top of page

स्वामी विवेकानंद की मूर्ति में कहीं खो ना जाए गोंडवाना का ऐतिहासिक बूढ़ा तालाब

रायपुर (छत्तीसगढ़) के स्वामी विवेकानंद सरोवर में स्थापित स्वामी विवेकानंद की मूर्ति लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज़ है। 2005 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसका अनावरण किया था।


स्वामी विवेकानंद, उनकी 37 फीट ऊंची मूर्ति और इस पर्यटक सरोवर के बारे में आपको लोगों, किताबों और इंटरनेट पर बहुत जानकारियाँ मिल जाएंगी। लेकिन इस प्रत्यक्ष समृद्धि के पीछे एक ऐसा इतिहास भी है, जो इस विराट मूर्ति के साए में धूमिल हो रहा है।


रामकृष्ण मिशन के अनुयायियों और समर्थकों के लिए ये स्वामी विवेकानंद के बचपन के दिनों की याद है, जहां वे इस सरोवर में अपने दोस्तों के साथ गोते लगाते थे। लेकिन इस सरोवर का बहुत लंबा और महत्वपूर्ण इतिहास रहा है, जिसे आदिवासियों और संपूर्ण भारतवासियों को जानना और याद रखना चाहिए।


सरोवर का इतिहास

रायपुर का पहला तालाब


भले ही आज ये सरोवर देश-दुनिया में स्वामी विवेकानंद सरोवर के नाम से मशहूर है, लेकिन रायपुर के स्थानीय जनता और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों में ये सरोवर तो “बूढ़ा तालाब” से ही प्रचलित है। ये रायपुर का सबसे पुराना तालाब है। इसके निर्माण का आदेश राजा रायसिंह जगत ने 13वीं शताब्दी में दिया था।


दुर्ग के दिलीप सिंह गोंड बताते हैं कि इसका उल्लेख गोंडवाना साहित्यों में मिलता है। राजा रायसिंह जगत अपनी सेना “लाव लश्गर” को लेकर चांदा राज्य होते हुए जा रहे थे, तब उन्होंने इसके निर्माण का आदेश दिया था। आगे बढ़ने के लिए पुरैना, टिकरापारा में एक तालाब खुदवाया।

बूढ़ा तालाब


इस तालाब की खुदाई 12 एकड़ भूमि में उनके साथ चलने वाले स्त्री-पुरुषों ने शुरू की। मात्र 6 महीनों में श्रमिकों और कारीगरों ने इसका निर्माण पूरा कर, रायपुर को उसका पहला तालाब उपहार दिया। इसकी खुदाई में 3,000 पुरुष एवं 4,000 स्त्रियों ने काम किया। हाथी और बैल जैसे शक्तिशाली जानवरों का भी उपयोग खुदाई में किया गया था। कृषि औजारों का भी खुदाई कार्य हेतु अधिकतर उपयोग किया गया।


जब तालाब बनकर पूरा हो गया तो इसका नामकरण गोंड समुदाय के ईष्टदेव “बूढ़ादेव” के नाम से किया गया। स्थानीय जनता इसे आज भी बूढ़ादेव या बूढ़ा तालाब के नाम से जानती हैं। राजा रायसिंह ने इसी के चारों ओर नगर बसाया, जिसका नाम “रयपुर” था। अंग्रेजों के समय यह “रायपुर” हो गया। बूढ़ा तालाब के अलावा भी अनेक तालाब बनाए गए हैं। दुख की बात है कि बहुतों का नामो निशान मिट चुका है।


रहस्यमई सुरंग


बूढ़ातालाब के साथ एक और छोटा तालाब “कंकालिन तालाब” भी बनवाया गया था। हालांकि बाकी तालाब लुप्त हो गए हैं, लेकिन कंकालिन तालाब आज भी मौजूद है। बूढ़ातालाब और कंकालिन तालाब के बीच लगभग एक किलोमीटर की दूरी है। कंकालिन तालाब का स्रोत एक कुंड से होता है जो अभी भी अस्तित्व में है। ये इस तालाब को खास बनाता है। तालाब के बीच एक छोटा सा मंदिर है।


कंकालिन तालाब की गहराई बूढ़ातालाब से ज्यादा है। ये हमेशा से गौर किया गया है कि बूढ़ातालाब का जल स्तर कंकालिन तालाब के जल स्तर को भी प्रभावित करता है। इसलिए ऐसी मान्यता भी है कि बूढ़ातालाब और कंकालिन तालाब को जोड़ने वाली एक “आंतरिक सुरंग” है।


सुरंग में बे शुमार संपत्ति के रखे जाने की बात भी कही जाती थी। इसलिए अंग्रेजों ने इसे ढूँढने का प्रयास किया था। अंग्रेजों ने इस सुरंग को तलाशने का काफी प्रयास किया था। अंग्रेजों को सुरंग का मुख्य कपाट कंकालिन तालाब के मंदिर के नीचे मिला। लेकिन उसे खोलने में वे असफल रहे। सारी कोशिश बेकार हुई और उन्हें कुछ भी पता नहीं लगा। समय के साथ सुरंगों के मुंह मलबे से बंद हो चुके हैं।


तालाब से लगा हुआ माता कंकालिन का मंदिर है। इस मंदिर में गोंडवाना की माता: माता कंकालिन विराजित है। इसलिए इस तालाब का नाम कंकालिन तालाब रखा गया है। इस मंदिर की महिमा के जानकार लोग यहाँ दूर दूर से मन्नत मांगने आते हैं। यहाँ कोई पंडित पुजारी का काम नहीं करता बल्कि गोंड़ आदिवासी यहाँ का सेवक है। मंदिर का कपाट साल भर बंद ही रहता है। साल भर में एक बार केवल चैत्र नवरात्र को ही खोला जाता है। यह खंडहर नुमा मंदिर अपनी प्राचीनता लिए अभी भी खड़ा है।


मंदिर छोटी पहाड़ी के टापू पर बना हुआ नजर आता है। यह छोटा टापू किसी खंडहर महल का बिखरा हुआ मलबा प्रतीत होता है। इस मंदिर के करीब से ज़मीन लोगों ने कब्ज़ा कर घर बना लिया है।


सरोवर विशेषज्ञ हैं आदिवासी


आदिवासियों में तालाब बनाने की विशेष कौशल रही है। इतिहास वैज्ञानिक और लेखक बताते हैं कि आदिवासियों को तालाब, नहर और कुएं बनाने के लिए खास तौर पर बुलाया जाता था। वे मेहनती होते थे। मिट्टी और भूगोल के ज्ञान से वे सटीक तरीके से बता पाते थे कि पानी कहां मिलेगा।


उनमें खुदाई करने की पारंपरिक जानकारी और ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपी जाती थी। अनुपम मिश्रा ऐसी ही एक और समुदाय का उल्लेख करते हैं जो तालाब बनाने में माहिर थी। ये थी ओढ़ समुदाय जो बंजारा वे राजस्थान से लेकर, मध्य प्रदेश और आंध्र तक तालाब बनाए हैं।


कैसे मिट रही है गोंड आदिवासी सभ्यता


बूढ़ातालाब के बीचों बीच एक छोटा सा टापू है। इसी टापू में बूढ़ादेव का प्रतीक स्थापित है। इस टापू में जाने के लिए रास्ता बना हुआ है, जहां लोग नित पूजा करने के लिए जाते हैं।


ये उनके आस्था का स्थल है। इसी टापू पर राज्य सरकार ने स्वामी विवेकानंद की बड़ी मूर्ती स्थापित की है। अपने सरकारी दस्तावेजों में इसे विवेकानंद सरोवर के रूप में दर्जा दिया है, किंतु इसे इस नाम से कोई नहीं जानता।

बूढ़ा तालाब में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति


आदिवासी समाज हमेशा से इस नाम का विरोध करते आया है। इसे पर्यटक स्थल बनाने से इस स्थान पर आदिवासी गोंडी श्रद्धालु पूजा अर्चना के लिए नहीं आ पाते। ऐसे में ना सिर्फ आदिवासियों का अतीत मिट रहा है, बल्कि उनका प्रस्तुत और भविष्य में भी उनकी संस्कृति और रीतियाँ समाप्त हो रही है। भविष्य में गोंडी आदिवासी और आम जनता नहीं जानेंगे कि इस स्थल पर उनके पूर्वजों ने रायपुर का सबसे पहला सरोवर बनाया था। वे भविष्य में यहां आजाद रूप से आ और जा नहीं पाएंगे और अपनी परंपराओं को निभा नहीं पाएंगे।


इन कारणों से आदिवासी इस सरोवर स्थल के नाम का विरोध कर रहे है। गोंडवाना के लोगों के द्वारा बनाया गया इस बूढ़ातालाब का नाम विवेकानंद सरोवर रखा जाना आदिवासियों में दुर्भावना को पैदा करता है। इसका विरोध अभी भी किया जा रहा है, किंतु सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। यह आदिवासियों के लिए बड़ी दुख की बात है।


आदिवासियों का विरोध स्थल


दर्ज करने की बात है कि ये स्थान आदिवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ये उनके इतिहास, कौशल, ईश्वर भगवान, पूजा के रीति-रिवाजों से जुड़ा हुआ तो है ही, इसके अलावा ये आदिवासियों का विरोध स्थल भी है। जब भी आदिवासी समुदाय को महसूस होता है कि कोई कानून उनके हित में नहीं है, तो उसका विरोध यहीं पर होता है। शायद यह स्थल आदिवासियों को अपने संस्कृति, इतिहास और अस्तित्व पर गर्व और खुद में साहस देता है।


१८ नवंबर, २०१९ को आदिवासियों ने वन राजस्व आंदोलन के लिए बूढ़ा तालाब से एक विशाल रैली निकाली और धरना प्रदर्शन किया था। इसके अलावा भी काफी रैलियाँ यहीं से शुरू की जाती हैं।


बूढ़ा तालाब एक अकेला उदाहरण नहीं


पिछले कुछ वर्षों में विकास को विशाल मूर्तियों और भव्य प्रदर्शनी में मापा जा रहा है। जबकि उन्नति का सही आकलन लोगों के उनके विकल्प चुनने की काबिलियत और आज़ादी में होनी चाहिए। विवेकानंद की मूर्ति अकेली नहीं है जिसने आदिवासियों से उनका इतिहास और अस्तित्व पर हमला किया है। गुजरात में सरदार वल्लभभाई पटेल की 597 फूट की मूर्ति को सबसे ऊंची मूर्ति का गर्व हासिल है।


लेकिन इस गर्व पे दाग लग जाता है जब मालूम होता है कि इसे स्थापित करने के लिए हजारों आदिवासियों की ज़मीन ली गई है; संविधान की 5वी अनुसूची का उल्लंघन हुआ है; आदिवासियों के रोज़गार और पुनर्वास के वादों को भुला दिया गया है और मानव और आदिवासी कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई की गई है। आदिवासियों की पीड़ा को उनके विरोध नारे “तुम्हारा पर्यटन, हमारा विनाश” से समझा जा सकता है।


बूढ़ा तालाब एक अद्भुत तालाब है जो इतिहास, आर्किटेक्चर (वास्तु कला), संस्कृति और मानव कौशल की एक मिसाल है। गोंड आदिवासियों को इसका सही श्रेय मिलना ही चाहिए। अथवा, बूढ़ा तालाब पर नियांतर हक के लिए विरोध और प्रदर्शन जारी रहेंगे।


नोट: यह लेख खगेश्वर मरकाम ने दीप्ति मिंज के सहयोग से लिखा है।



लेखक के बारे में- खगेश्वर मरकाम छत्तीसगढ़ के मूल निवासी हैं। वो समाज सेवा के साथ खेती-किसानी भी करते हैं। खगेश्वर का लक्ष्य है शासन-प्रशासन का लाभ आदिवासियों तक पहुंचाना। वो शिक्षा के क्षेत्र को आगे बढ़ाना चाहते हैं।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

Comments


bottom of page