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गर्मी में पौधों की सुरक्षा करने हेतु छत्तीसगढ़ के आदिवासी स्कूल में पहुंची ड्रिप इरिगेशन

गर्मी में जब तापमान ४० डिग्री के ऊपर पहुंच जाता है तब पौधों को नियमित रूप से पानी देना अनिवार्य होता है।


शिवम जोशी द्वारा संपादित

फेके गए ग्लूकोज की बोतल से बानी ड्रिप सिस्टम

भारतीय ग्रीष्मकाल अपनी तीव्र गर्मी के लिए जाना जाता है। अक्सर तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है जो आम जनता के लिए बहुत सारी समस्याएं पैदा करता है। मनुष्यों के अलावा, छोटे पौधों और फूलों की झाड़ियों को भी निर्जलीकरण और अधिक ताप की समस्या का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में पौधों को बचाना बहुत मुश्किल कार्य होता है। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाके के स्कूल ने जुगाड़ू "ड्रिप इरीगेशन" की प्रणाली तैयार की है जिससे गर्मियों में पौधों को भीषण ताप से बचाया जा सके।


यह स्कूल है कटरा गांव का प्राइमरी स्कूल जहाँ के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने बिना किसी खर्च के एक सिस्टम तैयार किया है जिसे ड्रिप सिस्टम कहते है। इसके माध्यम से पौधों को मनुष्यों की आवश्यकता के बिना नियमित रूप से पानी मिलता है। यूँ तो इस सिस्टम को तैयार करने में बहुत पैसे खर्च हो जाते हैं, लेकिन यहाँ के शिक्षकों ने बहुत अच्छा तरीका निकाला है। उन्होंने डॉक्टर द्वारा ग्लूकोज का इस्तेमाल कर फेके बॉटल का उपयोग करते हुए पानी डालने का पात्र तैयार किया जिसको एक बार भरने पर वो काफी घंटों तक पौधों को पानी देता रहता है। शिक्षक कहते हैं की बाल्टी में पानी भर-भर के डालने से ज्यादा अच्छा उसमे लगातार थोड़ा-थोड़ा, बून्द-बून्द गिरना। इससे लगातार नमी बनी रहती है। सिंचाई करने के इस तरीके को हिंदी में टपक पद्द्ति कहा जाता है। यहाँ के स्कूल में लगभग 60 के आसपास पौधे लगे हुए हैं जिसमे कुछ फलदार है और कुछ फूलदार। इन्हें अत्यधिक गर्मी से बचाने के लिए देसी जुगाड़ बनाया गया है। इस देसी जुगाड़ से पानी सीधे पौधों के जड़ो में पहुँचता है।


जब मैंने ग्राम गरकटरा के रहने वाले समयदास से पूछा तो उन्होंने बताया कि वे यहाँ के प्राइमरी स्कूल में साफ सफाई का कार्य करते है। उनको यह काम करते हुए 7-8 साल हो गए हैं। साफ सफाई के साथ वे स्कूल में अच्छी फुलों के पौधें लगाते है, जिससे स्कूल के आंगन सुंदर दिखे। वह कहते है - "गर्मी के दिनों में पौधे को बचाने के लिए यहाँ के शिक्षकों ने एक तरीका निकाला है जिसमे ग्लूकोज की बोतल में पानी भरकर, उसके पाइप की सहायता से लगातार बून्द-बून्द पानी पौधों के जड़ो में पहुंचाया जाता है। इसी गर्मी में जब लॉक डाउन हो गया तो स्कूल बंद हो गए, ऐसी स्थिति में हर 2 से 3 दिन में इस ग्लूकोज की बोटल मैं पानी डाल देता था। इस स्कूल में खाना बनाने के लिए महिलाओं का एक समूह भी है, तो वे लोग भी इन पौधों में पानी डालने आती थी। 9 लोगो के समूह में लोग शामिल हैं, तो बारी बारी से 2 लोग आते थे। इस ड्रिप सिस्टम को उपयोग में लाने के लिए इस स्कूल के शिक्षक श्रीकांत सर ने इस सिस्टम को तैयार किया है। इसमें इन्ही की सबसे अहम भूमिका है। लॉक डाउन होने के बाद भी वे यहाँ बीच-बीच मे देखने

आते रहते थे।"


ऐसे कार्य सहयोग से होते है


शिक्षक बताते है कि इस स्कूल में लगे पौधों को पानी देने में स्कूल के शिक्षक, गांव के लोग तथा स्कूल के बच्चो, सबका सहयोग है। जब पहले यह देसी जुगाड़ नहीं था तो रोज पौधों को पानी देना पड़ता था, लेकिन इस ड्रिप सिस्टम से अब रोज नहीं आना पड़ता है, बल्कि सप्ताह में 2 या 3 दिन ही पानी देना पड़ता है।।


ग्रीष्म ऋतु में सुख जाते है हैंडपंप


गढ़ कटरा गांव प्राइमरी स्कूल के 300 मीटर के दायरे में हैंडपम्प लगा हुआ है। लेकिन गर्मी के दिनों में सभी हैंडपम्प सुख जाते है क्योंकि गर्मी में पानी का जल स्तर बहुत नीचे चला जाता है। जिससे पानी सिंचाई करने के लिए बहुत ज्यादा परेशानियां होती है, लेकिन अब इस जुगाड़ू ड्रिप सिस्टम से पौधों को सिंचाई करने में सुविधा होती है।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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