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क्रिकेट प्रतियोगिता के जरिए सामाजिक एकता और भाईचारा को बढ़ाते हैं चेरवा जनजाति के लोग

छत्तीसगढ़ के अधिकतर जनजाति पिछड़े हैं और जंगलों तथा गाँवों में निवास करते हैं, इन क्षेत्रों में विकास न होने से लोग भी शिक्षा और आधुनिकता से दूर ही हैं। आज भी ज्यादातर लोग जंगलों में जाकर शिकार और जंगलों से प्राप्त कंदमूल, फल-फूल का उपयोग अपने जीविका पालन में करते हैं।


ऐसा ही एक जनजाति है चेरवा, इस जनजाति के लोग छत्तीसगढ़ में मुख्यतः पेंड्रा रोड, बिलासपुर, कोरबा, सरगुजा, कोरिया, सूरजपुर,रायगढ़, एवं बलरामपुर जिले के आसपास रहते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरह का होता है। इस समुदाय के लोग ज्यादातर बड़े परिवारों में रहते हैं, ये अपने परिवार में ज्यादा जनसंख्या को महत्त्व देते हैं। कई लोगों का सोच है कि जब यह लोग बूढ़े हो जाएंगे तब जितने ज्यादा बच्चे रहेंगे वह सब उनकी मदद करेंगे और आखिरी समय में उनके सहारा बनेंगे। इसके कारण इनमें शिक्षा का भी अभाव होता है और इस समुदाय के ज्यादातर लोग गरीब हैं। लेकिन समय के साथ-साथ जैसे ही ये अन्य विभिन्न समुदायों के संपर्क में आ रहे हैं, धीरे-धीरे इनका भी सोच बदल रहा है और ये भी विकास कर मुख्यधारा में जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

करम डाल गाड़कर पारम्परिक तरीके से प्रतियोगिता की शुरुआत की जाती है।

इन जनजाति के ज्यादातर लोग बाँस की झोपड़ी, या मिट्टी के घरों में छोटे-छोटे समूह बनाकर रहते हैं। छोटे-छोटे समूह में रहने के कारण इनमें एक दूसरे की मदद करने की, सामूहिक एकता आज भी बनी हुई है। जैसे - यदि किसी के यहाँ कभी कोई मृत्यु हो जाए या किसी की शादी-ब्याह में अड़चनें आ रही हों तो ऐसे में गाँव के सभी लोग आगे आकर मदद करते हैं। चेरवा जनजाति के पुरुष कमर से नीचे छोटा सा गमछा और ऊपर कुर्ता या बनियान एवं सिर में एक छोटा सा गमछा बांधे रहते हैं। महिलाएं घुटनों से लेकर पूरे हाथ में यहाँ तक कि गले और सीने में भी गोदना करवाती हैं, हालाँकि यह रिवाज समय के साथ लुप्त होता जा रहा है, परन्तु बूढ़ी महिलाओं में आज भी गोदना देखा जा सकता है। इस समुदाय के लोग फागुन, बायर, गौरा, कर्मा, हरेली, ददरिया, आदि त्योहार समय-समय पर मानते हैं। ये लोग आज भी अपनी पुरानी परंपराओं के अनुसार ही इन त्योहारों को मनाते हैं। इन त्योहारों में शराब पीने की प्रथा प्रचलित है, इन समुदाय में महिला हो या पुरुष दोनों ही शराब का सेवन करते हैं।


चेरवा जनजाति के लोग छत्तीसगढ़ के अलग-अलग क्षेत्रों क्षेत्रों में निवास करते हैं आधुनिकता के साथ इनका समाज और भी अधिक बिखरता जा रहा है। ऐसे में समाज के बुजुर्गों एवं वुद्धिजीवियों ने सोचा कि शादी-ब्याह के अलावा भी कोई कारण होना चाहिए जिसमें समाज के लोग एक दूसरे के करीब आ सकें ताकि सब मिलकर इस आदिवासी संस्कृति को बचाए रखा जा सके। इन्हीं सोच के साथ इस आधुनिक दौर में गया कि आज के आधुनिक समय में समुदाय के युवाओं के बीच क्रिकेट प्रतियोगिता आयोजन किया जाता है। प्रत्येक वर्ष सभी जिले से चेरवा जनजाति के 15-15 खिलाड़ियों को 2-3 दिन के लिए एक स्थान पर बुलाया जाता है, सभी खिलाड़ियों के रहने और खाने की व्यवस्था भी की जाती है। मकसद सिर्फ़ खेलकूद ही नहीं होता है बल्कि खेल के जरिए समुदाय के लोग एक-दूसरे से मिलकर भाईचारा बढ़ाते हैं, और साथ-साथ अपने संस्कृति के भी विभिन्न आयामों पर चर्चा करते हैं। इस दौरान हज़ारों की संख्या में समुदाय के अन्य लोग दर्शक के रूप में पहुँचकर अपने-अपने टीमों के खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाते हैं।


इन क्रिकेट प्रतियोगिताओं की अपार सफलता को देखते हुए समाज के बुद्धिजीवियों ने निर्णय लिया है कि, आगे से क्रिकेट ही नहीं बल्कि और भी अनेक खेलों के आयोजन करके समुदाय के लोगों को साथ लाया जाएगा।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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