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क्या है छत्तीसगढ़ के आदिवासी गाँव का अक्ति त्यौहार? जानिए लॉकडाउन के बीच कैसे मनाया गया

अक्ति त्यौहार छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। हमेशा से इसे बड़े उत्साह से मनाया जाता है। यह त्यौहार खेतों में फसल उगाने वाले किसान से जुड़ा हुआ है और आषाड़ लगने से पहले मनाया जाता है। इस त्यौहार को मनाए बिना लोग नए साल का कोई भी कृषि संबंधी कार्य नहीं करते हैं। लेकिन इस समय कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण लगे लॉकडाउन में इसका स्वरूप थोड़ा बदल गया। आइए जानते हैं कि छत्तीसगढ़ में अक्ति त्यौहार कैसे मनाया गया है।

अक्ति त्यौहार को अलग-अलग गाँव में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है I Photo by Rakesh Nagdeo

इस वर्ष लॉकडाउन होने के बावजूद गरियाबंद जिले के बनगवां ग्राम में अक्ति त्यौहार मनाया गया है। इस त्यौहार को हर गाँव में एक ही तरह नहीं मनाया जाता है। सभी गाँव का अलग-अलग नियम होता है। अक्ति त्यौहार मनाने से पहले गाँव में रहने वाले लोगों से सलाह-मंजूरी ली जाती है ताकि गाँव के लोगों का सम्मान एक दूसरे के लिए बना रहे। त्यौहार मनाने के एक दिन पहले गाँव में सूचना दे दी जाती है कि प्रत्येक घर में नल से पानी लाना मना है या अपने घर के कुआं से पानी भरना मना है। यह इस त्यौहार संबंधित हमारे गांव का पहला रीति-रिवाज व नियम है जो सदियों से चलता आ रहा है।

महुआ, चना, और धान को महुआ के दोने में रखकर पूजा की जाती है

त्यौहार के दिन ग्राम वासी शीतला माता के मंदिर के पास एक जगह इकट्ठा होते हैं। इस मंदिर के पास सब लोग अपने-अपने घर से महुआ, चना, और धान को महुआ के दोने में लेकर जाते हैं। उसके बाद वहाँ पूजा-अर्चना होती है। तत्पश्चात सब लोग एक-एक धान का दोना लेकर अपने-अपने घर आते हैं। घर के मुख्य दरवाजे पर घर का एक सदस्य जग में पानी लेकर खड़ा रहता है। उसके बाद पानी को सामने डालते हैं और दोना की पूजा करते हैं। दोने में लाये गए धान को लोग अपने घर के इष्ट देवी देवता के पास रख देते हैं।


आदिवासी पैकरा कंवर समाज वाले लोग महुआ, चना, गेंहूँ आदि को गाय के गोबर से बने हुए छेना (उपला) से भूनते हैं और शीतला माता के मंदिर से लाए गए धान को वहीं अपनी कुलदेवी के पास रख कर पूजा-अर्चना करते हैं। फिर घर के सदस्य द्वारा प्रसाद वितरण किया जाता है। घर के प्रत्येक सदस्य पूजा कर प्रसाद को लेते हैं और उसके बाद अपने-अपने खेतों पर जाकर अपने खेतों की पूजा करते हैं।

इस त्यौहार को मनाए बिना लोग नए साल का कोई भी कृषि संबंधी कार्य नहीं करते हैं

हमारे ग्राम के चैन सिंह कंवर ने बताया कि वे अपने घर से पूजा की सामग्री लेकर अपने खेत में गए और वहाँ पूजा-अर्चना किया। उन्होंने बताया कि अक्ति त्यौहार के दिन लोग अपने-अपने खेतों में जाकर एक नए फसल की शुरुआत करते हैं। इस दिन गाँव के सभी किसान अपने खेतों में जाकर अपने पुराने समय को भुलाते हुए एक नये सिरे से किसानी की शुरुआत करते हैं। बनगावां में यह त्यौहार किसानी करने से पहले मनाया जाता है। इनका कहना है कि यह त्यौहार पहले बहुत ही अच्छा होता था लेकिन अब इसमें थोड़ा बदलाव आया है। लॉकडाउन के चलते गाँव के सभी लोग एक जगह इकठ्ठा नहीं हो सकते। लॉकडाउन के कारण गाँव के सभी लोग पहले की तरह माता शीतला मंदिर में एक साथ इकट्ठा न हो कर अलग-अलग गए। कोविड-19 वैश्विक महामारी और लॉकडाउन ने इस महत्वपूर्ण आदिवासी त्यौहार पर असर डाला है लेकिन यहाँ के लोगों ने फिजिकल-डिस्टेंसिंग जैसे नियमों का पालन करते हुए जिम्मेदारी के साथ इस त्यौहार को मनाया।


यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजैक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, और इसमें Prayog Samaj Sevi Sanstha और Misereor का सहयोग है।


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