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वन अधिकार के लिए रायपुर में हुई वन स्वराज आंदोलन की सभा और रैली

लेखक: खगेश्वर मरकाम


“हमें जल, जंगल और ज़मीन से बे दखल ना करें। हमें हमारा हक़ चाहिए। हमारे जल, जंगल और ज़मीन से हमें बे दखल न करें।” ये है आदिवासियों की गुहार।


इसी को अमल करते हुए संपूर्ण छत्तीसगढ़ के आदिवासियों ने महासभा का आयोजन किया। संविधान में सुझाए गए वन अधिकार अधिनियम और पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) को लागू करने की मांग की। १८ नवंबर, २०१९ को आदिवासियों ने ऐतिहासिक अन्याय को ख़त्म करने के लिए वन राजस्व आंदोलन के लिए विशाल रैली निकाली और धरना प्रदर्शन किया।

वन अधिनियम को लागू करने के लिए धरना प्रदर्शन


देश में आदिवासी मूल निवासियों की पारंपरिक लोकतांत्रिक सुशासन व्यवस्था का सम्मान करते हुए पेसा और वनाधिकारी कानून लागू है। इन कानूनों से आदिवासियों को अपने क्षेत्र में अनुकूल नीतियाँ निकालने और उन्हें पालन करने का अधिकार है। ये जल जंगल ज़मीन पर सामुदायिक मालिकाना हक़ और नियंत्रण को मान्यता देती है।


वन अधिकार अधिनियम और पेसा को आदिवासियों के हित में जारी किया था। वन अधिकार अधिनियम का उदेश्य वन और यहाँ के जीव जंतुओं का संरक्षण है। इसमें जंगल में रह रहे आदिवासियों को पहचाना जाता और उन्हें जंगल के संरक्षण की अनुमति दी जाती है। उसी प्रकार, पेसा से आदिवासी क्षेत्रों में शासन के लिए यहाँ के क्षेत्रीय पंचायत को पहचान मिलती है। इससे पंचायत गाँव के मुद्दों पर निर्णय ले सकती है, जिसे अन्य अधिकारियों और सरकार को सम्मान करना होगा। गांव या जंगल में माइनिंग, डैम, वृक्षों की कटौती इत्यादि प्राजेक्ट्स के लिए ग्राम पंचायत से सहमति लेना अनिवार्य है।


छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का कहना है कि इन क़ानूनों का पालन नहीं होता। इस कारण आदिवासी न तो अपने गांव घर को संरक्षित रख पाते, न ही जल-जंगल को बचा सकते। सरकार ने कानून बनाते वक्त वादा किया, पर जब पंचायत या आदिवासियों की आवाज़ सुनने की बारी आती है, तो उसे अनसुनी कर देते है।


अपनी बात को रखने के लिए रायपुर के बूढ़ा तालाब पर राज्य भर से आदिवासी एकत्रित हुए। इस सभा में माननीय श्री सोहन पोटाई (सांसद- बस्तर), अरविंद नेताम (पूर्व आई एस), श्री महेंद्र (नेता), और नरेन्द्र ध्रुव और लोकेश्वरी जैसे स्थानीय एक्टिविस्ट्स ने भी आदिवासियों को समर्थन बढ़ाया। उन्होंने अपनी मांग राज्यपाल को सौंपी। आदिवासियों ने शर्त रखी कि अगर मांग पूरी नहीं हुई तो आदिवासी इससे भी भारी जनसंख्या में वन और राजस्व आंदोलन रैली निकालेंगे।

एक्टिविस्ट्स ने उपस्थिति देकर आदिवासियों का समर्थन किया


महत्वपूर्ण कानून का उद्देश्य था कि संविधान की पांचवी अनुसूची के मद्देनज़र देश के वन क्षेत्र के लोकतांत्रिक प्रबंधकीय व्यवस्था ग्राम सभा के प्रभुत्व में स्थापित की जाए।


वन अधिकार कानून का कार्यान्वयन छत्तीसगढ़ सरकार का चुनावी मुद्दा और वादा भी रहा है। इसे प्रभावी रूप से अमल करने के लिए कई कार्यक्रम घोषित किए गए। अफसोस, ये सिर्फ वादों में ही रह गए हैं। वन अधिकार और स्वराज के क़ानूनों का पालन सही से नहीं किया जा रहा है। इसके लिए सरकार की कारपोरेटपरास्त नीतियाँ, प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव जिम्मेदार है।


पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार देश के ७८.२९ मिलियन हेक्टर पर घने जंगल हैं। लेकिन, जंगल अब काम होते जा रहे है; आदिवासी क्षेत्रों में ६७९ स्क्वेयर किलोमीटर के जंगल खत्म हो गए हैं। छत्तीसगढ़ के कुल क्षेत्र का ४६% हिस्सा में जंगलों का राज है। लेकिन, खनिजों के लिए इन जंगलों को काटकर नाश किया जा रहा है। इन्हें संरक्षित करने के लिए पेसा की अहम भूमिका है। पेसा के जरिए आदिवासी अपने ग्राम सभा में ये बात रख सकते हैं कि पेड़ों को काटा जा सकता है या नहीं, या माइनिंग किया जा सकता है या नहीं। जंगल से खास और करीबी रिश्ता होने के कारण उन्हें जंगलों और वातावरण की सही जानकारी होती है। यानी पर्यावरण के नज़रिए से भी पेसा एक बहुत ताकतवर हथियार है।


लेकिन देश के शासक वर्ग और पूंजीपतियों के दबाव से पेसा का उलंघन हो रहा है। माइनिंग, डैम या जंगल काटने के लिए स्थानीय लोगों से अनुमति तो दूर की बात है, उनसे बातचीत भी नहीं होती और ना ही उनकी चिंताओं पर विमर्श किया जाता।


वन अधिकारियों के समर्थन से वन्यजीव संरक्षणवादी संस्थाओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट ने २००८ से वन अधिकार के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई शुरू की, जिस पर केंद्र और राज्य सरकार ने आदिवासियों को जंगल से हटाना का ऐलान किया था। परिणामतः कोर्ट ने लाखों आदिवासी परिवारों को जंगल से बेदखल करने का आदेश सुनाया, जो स्थगित है, पर बेदखली का खतरा टला नहीं है।


२०१४ से २०१६ के बीच वन अधिकार एवं पेसा कानून का उल्लंघन करते हुए ग्राम सभा की सहमति के बिना केंद्र सरकार ने ५७,००० हेक्टेयर जंगल जमीन कंपनियों को दे चुकी है। ऐसे भी आदेश पास किए गए हैं कि खनिज संपदा जाँचने तथा पता लगने पर वन जमीन का डाइवर्जन किया जा सकता है। ऐसे में माइनिंग लीज देने तथा कंपनियों के लिए लैंड बैंक बनाने इत्यादि के लिए ग्राम सभा की कानूनी सहमति जरूरी नहीं है। इस तरह आदिवासियों की आवाज़ दबाई जा रही है। इसमें लोकतांत्रिक नियमों और संविधान का भी उलंघन हो रहा है।


कंपनी, सरकार और शहरी लाइफस्टाइल को बनाए रखने के लिए आदिवासियों पर अत्याचार किया जा रहा है। लेकिन ये अब और सहा नहीं जाएगा। सरकार को आदिवासियों की मांग पूरी करनी होगी। आखिर जंगल ही हमारा वन राजस्व है, जिसके लिए आज़ादी के आंदोलन के समय छत्तीसगढ़ में जंगल सत्याग्रह चला था।


लेखक के बारे में- खगेश्वर मरकाम छत्तीसगढ़ के मूल निवासी हैं। यह समाज सेवा के साथ खेती-किसानी भी करते हैं। खगेश का लक्ष्य है शासन-प्रशासन के लाभ आदिवासियों तक पहुंचाना। यह शिक्षा के क्षेत्र को आगे बढ़ाना चाहते हैं।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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