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लिपाई से करते हैं छत्तीसगढ़ के आदिवासी दीपावली का स्वागत

दीपावली भारत में बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है, अलग-अलग समुदाय के लोग एक साथ आकर इस दीपों के त्यौहार को मनाते हैं। हमारे छत्तीसगढ़ में भी गाँव में दीपावली बड़े जोश से मनाते हैं। मेरे गाँव में दीपावली की, जिसे देवारी भी कहते हैं, इसकी तैयारी बहुत पहले से शुरू होती है। क्या होती है ये तैयारी?

फोटो साभार- खाम सिंह मांझी


दीपावली से पहले लोग, ट्रैक्टर लेकर ऐसी जगह जाते हैं, जहां मिट्टी बड़ी मात्रा में उपलब्ध हो। मिट्टी को खोदकर इकट्ठा किया जाता है और इसे घर लेकर जाते हैं।

यह मिट्टी किसलिए इस्तेमाल होगी? लिपाई के लिए! दीपावली के पहले हमारे गाँव के साथ-साथ कई गाँव के आदिवासी अपने घरों की लिपाई करते हैं।

फोटो साभार- खाम सिंह मांझी


मिट्टी को घर लाने के बाद उसको चूर्ण बना दिया जाता है। फिर मिट्टी में पानी डालकर उसे भिगोया जाता है। भीगी मिट्टी को एक घंटे तक वैसे रखा जाता है, ताकि वह ठीक से भीगे।


मिट्टी पूरी तरह से भीगने के बाद उसमें गोबर मिलाया जाता है। लोगों के अनुभव से हमें पता है कि मिट्टी में गोबर डालने से उसकी पकड़ ज़्यादा होती है। गोबर को मिट्टी में पहले रापां से फिर पैरों से मिलाया जाता है। मिश्रण अच्छे से करने के लिए हाथों से भी उसे फिर से मिलाया जाता है।


इसके बाद ज़मीन के ऊपरी स्तर को फावड़े से निकाला जाता है और ज़मीन को झाड़ू लगाया जाता है। ज़मीन साफ होने से लिपाई अच्छे से पकड़ लेती है, फिर होती है लिपाई शुरू!

फोटो साभार- खाम सिंह मांझी


दीपावली के पूर्व की यह महत्वपूर्ण प्रथा है। आदिवासी अपने घरों को दीपावली से पहले लिपाई से सजाते हैं, क्योंकि लोगों का मानना है कि भगवान राम और माता लक्ष्मी दीपावली के अवसर पर हर घर आते और निवास करते हैं और इन देवताओं के घर आने से बड़ी खुशहाली होती है।


लोग यह भी मानते हैं कि यह प्रथा रामायण काल से चली आ रही है। जब श्री राम, रावण का वध करके अयोध्या लौटे, तो पूरे अवध के निवासी अपने राज्य को मिट्टी की लिपाई से सजाने लगे और मिट्टी के दीये बनाकर हर घर में दीये जलाकर राम, लक्ष्मण और सीता का स्वागत किया।


दीपावली त्यौहार के समय नए फसल से निकले हुए चावल, उड़द मखना, लौकी, आदि को मिलाकर खिचड़ी बनाते हैं और उसे गौ माता को खिलाते हैं। ऐसे करते हैं हमारे गाँव के आदिवासी दीपावली की तैयारी, आपके यहां कैसे होती है यह तैयारी?



लेखक के बारे में- खाम सिंह मांझी, छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। उन्होंने नर्सिंग की पढ़ाई की है और वो अभी अपने गाँव में काम करते हैं। वो आगे जाकर समाज सेवा करना चाहते हैं।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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