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कैसी थी गोंड समुदाय की विश्व की प्राचीन शिक्षा पद्धति, गोटूल

पंकज बांकिरा द्वारा सम्पादित


एक व्यक्ति के जीवन को सफल रूप देने में, शिक्षा का एक बहुत बड़ा स्थान होता है। शिक्षा के बिना, व्यक्ति का जीवन-यापन करना कष्टदायी होता है। लेकिन, यह जरूरी नहीं कि, वह शिक्षा आपको केवल किताब पढ़ने से आए, शिक्षा आपको आपके जीवन के तजुर्बे से भी आ सकती है। शिक्षा तो शिक्षा ही होती है, हम शिक्षा के बिना आज के समय में अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। शिक्षा के महत्व को, गोंड आदिवासी समुदाय, अपने अस्तित्व में आने के साथ ही समझ गई थी। आप को जान कर थोड़ी हैरानी हो रही होगी कि, ‘आदिवासी और शिक्षा’ यह दोनों पहले के समय में, एक साथ कैसे? किन्तु, आदिवासी समुदाय भी शिक्षा के महत्व को समझते आया है। जिसके उदाहरण स्वरूप, हमें आज भी गोंड आदिवासी समुदाय में गोटूल व्यवस्था देखने को मिलती है, जो विश्व की सबसे पुरानी शिक्षा पद्धति में से एक है। हां हम यह मानते हैं कि, आदिवासी समुदाय की शिक्षा की परिभाषा और हमारे मुख्य धारा के जीवन शैली की शिक्षा व्यवस्था की परिभाषा में अंतर है। गोंड आदिवासी समुदाय में गोटूल का होना, इस बात को पुख्ता कर देता है कि, शिक्षा व्यवस्था को आदिवासी समुदाय कितना महत्व देते आया है।

गोटूल

क्या है गोटूल?

गोंड समुदाय के अनुसार गोटूल, शिक्षा का एक केंद्र होता है। जहां गोंड समुदाय के 4 से 5 साल के बच्चे, अपने लिंगो (गुरू) से 18 साल की आयु तक शिक्षा ग्रहण करते हैं। इन 18 सालों में, उन्हें उनके समुदाय, उनकी भाषा, उनका रहन-सहन तथा उनकी गोत्र व्यवस्था आदि सिखाई जाती है। गोंड आदिवासियों ने अपने युवाओं को मजबूत करने के लिए गोटूल की व्यवस्था की, जो गांव में एक छोटी सी गुड़ी (भवन) में होता था। गुड़ी में ही बच्चों को शिक्षा दी जाती थी। गोटूल में आदिवासी बच्चों को अपने जीवन में सही निर्णय और अपने जीवन और अपने प्रकृति शक्ति के संरक्षण के बारे में ज्ञान दिया जाता था। यह व्यवस्था, आदिवासियों के अनेक जनजातियों में अलग-अलग रूपों में अलग-अलग नामों में देखने को मिलती है :-

  • दुमकुरिया जहां टुम (विद्या और कुटीर)

  • मोरुंग मो जहां मोटुर (ज्ञान और घाट)

  • गीती ओर जहां गीती (ज्ञान और ओरा)

गोंड समुदाय में गोटूल अन्य क्षेत्रों में और भी अन्य नामों से भी जाना जाता है। क्योंकि, समय और क्षेत्र अनुसार कुछ-कुछ जगह पर भाषाएं, उनकी जमीनी स्तर अनुसार थोड़ी बदलती जाती है और इसी बदलाव के चलते, गोटूल आज धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है।


गोटूल के अंदर गोड़वाना के प्रथम गुरुपारीकुपार लिंगो के कोय पूनेम से जीवन को सफल बनाने के बारे में, कोयातूर गोंड आदिवासी युवाओं को सिखाया जाता था। यह गोटूल गांव के मध्य में, एक छोटे से कुटीर के रूप में स्थापित किया जाता था। जहां युवाओं को, पूनेम के अनुसार जीवन-यापन करने को सिखाया जाता था। कोया पुनेम वो किताब है, जिसमें कोयतुर गोंड समुदाय के जीवन शैली, गोंडी भाषा और नियम आदि लिखा हुआ है। गोटूल में गोंडी भाषा के बारे में, गोंड़ियन प्रणाली, गोटूल व्यवस्था और अन्य चीजों के बारे में बताया जाता था। गोटूल में युवक-युवतियों एक साथ, एक ही कुटीर में 18 सालों तक शिक्षा ग्रहण करते थे। इतने समय में इनको इस लायक बना दिया जाता है कि, वह स्वयं अपने से निर्णय ले सकें, इनके आत्म निर्भर होने के साथ-साथ इनका आत्मविश्वास भी बढ़ाया जाता है।

गोटूल परिसर

अन्य समुदायों को गोटूल के बारे में उतना अच्छे से नहीं पता है। चूँकि, वे गोटूल के बारे में बहुत सारी आपत्तिजनक बातें बोलते हैं। वो मानने को तैयार नहीं होते कि, युवक-युवतियों एक छत में इतने सालों तक शिक्षा ग्रहण करते हैं। क्योंकि, उनके इस आधी-अधूरी जानकारी का अंदाजा हम इस बात से लगा सकते हैं कि, वे लोग गोटूल को ठीक से लिख-बोल नहीं पाते हैं। चूँकि, गोटूल और घोटूल में बहुत ही अंतर होता है।


गोटूल, गोंडवाना समुदाय के गोंडी भाषा का एक पवित्र शब्द है, जिसमें ‘गो’ का अर्थ होता है ज्ञान और टूल का अर्थ होता है स्थान। इन दोनों शब्दों के मेल से बनता है गोटूल अर्थात ज्ञान का स्थान। इस कारण से गोटूल को पवित्र स्थान माना जाता है। जबकि, घोटूल जैसा शब्द गोंडी में है ही नहीं। लेकिन, धीरे-धीरे आदिवासी समुदायों में शिक्षा की परिभाषा, मुख्यधारा के लोगों के अनुसार बदलती गई और धीरे-धीरे लोगों के बीच स्कूली शिक्षा ने प्रवेश ले लिया। इस कारण से अधिकतर स्थानों में आज गोटूल की परंपरा, हमें देखने को नहीं मिलती है। और गोंडी आदिवासी मुख्यधारा के शिक्षा में ज्यादा रुचि लेने लगे और गोटूल धीरे-धीरे कम होते गए। आदिवासी युवक-युवतियाँ अपने समुदाय के बारे में जानने-सीखने के लिए गोटूल आते थे। लेकिन, आज उन्हें अपनी संस्कृति से ज्यादा डिग्री और तथाकथित आधुनिक शिक्षा में ज्यादा रुचि होने लगी है।


आधुनिक युग के हिसाब से गोटूल का नया अवतार- कोया भूमकाल क्रांति सेना


इस आधुनिकीकरण के युग में, धीरे-धीरे गोटूल विलुप्त होता गया। लेकिन, बस्तर संभाग में कुछ युवाओं के नए जोश और अपने पुरखों के बताए गए कोय पूनेम के अनुसार, इस गोटूल को नए दौर के युवाओं को उन्हीं की भाषा में गोटूल शिक्षा प्रदान करने की सोची। जिसे आज हम कोया भूमकाल क्रांति सेना (केबीकेएस) के नाम से जानते हैं। इसका नाम पढ़कर आपको लगा होगा कि, यह कोई राजनीतिक पार्टी होगी। लेकिन, इस कोया भुमकाल क्रांति सेना का मुख्य उद्देश्य, अपने गोंड समुदाय के युवाओं को एक ऐसा मंच तैयार करके देना, जहां उन्हें अपने पुरखा शक्ति, कोया पूनेम के बारे में, अपने संविधान में दिए गए अधिकारों के बारे में, अपने गोत्र व्यवस्थाओं और नार (गांव) व्यवस्थाओं के बारे में जानने को मिले। जो काम पहले के समय में गोटूल व्यवस्था के अंदर, हमारे पूर्वज बताते थे। उसी को आज, यह मंच अपने सात दिवसीय प्रशिक्षण में आदिवासी समुदाय के युवाओं को बताती है। छत्तीसगढ़ में इसे KBKS Gotul University के नाम से भी लोग जानते हैं और इसके कुलपति श्री नारायण सिंह मरकाम जी हैं। जिन्हें वर्ष 2022 में, शहीद वीर नारायण सिंह सम्मान से छत्तीसगढ़ सरकार ने सम्मानित किया है। यह सम्मान, छत्तीसगढ़ राज्य में आदिवासी सामाजिक चेतना जागृत करने और उनके उत्थान के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्ति को सम्मानित कर, प्रोत्साहित करने के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा शहीद वीर नारायण सिंह की स्मृति में प्रदेश स्तर का सम्मान प्रदान किया जाता है।

कोया भूमकाल क्रांति सेना के गोटूल का प्रमुख उद्देश्य


कोयातुर गोंड आदिवासी समुदाय, अपने तीन सिद्धांतों पर काम करती है। यह तीन सिद्धांत, प्रकृति में हमें देखने को मिलते हैं। जिनमें टुंडा, मुंडा और कुंडा सिद्धांत है। जिनके अर्थ हम साधारण भाषा में समझे तो जीवन, परिपूर्णता और दक्षता है।


  • टुंडा - जिस प्रकार करेले के बीज को हम मिट्टी में डालते हैं, तो उस करेले के बीज से एक अंकुर उस करेले के बीच के बाहरी आवरण को छोड़कर उत्पन्न होता है। उसी तरह मानव की भी अपने मां के आवरण को छोड़कर, एक नए जीव के रूप में उत्पन्न होना होता है। जिसे हम कोयातुर गोंड आदिवासी समुदाय टुंडा के रूप में देखते हैं। टुंडा, संसार के सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधे में देख सकते हैं।


  • मुंडा - करेले के बीज से जब अंकुर उत्पन्न हो के धीरे-धीरे उसकी लताएं फैलने लगती है और उसे संभालने के लिए एक आधार, जैस की कोई लकड़ी का टुकड़ा या तो लकड़ी का एक मंडप बनाया जाता है। जिसमें करेले के लताएँ फैलते हैं और जिससे उसे आधार मिलता है। और फिर आगे चलकर वहां फल देता है। उसी तरह मानव समुदाय में मुंडा के अंतर्गत, कोयातुर गोंड आदिवासी युवाओं को निर्णय लेने की क्षमता और अपनी परिपूर्णता के बारे में गोटूल के माध्यम से ज्ञान दिया जाता है। जिससे, वह अपने जीवन के निर्णय लेने की योग्य हो सकें।


  • कुंडा - करेला जब अपने फल पूर्ण रूप से दे देता है। तब धीरे-धीरे वह मुरझाने लगता है और अपनी कुंडा अवस्था की ओर चला जाता है। उस समय, हम उसमें से उनके बीजों को संरक्षित करते हैं। जिससे हम आगे चलकर फिर से उन बीजों को मिट्टी में डालकर नए करेले के पौधे उत्पन्न कर सकें। उसी प्रकार कुंडा में, कोयतुर गोंड समुदाय के लोग अपने बड़े-बुज़ुर्गों के मृत्यु के पश्चात, उनके ऊर्जा को पानी के रूप में अपने गुप्तांग पर रखते हैं और उनका सेवा करते हैं। ताकि, वह फिर से अपने घर व अपने समुदाय में नए जीव के रूप में फिर से आए।

गोटूल में मुख्य रूप से मुंडा के नियम के अनुसार काम किया जाता है। क्योंकि, मुंडा में कोयातूर गोंड आदिवासी समुदाय को निर्णय लेने की क्षमता एवं उनकी परिपूर्णता की बात कही गई है। जब एक गोंड आदिवासी बच्चा तीन-चार साल का हो जाता है, तब उसे अपने समुदाय के बारे में जानने की और अपने समुदाय के नियम, गोत्र व्यवस्था, नार व्यवस्था के बारे में शिक्षा लेने और जानने की आवश्यकता होती है। और जिस प्रकार करेले के बीज को, मुंडा में उनकी लताओं को फैलने के लिए सहारे के रूप में लकड़ी का सहारा दिया जाता है, उसी प्रकार और आदिवासियों के लिए यह सहारा गोटूल के रूप में मिलता है। जहां जाकर, उन्हें अपने समुदाय के बारे में जानने को मिलता है। जिसमें, उन्हें कोया पुणेम की व्यवस्था, गोत्र व्यवस्था, जाति व्यवस्था आदि के बारे में बताया जाता है।


और जिस तरह किसी भी व्यक्ति की पूर्णता में विवाह महत्वपूर्ण होता है, विवाह के बिना गोंड आदिवासी समुदाय में व्यक्ति को पूर्ण नहीं माना जाता है। इस कारण से उन्हें विवाह व्यवस्था के बारे में भी अच्छे से विस्तार से ही बताया जाता है। और जब वे 18 से 19 साल का हो कर, वहां से समझदार व्यक्ति के रूप में निकलते हैं, तब वे गोत्र व्यवस्था के अनुसार अपने गोंड समुदाय के अंदर विवाह करते हैं। जिससे वे अपने 3 सिद्धांतों में से दूसरा सिद्धांत पूर्ण कर सकें। इसी सिद्धांत को पूरा करने के लिए, ‘कोया भूमकाल क्रांति सेना’ गोटूल के अंदर सात दिवसीय प्रशिक्षण में इस व्यवस्था के बारे में अच्छे से बताती है। ताकि, उन्हें टुंडा-मुंडा-कुंडा की संपूर्ण जानकारी मिल सके और आगे चलकर वे अपने समुदाय के अंदर इन बातों को बता सकें। और एक जागरूक व्यक्ति बन कर, अपने समुदाय को आगे ले जा सकें।


इसके अलावा गोटूल में बीज संरक्षण कर बीज बैंक का भी निर्माण किया जाता है। जहां, आने वाले सभी प्रशिक्षणार्थी अपने साथ अपने गांव से पांच पेड़ों के बीच लेकर जाते हैं। जिन्हें, वहां एकत्रित किया जाता है और एक बीज बैंक का निर्माण किया जाता है। इसी तरह गांव की व्यवस्था के बारे में भी अच्छे से बताया जाता है। कोया भूमकाल क्रांति सेना का उद्देश्य यह नहीं है कि, लोग आधुनिक शिक्षा को छोड़कर गोंडवाना की पद्धति से सभी लोग पढ़ाई करें। बल्कि, आधुनिक शिक्षा को ग्रहण करने के साथ-साथ, वे अपने समुदाय के रीति-रिवाजों, परंपराओं और गोत्र व्यवस्था के बारे में भी जानें। इस कोया भूमकाल प्रशिक्षण के आने के बाद, कोयातुर गोंड समुदाय के युवा शक्ति में हमें बदलाव देखने को मिलती है। अगर, आप भी इस सात दिवसीय प्रशिक्षण में आना चाहते हैं, तो यह प्रशिक्षण हर साल दिसंबर माह के शीतकालीन सत्र में, बस्तर संभाग में आयोजित किया जाता है। पधारिये और हिस्सा बनिए विश्व की सबसे प्राचीन शिक्षा व्यवस्था ‘गोटूल’ का।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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