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छत्तीसगढ़ के भुंजिया समाज पारम्परिक नृत्यों के जरिये अपने आदिवासी पहचान को बचा रहे हैं

भुंजिया जनजाति, एक ऐसी विशेष पिछड़ी जनजाति समुदाय है, जिसे छत्तीसगढ़ सरकार ने गोद लिया है।

इस जाति के लोग छत्तीसगढ़ के गरियाबंद, महासमुंद और धमतरी जिला तथा ओड़िशा के कुछ में क्षेत्रों में रहते हैं। इनकी रहन-सहन, वेषभूषा या यूँ कहें कि पूरी संस्कृति ही औरों से बहुत अलग है।


आदिकाल से भुंजिया समुदाय के लोग जंगल तथा पहाड़ों पर निवास करते आ रहे हैं। इन्हें जंगलों से ही अपनी आजीविका चलाने के लिए पर्याप्त मात्रा में सब कुछ मिल जाता है, जैसे कि - लकड़ी, फल, फूल, रस्सी, जड़ी - बूटी, पानी, शुद्ध हवा आदि। इस समुदाय के लोग अपनी ही दुनिया में खुश रहना चाहते हैं, शहर में रहना इन्हें बिल्कुल पसंद नहीं है। बाहरी दुनिया से कोई मतलब नहीं रहने के कारण इन लोगों का प्रकृति से अत्यधिक लगाव रहता है।

यहाँ पर स्वागत के लिए नृत्य किया जा रहा है।

भुंजिया समुदाय के लोग प्राकृतिक चीजों से श्रृंगार करना पसंद करते हैं, जैसे- महुआ, गुंजन, हर्रा आदि के फूलों की माला। महिलाएँ अपने बालों को सजाने के लिए मयूर पंख या जंगल के फूलों का इस्तेमाल करती हैं।

उसी तरह खाने में भी यह समुदाय कंद-मूल, फल-फूल एवं शिकार करके अपना जीवन यापन करते आ रहे हैं। परन्तु अब धीरे-धीरे जंगल खत्म होते जा रहे हैं, और शिकार करना बंद हो गया है। ऐसे में भुंजिया समाज की परंपरा एवं संस्कृति विलुप्त होती जा रही है। अब लोग गाँवों में निवास करने लगे हैं। दूसरे समुदायों के लोगों को देख कर के अपने को भी बदल रहे हैं।


परंतु अभी भी ऐसे बुजुर्ग एवं युवा हैं जो अपने समुदाय की परंपरा को बचाए रखना चाहते हैं, इन्होंने नृत्य को इसका जरिया बनाया। भुंजिया के नृत्य में उनकी पूरी संस्कृति झलकती है।


शादी-विवाह, अथिति के स्वागत आदि खुशी के पलों में ये नृत्य किये जाते हैं। इस नृत्य में भुंजिया लोगों को साल के पत्ते, तेंदू के पत्ते, महुआ के फूल आदि चीज़ें लगाए पूरे वेशभूषा एवं श्रृंगार के साथ देखा जा सकता है। ये अपने हाथों में अपने पूर्वजों से मिले तीर-कमान लिए रहते हैं।

भुंजिया समाज में तीर कमान पकड़ने की परंपरा

क्योंकि पहले शिकार के जरिये ही इनका जीवनयापन हो पाता था तो ऐसे में तीर-कमान की बहुत बड़ी भूमिका होती है। आजकल शिकार करना कम हो गया है, परंतु शास्त्र चलाना भूले नहीं हैं। तीर कमान से सुरक्षित होने की भावना भी बनी रहती है।

इन्हीं महत्वपूर्ण कारणों की वजह से तीर-कमान को भुंजिया समुदाय देवी देवता के साथ पूजते हैं। सामाजिक कार्यक्रमों, शादी विवाह आदि में तीर चलाने की प्रथा है।

भुंजिया जनजाति के लोग तीर कमान जैसे ही और भी अनेक चीज़ें साथ लेकर चलते हैं, जैसे:-

'सरई के पत्ते' - इसे कमर तथा सिर में बांधकर रखने से शरीर को ठंडक पहुंचती है।

पहले लोग ज्यादातर चुंगी बनाकर पानी आदि पीते थे, इसलिए पत्ता को साथ में रखते थे, ताकि उसे पत्ता ढूंढने की जरूरत ना पड़े। उस पत्ता से पोतकी बनाकर मधु रस भी पीया करते थे और ज़रूरत पड़ने पर ‘मौहालाटा’ खाने के उपयोग में भी लाते थे।

'तुमड़ी' - यह एक प्रकार का जंगली फल तूमा से बनती है। इसकी बनी रस्सी पानी को ठंडा रखती है, इसे कंधे में लटका कर रखा जाता है।


'ढुठी' - बांस से बनी ढुठी को कमर में बांध के रखा जाता है, मछली पकड़ने के दौरान, पकड़ी गई मछलियों को इसमें रखा जाता है।


इस समुदाय के लोग कहते हैं कि, "इस तरह की कई चीज़ें हैं जो हमारे पूर्वजों के द्वारा धरोहरों के रूप में हमें मिला है, और हम अपने इन धरोहरों को बचाए रखना चाहते हैं।"


भुंजिया जनजाति के लोग अपने नृत्यों के दौरान कई तरह के पारंपरिक गीतों को गाते हैं, जैसे- भडौनी, कर्मा तथा ददरिया गीत। इस दौरान निशान, डफरा, मोहरी, झुमका, ठुडबुडी इत्यादि वाद्य यंत्रों को भी बजाया जाता है।

इनके गीतों तथा नृत्यों में गाँव, जंगलों आदि से जुड़े कहानियों की झलक मिलती है।

जैसे यह गीत:-


"बाटें- बाटें हिंडत रैहनु हम्हीं मिल्लो पैसा

होय नांहकांय कोलिया चीन्हा, मिल्लो पैसा"


गीत का अर्थ है - रास्ते पर चलते चलते दो लोगों को जब रास्ते में ही कुछ पैसा मिल जाता है, तो वे इतना खुशी होते हैं, जैसे कि भटकते हुए सियार को मुर्गा मिल जाता है।


उपरोक्त जानकारियाँ हमें, जिला- गरियाबंद, ग्राम- गोडलबाय के निवासी श्री चमार राय भुंजिया एवं श्री गाडाराय भुंजिया द्वारा बताया गया।


यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अन्तर्गत लिखा गया है जिसमें Prayog Samaj Sevi Sanstha और Misereor का सहयोग है l





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