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छत्तीसगढ़ के आदिवासी मनाते है हर साल धान धर्म का छेरछेरा त्यौहार

हमारे देश में हिंदू धर्म को मानने वाले बहुत लोग है । देश के विभिन्न राज्यों में गाँव के लोग भिन्न -भिन्न प्रकार के पुरातन समय से चले आ रहे त्योहारों को बड़े ही खुश मिज़ाज और तन-मन -धन से मनाते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार तथा पौराणिक ग्रंथो के अनुसार मनुष्य को अपने कमाए हुए धन-धान को चार भागों में बाँट देना चाहिए। दान धर्म-व्यापार एवं स्वजनो की सहायता इसी का अनुसरण करते हुए हमारे छत्तीसगढ़ राज्य में दान धर्म का त्यौहार मनाया जाता है। इसे छत्तीसगढी बोली में छेरछेरा त्यौहार कहते हैं।


यह त्यौहार गाँव में कृषि फसल पूर्ण होने के बाद मनाया जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस संसार में जितने भी पर्यावरण फल-सब्जी है, उससे संबंधित शाकम्भरी देवी होती है। गाँव में लोग दान धर्म (छेरछेरा) त्यौहार का प्रारंभ करने से पहले त्यौहार के दिन प्रातः काल होते ही स्नान आदि निवृत होकर देवी की निशचित स्थान पर स्थापना करते है। सभी मिल जुल कर शाकम्भरी देवी पूजा करते हैं। इस देवी के पूजन में गाँव के मुखिया और गाँववाले महिला-पुरूष, बूढ़े -बच्चे सभी शामिल होते हैं।

पूजा-पाठ ब्राह्मण के द्वारा कराया जाता है और मन वचन कर्म एवं पूर्ण श्रद्धा भाव से सभी देवी की पूजा करते हैं। पूजा के समय लोग अपनी मन्नतें माँगते हैं। शाकम्भरी देवी सभी की मनोरथ पूर्ण करती है ऐसे लोग मानते है। कोई पुत्र प्राप्ति के लिए, तो कोई आर्थिक विकास के लिए, तो कोई सुख शांति प्राप्ति के लिए वरदान माँगते हैं। इस देवी की पूजा-अर्चना सभी के लिए कल्याणकारी है, इसलिए इस शाकम्भरी देवी की अकथनीय महिमा है।


इस पूजन के पश्चात दान धर्म का कार्य प्रारंभ हो जाता है। देवी की पूजा छत्तीसगढ़ में मात्र छेरछेरा मतलब दान धर्म के त्यौहार के दिन ही होती है, क्योंकि ईष्ट देवी या देवता के पूजन के पश्चात ही दान धर्म सार्थक होता है। यही वजह है की छेरछेरा त्यौहार के दिन ही इस देवी की पूजा की जाती है। देवी की पूजा करने के बाद सभी लोग छेरछेरा त्यौहार के रंग में रंग जाते हैं।


गाँव के किसान जो चार महीनों की खेती से धान के उपज की खुशी को मनाते है। इसी खुशी से तथा अपना मानव धर्म निभाते हुए धन और धान दोनों का अपने शुभ हाथों से दान करते है। छोटे बच्चे, बूढ़े, जवान, जो चाहे वो अपनी टोली बनाकर गाँव में दान माँगते हैं। घर -घर जाकर छेरछेरा कहना पड़ता है। यह छेरछेरा सिर्फ़ गरीब लोग ही नहीं कहते, बड़े किसान भी छेरछेरा के दिन दान माँगते है।


यह त्यौहार बहुत ही शुभ दिन होता है। इस दिन महिलाएँ टोली बनाकर घर-घर जाकर सुआ नृत्य प्रदर्शित करती है, जिससे घर के किसान खुश होकर धान और पैसों का दान देते है। सिर्फ़ महिलाएँ ही नहीं, पुरूष वर्ग भी खुशी से नाचते-गाते हैं। पुरुष भी टोली बनाकर हाथों में छोटे-छोटे डंडा लिए गोल घेरे के अंदर मृदंग, ढोल, मंजीरा के साथ गाते-बजाते हैं। इसे छत्तीसगढ़ी में डंडा नाचा कहते हैं। इस नृत्य में पुरुष एक ही रंग की धोती और कपड़ा पहनते है और सिर में कलगी भी होती है।


इस छेरछेरा त्यौहार के दिन सभी अपने-अपने घरों में स्वादिष्ट व्यंजन बनाते और खाते हैं, सभी मिलजुलकर त्यौहार का आनंद लेते हैं। छेरछेरा छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार है और इस त्यौहार में मां शाकम्भरी देवी की पूजा दान- धर्म का मुख्य भूमिका होता है। वर्ष में एक बार आने वाला यह त्यौहार छत्तीसगढ़ के निवासियों के लिए असिमित खुशीयां लेकर आता है।



लेखक के बारे में- राकेश नागदेव छत्तीसगढ़ के निवासी हैं और मोबाइल रिपेयरिंग का काम करते हैं। यह खुद की दुकान भी चलाते हैं। इन्हें लोगों के साथ मिलजुल कर रहना पसंद है और यह लोगों को अपने काम और कार्य से खुश करना चाहते हैं। इन्हें गाने का और जंगलों में प्रकृति के बीच समय बिताने का बहुत शौक है।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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