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बदलते मौसम से परेशान हैं ग्रामीण आदिवासी

इस साल मौसम के बदलते स्वरूप ने छत्तीसगढ़ के लोगों को बहुत प्रभावित किया है। इसका प्रभाव शहरों के साथ-साथ, ग्रामीणों पर भी पड़ा है। छत्तीसगढ़ स्थित कोरबा जिले के ग्राम रिंगनिया एवं उसके आस पास के सभी गाँवों में ठंड का गहरा असर हुआ है। ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार ठंड से उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा है।

ठंड के वजह से बर्बाद हुए टमाटर के फसल

ग्रामीण आदिवासी प्राचीन काल से ही स्वालंबी रहे हैं और आज भी वे अपने स्वयं द्वारा निर्मित वस्तुओं का उपयोग करते हैं, खुद खेती करके अनेक प्रकार के साग सब्जी लगाते हैं, शीत ऋतु में तो अधिकांश मात्रा में सब्जियां लगाई जाती हैं। छत्तीसगढ़ के लगभग सभी आदिवासी घरों में लोग सब्जी लगाते हैं, और बाज़ार पर कम ही आश्रित रहते हैं। किन्तु इस वर्ष मौसम में कई बार हुए अचानक बदलाव से उनके फसलों पर बुरा असर हुआ है। बार-बार बादलों के घिरने और ठंड अधिक पड़ने के कारण जितने भी साग-सब्जी लगाए गए थे, वे मरने लगे हैं, यह ग्रामीण आदिवासियों के लिए चिंताजनक विषय है। कुछ आदिवासी सब्जियों को बेच कर अपना जीवनयापन करते थे। अर्थात् एक प्रकार से ये उनके लिए धन का एक स्रोत था। उनका यह स्रोत भी अब ठप हो गया है।


लगातार बारिश गिरने के कारण ठंड बढ़ गया और ठंड बढ़ने से सब्जियों को धूप की सही मात्रा न मिलने के कारण वे अधिक मात्रा में मरने लगे हैं जिससे ग्राम वासियों को बहुत नुकसान हुआ है। ग्रामीण किसान सब्जियों के साथ-साथ दलहन आदि की भी खेती करते हैं जिसे वे लंबे समय के लिए इकट्ठा करके रखते हैं। किन्तु इस वर्ष लगातार बारिश होने से पर्यावरण का तापमान कम हो गया और ठंड बढ़ गया साथ ही बादलों के छाए रहने से दलहन के फसल भी मरने लगे।

चूल्हे में जलती लकड़ियां

ग्रामीण क्षेत्र के लोगों में हर मौसम के प्रति सहनशीलता शहर की अपेक्षा अधिक होता है। फिर भी सहनशीलता की भी सीमा होता है उससे अधिक कोई नही सह सकता। इस बार ऐसा ही हुआ है, अधिक ठंड पड़ने से ग्रामीणों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। ग्रामवासी बरसात व ठंडी के लिए सूखी लकड़ी इकट्ठा करके रखते हैं ताकि उन्हें बरसात व ठंड में आग जलाने के लिए लकड़ी ढूंढने की ज़रूरत न पड़े। लेकिन इस वर्ष जंगल में सूखी लकड़ी कम मात्रा में होने के कारण गाँव के लोग अधिक मात्रा में सूखी लकड़ी इकट्ठा नहीं कर पाए। जिससे उन्हें भारी ठंड का सामना करना पड़ा है। जितने भी लकड़ी इकट्ठा किए हैं वह उनके भोजन बनाने में ही इस्तेमाल हो जाता है। आग तापने के लिए लकड़ी की कमी पड़ जाने की समस्या रही है।


मानसूनी हवाओं के बदलने से इस वर्ष ठंड के दिनों में पहले की अपेक्षा अधिक मात्रा में ठंड पड़ा। बढ़ती ठंड के कारण ग्रामीण आदिवासियों को सर्दी, जुकाम, खांसी आदि समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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