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लड़कियों का कांड विवाह है भुंजिया आदिवासीयों की संस्कृति का अहम भाग

जिला गरियाबंद में विकासखंड स्तरीय आदिवासी नृत्य प्रतियोगिता एवं युवा महोत्सव नवम्बर में आयोजित होता है। इस कार्यक्रम के माध्यम से आदिवासी क्षेत्र के लोगों को मंच तक आने का और अपनी संस्कृति को अच्छे ढंग से प्रस्तुत करने का मौका मिला। आदिवासियों की कई संस्कृतियाँ लुप्त हो रही हैं। इन संस्कृत्यों को मंच के माध्यम से देखने को मिला।

पिछले नवम्बर इसके अध्यक्षता श्री बैसाखू राम साहू जी (अध्यक्ष जिला कांग्रेस कमेटी गारियाबदं) और माननीय श्री अमितेश शुक्ल जी पूर्व सांसद थे। इस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि श्री नरेंद्र देवांगन जी (महामंत्री पिछडा वर्ग एवं वरिष्ठ अधिवक्ता गरियाबंद ) थे। उसके साथ आदिवासी संप्रदाय के समाज प्रमुख को मंच पर निर्णायक के लिए बिठाया गया था, और शासन प्रशासन स्तर से मोहित मोगरे पन्नालाल देवांशी, यशवंत सॉरी, नरेंद्र ध्रुव, लता मोगरे भी निर्णायक थे।

अनेक समुदायों से आदिवासी शामिल

आदिवासी समुदाय गोंड, भुंजिया, कमार, सिदार से लोग इसमें शामिल रहें। इसके साथ साथ विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह के लोंगो ने भी भाग लिया था।

महोत्सव के प्रतिभागी


कांड विवाह

इस महोत्सव में भुंजिया समाज द्वारा कांडा बारा या कांड विवाह के बारे में दिखाया गया, जिसमें पीपरछेड़ी के कलाकारों ने भाग लिया। इस प्रस्तुति को द्वितीय स्थान प्राप्त किया गया और उन्हें इसके लिए पुरस्कार भी दिया गया।

भुंजिया जाति की लड़कियों का 8 से 10 साल के बीच में काडावारा एवं कांड विवाह करते हैं। उन्हें सफेद साड़ी पहनाई जाती है। कच्ची हल्दी को पीसकर तेल के साथ मिलाकर लड़की के शरीर में लगाया जाता है। समाज के नियम अनुसार कांड विवाह होने के बाद यह लड़की सामाजिक बंधन में बंध जाती है और समाज के नियमानुसार उस पर नियम कानून लागू हो जाते है। इसी प्रथा को इस महोत्सव के दौरान मंच के माध्यम से लोगों सामने प्रस्तुत किया जाता है। कांड विवाह करने से पहले देवी देवता का पूजा पाठ किया जाता है और महुआ पेड़ की भी पूजा की जाती है और मुर्गा मुर्गी की बली दी जाती है।

लड़कीयों के सर पर बांधा गया मौरदिनवारी द्वारा छिन्द का मौर बनवाया जाता है और लड़की को सर पर बांधा जाता है और तीर को भी मौर बांधकर लड़की को तीर पकड़ाया जाता है। तीर को भी तेल-हल्दी चढ़ाया जाता है। सभी देवी-देवताओं को गीत के माध्यम से सेवा जोहार करते हैं। घर से लेकर ग्राम के देवी-देवता और नवागढ़ से लेकर छत्तीसगढ़ के देवी-देवता एवं पुराना माटी गुडाराज की देवी-देवता के गुणगान करते हैं। बाजा गाजा के साथ में भावार किया जाता है और रात्रि कालीन में चिना गीत बड़वनी गीत एवं पारंपरिक गीत में रात भर मडवा जागते हैं। देवी देवता को पान की पोतकी में महुआ दारु चढ़ाई जाती हैं।

कांड विवाह की देखरेख एवं जिम्मेदारी महिलाओं के साथ रहते है। कांड विवाह में महिलाओं की विशेष भूमिका होती है। यह कार्यक्रम 2 दिन का होता है- पहले दिन देवता को सेवा जोहार करते हैं और बुलाते हैं, दूसरा दिन रात भर नाचते हैं और विदा करते हैं और रात्रि कालीन में समाज को मांदी भात खिलाते हैं। यह संस्कृति कई सदियों से चली आ रही है। इसलिए आज भी भुंजिया समाज के लोग अपने परंपरा को निभाते है।

कांड विवाह का उद्देश्य

कांड विवाह का मुख्य उद्देश्य यौन स्थिति में आने से पहले समाज के नियम कानून लड़कियों पर लागू करने के लिए किया जाता है। लोग मानते है की जितनी जल्दी लड़कियों को समाज के नियम क़ानून सिखाए जाए, उतना अच्छा होता है; छोटी उम्र में नियम कानून सिखाने से लड़कियाँ जल्दी सीख जाती हैं। इस विवाह के बाद लाल बंगले से संबंधित नियम कानून भी उस पर भी लागू हो जाते है। कांड विवाह नहीं करने से उस लड़की की शादी समाज में नहीं हो सकती, इसलिए कांड विवाह करना बहुत आवश्यक है।

ऐसे इस कार्यक्रम में भुंजिया आदिवासियों की संस्कृति को दर्शाया जाता है। इस महोत्सव के दौरान अलग अलग समुदायों के आदिवासी भाई- बहन एक साथ आकर अपनी संस्कृति के बारे में जागरूक होते है और इन्हें बचाने का महत्व और भी ज़ाहिर हो जाता है।

लेखक के बारे में- खगेश्वर मरकाम छत्तीसगढ़ के मूल निवासी हैं। यह समाज सेवा के साथ खेती-किसानी भी करते हैं। खगेश का लक्ष्य है शासन-प्रशासन के लाभ आदिवासियों तक पहुंचाना। यह शिक्षा के क्षेत्र को आगे बढ़ाना चाहते हैं।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था


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