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यह वाद्य-यंत्र है त्रिपुरा के आदिवासियों की संस्कृति का अहम भाग

वाद्य-यन्त्रों के बिना जनजातीय लोक-संगीत का अस्तित्व अकल्पनीय है। आदिवासी इन्ही स्व-निर्मित वाद्य-यंत्रों की धुन पर शादी और अन्य पर्वों में गा- बजाकर उत्सव मनाते आए हैं।सरेंदा/सयेंदा(Sarenda/ Saenda) भी ऐसा ही एक लोकप्रिय वाद्य-यन्त्र है। बहुत वर्षों से त्रिपुरा के आदिवासी शादी व अन्य समारोह में इस ही यन्त्र को बजाते हुए मंगल-गान करते आए हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि बहुत पहले से इंसान त्यौहार और शादी पर वादक समूह (ऑर्केस्ट्रा) सरेंदा बजाकर मधुर गायन प्रस्तुत करता था।

सरेंदा/सयेंदा (Sarenda/Saenda)


त्रिपुरा राज्य के सिपाहीजाला जिला के छोटे से एक गाँव में पचासी वर्षीय बुज़ुर्ग श्री.सौदागर देव वर्मा रहते हैं।सौदागर देव वर्मा जी कई सरे वाद्य-यन्त्र बजने में कुशल हैं। वह अपने हाथों से वाद्य-यन्त्र बनाने के लिए भी जाने जाते हैं। वह सयेंदा पर अक्सर एक गीत की धुन बजाते हैं। कोकबोरोक (Kokborok) भाषा के इस गीत के बोल हैं जादूनि रचाबमु्ग (Jaduni rwchapmung)।”Jaduni” का मतलब है गाने का नाम,”rwchapmung” का मतलब है गाने को गाना।

श्री.सौदागर देव वर्मा


सारेंदा बजाते हुए गाए जाने वाले गीत दिल को छू जाने वाले होते हैं। ये गीत बहुत ही सच्चे मन से गाए जाते हैं। सरेंदा की धुन पर शोक-गीत या विरह के गीत अधिक गाये जाते हैं।


सरेंदा से निकलने वाला संगीत इतना मार्मिक होता है कि ये गीत गाते समय किसी और संगीत बजाने के साधन की आवश्यकता नहीं होती।


पुरानी सदी में इस वाद्य-यन्त्र की तान पर कई सारे गाने लिखे गए हैं। उनमें से एक गाने के बोल कुछ इस प्रकार हैं-

Twi toko rokoi tongphuru boro thangnani boro himnani khorokgo thok phulsa phulsa wngkha,


Biyangle himnani biyang thangnani e ee …ee… ee… ee …ee…


Oooo…..oooo….ri-kwthar kansa kansa mwnai em….em….em…


Sawi kwlangdi Anu mwnai sawi kwlangdi Anu…


त्रिपुरा के आदिवासियों का इस गीत से और इस जैसे कई गीतों से यह गहरा भावनात्मक जुड़ाव है।

अंगखोर/ डुलुप (Angkhor/Kham/Dulup)


अगला वाद्य-यन्त्र जिसकी बात हम इस लेख में करेंगे, कोकबोरोक (Kokborok) भाषा में उसका नाम अंगखोर (Angkhor) या डुलुप (Dulup) है।इसे बनाने में षेरर की लकड़ी, बकरी की खाल, गोल छल्ला, लामबि पशु की खाल के रोएं, राख, और चिपकाने के लिए थोड़ी-सी गोंद (Gum) की ज़रूरत होती है। इसको बनाने में लगभग एक महीना लगता है। अंगखोर की संगीतमय थपकियों पर भी कई गीत बनाए गए हैं। ऐसे ही एक गीत के बोल नीचे दिए गए हैं।


Khulumu ama nono mwnakno norwi pohorni sugar phiyokgui rwdi nwngno,

Khulumu ama nono nobar sibmabai nobar ninangui mwnwio nilarkhe khumo bwkhrwi oo… ama…ok…ama

Nobar sibmabai nobar ninangui mwnwio nilarkhe khumo bwkhrwi,

Khaoje tongmani paisokgui khumo rwnw Nini yakungo

Mwnakno norwi pohorni dugar phiyokgui rwdi nwngno,

Khulumu ama nono mwnakno norwi pohorni dugar phiyokgui rwdi nwngno

Khoktwtwi khwlai tisai tisai khorang kungkila pungtiro kuhu kuhuma oo… ama…oo…ama..

Aboto ama khwnade khwnaya hobai salbai sichajakno,

Mwnakno norwi pohorni dugar phiyokgui rwdi nwngno,

Khulumu ama nono.


यह गीत त्रिपुरा के आदिवासी मां दुर्गा की उपासना में गाते हैं। यहाँ (Osa mwtai) Osa का अर्थ है दुर्गा और mwtai माता की मूर्ति को कहते हैं। है।


आज के दौर में इन वाद्य-यंत्रों के पाराम्परिक नामों को भूलकर नए और अलग नाम दिए जाने लगे हैं। हमारे समाज के अधिकतर लोग इनके बारे में जानते ही नहीं है। आज ज़रूरत है कि त्रिपुरा के आदिवासी समाज के युवा अपनी संस्कृति से जुड़े इन वाद्य -यंत्रों के विषय में न केवल स्वयं जानें, बल्कि आगे भी इसका प्रचार-प्रसार करें।


About the author: Khumtia Debbarma is a resident of the Sepahijala district of Tripura. She has completed her graduation and wants to become a social worker. She spends her free time singing, dancing, travelling and learning how to edit videos.


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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