की शोभा है, उसे उचित सम्मान मिले, घर में ख़ुशियों के फूल खिले। जीवन की कला को अपने हाथों से साकार कर नारी ने सभ्यता और संस्कृति का रूप निखारा है। नारी का अस्तित्व सुंदर जीवन का आधार है।

ये प्रण हमें महिलाओं के महत्व को उजागर करते हैं। इनके अलावा हमें सचेत रहने की जरूरत है कि हम महिलाओं को इतने महान जीवों के रूप में भी ना देखे कि हम उन्हें सारे मानवीय विशेषताओं से खारिज कर दें। जैसे, हम ऐसा ना सोचे कि महिलाएं ग़लतियाँ नहीं कर सकती या वे सदैव संपूर्ण समाज के लिए ही काम करें। ऐसा करने से हम महिलाओं को उनकी व्यक्तिगत आजादियों और इक्चाओं से पारित कर देते हैं। हमें उन्हें इंसान की तरह देखना है जिसकी अपनी क्षमता, उम्मीद और लक्ष्य है।


नदी की तरह हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए


महिलाओं को नदी की तरह हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए। जिस तरह नदी में कुछ भी डाला जाए वह रुकती नहीं है, पर बहती रहती है; नदी के रास्ते में कई बड़े-बड़े पत्थर आते हैं, चट्टानें आती हैं, नदी अपने प्रवाह से पत्थरों को हटा देती है। महिलाएं अपनी खुशी के लिए दूसरों पर निर्भर ना रहे। महिलाओं को अपने भीतर आनंद खोजना चाहिए जिस काम पर मन लगता है, उसे एकाग्रता से करना चाहिए। महिलाओं को स्वास्थ्य रहने के लिए शिक्षित होने और खुश रहने का पूरा अधिकार होना चाहिए।


महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए ज़रूरी है कि उन्हें राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अधिकार और आज़ादी मिले। ये तीनों एक दूसरे से मिले हुए और एक दूसरे पर निर्भर करते हैं। जैसे, जब तक हम महिलाओं को घर में रखने का सामाजिक प्रथाओं से नहीं उभरेंगे, महिलाएं बाहर जाकर शिक्षा या रोज़गार नहीं कर पाएंगी। दूसरी बात, हम बातों को अमल करें। महिलाओं के लिए किए गए वादे या नीतियाँ सिर्फ शब्दों या कागज़ों में ना रह जाए, बल्कि उसे वास्तविक बनाया जाए। आख़िरी बात, ये ना भूले कि महिला दिवस की शुरुआत कामकाजी महिलाओं ने अपने हकों की लड़ाई से शुरुआत की थी। इसलिए, महिलाओं को निरंतर अपने हकों के लिए लड़ते रहना है।

लेखिका के बारे में- वर्षा पुलस्त छत्तीसगढ़ में रहती हैं। वह स्टूडेंट हैं और पेड़-पौधों की जानकारी रखना और उनके बारे में सिखना पसंद करती हैं। उन्हें पढ़ाई करने में मज़ा आता है।



यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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