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वर्तमान में, मल्लाहों का जीवन स्तर कैसा है

पंकज बांकिरा द्वारा सम्पादित


मल्लाह, सदियों से भारत में निवास कर रहे हैं। जो भारत के मूलनिवासी माने जाते हैं। वे नाव चलाते आए हैं और मछली पकड़ने का काम करते हैं। रामायण में भी उल्लेख है, जिसमें ‘राम’ को एक मल्लाह ने अपने नाव से नदी पार करवाया था। वर्तमान में, मल्लाह का व्यवसाय, मछली पकड़ना ही रह गया है। क्योंकि, पुराने समय में, जिस पैमाने से नाव चलता था, अभी उतना नहीं चलता। क्योंकि, सभी नदियों में पुल का निर्माण हो गया है। इस कारण, नाव व्यवस्था अभी कम चलता है। नाव, केवल नदियों में घूमने के लिए ही उपयोग होता है। इस कारण, मल्लाह (केवट) नदियों में मछली पकड़ते हुए ज्यादा दिखाई देते हैं।


केवट, मछली पकड़ते वक्त, कम कपड़ा पहने रहते हैं। क्योंकि, उनको पानी के अंदर घुस कर, जाल लगाना रहता है। नदियों में, मछली पकड़ने के लिए, जाल का इस्तेमाल करते हैं। और कई लोग, मछली पालन भी करते हैं। एक गरीब मल्लाह, नारवा नदी में मछली पकड़ कर ही अपना जीवन-यापन करता है।

एक मल्लाह व्यक्ति

तस्वीर में आप देख सकते हैं कि, एक मल्लाह व्यक्ति, अपने हाथों में जाल लिए हैं और दूसरे हाथों में मछली रखने के लिए डूटी रखा है। यह व्यक्ति, प्रतिदिन, नरवा नदी में मछली पकड़ने जाते रहते हैं। यह इनका रोज का कार्य रहता है, मछली पकड़ कर लाना और उसे मार्केट में बेचना।


मल्लाह वर्षों से ही मछली पकड़ते आए हैं। यह पहले, अपने पिता के साथ मछली पकड़ने जाते थे। और उनके साथ रहकर, मछली पकड़ना और मछली जाल लगाना सीख लिए। जो, अभी इन्हें आमदनी उपलब्ध कराने में मुख्य सहायक है।

जाल फेकता मल्लाह

नदियों में चेक-डैम बना रहता है। और नरवा नदी में भी पानी रोकने के लिए, डैम बना हुआ है। ग्रामीण उसी में, मछली पकड़ने अधिक जाते हैं। क्योंकि, डैम बनने के वजह से, मछली वहां पर रुके रहते हैं। जिस में, मछली पकड़ने वाले लोग, अपना जाल फेंक कर, मछली को पकड़ते हैं। मछुआरों का जाल गोलाकार रहता है। जिसे, घुमा कर फेंकना रहता है। जाल को घुमाकर फेंकने से, जाल घूम कर पानी में जाता है। जिससे, उस जगह का पूरा मछली जाल में फंस जाते हैं। और वापस खींचने पर, मछली जाल में फंसे रहते हैं। क्योंकि, जाल को बारीकी से, अपने हाथों में बुनकर बनाए रहते हैं। जिससे छोटा-सा मछली भी उससे बाहर नहीं निकल पाता है।

मछली रखने का डूटी

मछली पकड़ने वाला व्यक्ति, अपने साथ डूटी लेकर जाता है। क्योंकि, मछली रखने के लिए, डूटी उत्तम रहता है। इस डूटी का उपयोग, छोटे मछुआरे करते हैं। क्योंकि, नारवा नदी में, छोटे-छोटे मछलियां ही मिलते हैं। और बड़ी जाल लगाने वालों के लिए, यह डूटी छोटा पड़ता है। इस कारण, उनको मछली रखने के लिए, बोरियों का इस्तेमाल करना पड़ता है।

छोटे मछली पकड़ने वाले मछुआरे, मछलीयों को, जलेबी कलर लगा कर धूप में सुखाते हैं। फिर, सूखे घास की मदद से, उसके ऊपर एक जाली का तार रखते हैं। ताकि, मछली खराब ना हो और जाली के ऊपर में, मछलीयों को बिछाते हैं। फिर, घास में आग जलाते हैं और मछली को अच्छे से भुंजते हैं। बाद में, उसे नजदीकी बाजारों में बेचने ले जाते हैं।

मछली बाजार

महिलाएं, मछलीयों को थोड़े-थोड़े हिस्से में रख कर भाग लगाती हैं और एक भाग को 20 से 50 रूपए लगा कर, बेचती हैं। ये महिलाएं, सभी नजदीकी बाजारों में, मछली लेकर जाती हैं। और दूर के बाजारों में, पुरुष लेके जाते हैं। ये लोग मछलियों को बेच कर, अपना गुजारा करते हैं। इनके पास खेती करने के लिए, जमीन भी नहीं है। जिससे खेती कर, अपने परिवार की दयनीय स्थिति को सुधार सकें। इस कारण, मजबूरन अपना परिवार चलाने के लिए, मछली पकड़ना ही उचित मानकर, मछली पकड़ते हैं।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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