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आदिवासियों के कॉफी की कड़वी सच्चाई

सुबह की दमदार शुरुआत करनी हो, या शाम की थकान मिटानी हो, चाय या कॉफी लोगों की पसंदीदा चॉइस है। लोग इसके इतने शौकीन हैं कि कॉफी के लिए स्टार बक्स और कॉफी कैफे डे जैसे विशेष स्थान भी हैं। कॉफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया ने अनुमान लगाया है कि भारत में कॉफी की खपत वर्ष 2000 में 60,000 मीट्रिक टन से बढ़कर साल 2011 में 1,15,000 मीट्रिक टन हो गयी| केरला, कर्नाटक और तमिल नाडु यहां के मुख्य उत्पादक हैं।

Credit: Wikipedia

आदिवासियों के कॉफी अब पूरे मार्केट में

आदिवासी क्षेत्रों और किसानों द्वारा बनाए कॉफी भी बहुत लोकप्रियता बटोर रही। आंध्र प्रदेश की सुंदर वादियों में अरुकू की खूबसूरती में कॉफी की महक भी मिली हुई है। इस आदिवासी क्षेत्र में बनता है अरुकु कॉफी जिसने वर्ष 2018 में पेरिस में बेस्ट कॉफी का खिताब भी जीता है। उसी प्रकार, ओड़िशा के कोरापुट कॉफी को भी मार्केट में लाया जा रहा है जो कोरापुट जिले के आदिवासियों द्वारा उगाए जाता है।

आरूकू कॉफी को बेस्ट कॉफी से नवाजा गया, Source: Business Traveller
ओड़िशा का कोरापुट कॉफी ओरिसा पोस्ट, Source: Orissa Post

Ministry of Trade and Commerce ने हाल ही में 5 कॉफी को geographic indication (GI) या भौगोलिक चिन्ह दिया। ये हैं :

कूर्ग अरेबिका - कोड़ागु, कर्नाटक

वायानाड रोबुस्टा- वायानाड, केरला

चिकमगलूर अरेबिका- चिकमगलूर, कर्नाटक

बबाबुदांगीरी अरेबिका- चिकमगलूर, कर्नाटक

अराकू वैली अरेबिका - आरुकू, आंध्र


गौर और गर्व की बात है कि ये सारे कॉफी आदिवासी क्षेत्र में उगाए जाते हैं।


कॉफी का कड़वा सच

कॉफी की चुस्की लेकर आप राजनीति के समाचार पढ़ते होंगे, पर क्या आप अपने कॉफी के राजनीति को जानते हैं? कॉफी उत्पादक देश जैसे ब्राज़ील, इथोपिया, और भारत सारे ही विकासशील देशों के श्रेणी में आते हैं। पिछले दशकों में विकाशील देश से विकसित देशों में निर्यात बहुत गुना बढ़ा है। आप सोचेंगे ये तो इकॉनमी के लिए अच्छा है। पर, ग्रीन इकॉनमी के नजरिए से परखे तो पाएंगे कि अधिकतम मांग और निर्यात स्थानीय पर्यावरण को हानि कर रही। मीलों दूर निर्यात करने में ईंधन का खर्चा तो अलग; पर दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, कोलंबिया, भारत जैसे देशों में कॉफी के लिए जंगल कट रहे हैं।


अपने आदिवासी अरूकू किसानों की हालत भी खराब है। विश्व स्तर पर बेस्ट कॉफी का नाम कमाने वाली इस कॉफी के किसान इसका सही दाम भी नहीं पा रहे। इस खिताब और उम्दा स्वाद की लोकप्रियता से कंपनी इसे रू150 प्रति 100 ग्राम के दर पर बेचती है। लेकिन, वांडलम बलाया (जिसे पेरिस में खिताब से सम्मानित किया गया था) के जैसे और किसानों को उनके काम के सही दाम भी नहीं मिल रहे। जहां आरुकु कॉफी के एक कप को रू150 से रू500 से दुकानों में बेचा जा रहा, किसानों को 1 किलोग्राम कॉफी बीज के पूरे रू100 भी नहीं मिल रहे।


किसान मानते हैं कि जब तक वे खुद सरकार या प्राइवेट खरीदारों को खुद बेचते थे, तब तक उनकी फ़ायदेमंद कमाई होती थी। लेकिन, 1997 में जब इंटेग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट एजेंसी ने गिरिजन कॉफी कॉर्पोरेशन को इसकी भागीदारी सौंपी, तब से उनकी कमाई में काफी गिरावट आई है। गिरिजन कॉफी कॉर्पोरेशन किसानों से बीज खरीदते और आगे बेचते, लेकिन उन्हें कम दाम देते। किसान बताते है कि इससे पहले वे ज्यादा दाम में बेचते थे। श्रमिक लागत भी किसान उठाते हैं, लेकिन अनुमानित रू2 लाख के बजाय उन्हें केवल रू80,000-90,000 मिलता है।


आज विशाखापट्टनम में स्तिथ सुंदर आरूकु घाटी की कॉफी से नंदी फाउंडेशन और महिंद्रा एंड महिंद्रा फाउंडेशन खूब मुनाफा उठा रही। 2008 में इस स्थान के नाम से कॉफी कंपनी शुरू करने का मकसद भले ही आदिवासी किसानों की आर्थिक स्थिति को बढ़ाना होगा, लेकिन, किसानों पर इसका बिल्कुल उल्टा असर हुआ है। ये काफी अजीब बात है कि अरूकु कॉफी, जिसे बेस्ट कॉफी घोषित किया गया था, भारत में खुद एक साल बाद 2019 में ही बिकने लगी।


विश्व स्तर पर क्या है किसानों की कहानी

एक स्टडी ने पाया कि हालांकि अफ्रीकी देश कॉफी उत्पाद करते हैं, पर यूरोपियन देश इन्हें आयात कर इन्हें 3 गुना ज्यादा दाम में फिर से निर्यात करती है। इस तरह असल उत्पादकों को उनका सही दाम नहीं मिलता। इथोपिया के कॉफी को चखकर यूरोपियन का ये पसंदीदा ड्रिंक हो गया। लेकिन, गिरते मुआवजे से परेशान, आज इथोपिया के किसान कॉफी की खेती छोड़ने को मजबूर हो गए हैं।

विश्व के कई भागों में कॉफी हमेशा से नहीं उगाया जाता था। जैसे, अफ्रीका के बुरुंडी में के 19 वीं सदी में बेल्जियन शासन के दौरान हुआ। पर, आज यहां के लोग इसपर 80% से भी ज्यादा निर्भर हैं और गिरती कीमतों से लाचार हो गए हैं। उसी प्रकार कोलंबिया, ब्राज़ील, वियतनाम, अरूकू और वायानाड में भी कॉफी की खेती अंग्रेजों और यूरोपियन द्वारा 18 वीं सदी में शुरू किया गया था। कुछ क्षेत्र जैसे नीलगिरी या इथोपिया में कॉफी इससे पहले भी उगाए जाते थे, लेकिन, 18 वीं सदी में कॉफी की उत्पाद इंडस्ट्रियल दर पर होने लगी। अंग्रेजों और यूरोपियन शासकों के कॉलोनी उनके लिए कॉफी उत्पाद करने का अनुकूल माहौल देते थे - इनका तापमान 18-21° से., ज्वालामुखी लाल मिट्टी और कॉफी के फलों को तोड़ने के लिए अधिक श्रम उपलब्ध था। इसीलिए, ¾ से ज्यादा उत्पाद ब्रिटेन और शासकों के देशों में निर्यात हो जाता था।


आरूकू और बहुत सारी कॉफी कंपनियां "ऑर्गेनिक" कॉफी होने का दावा करती है। साथ ही, आदिवासी, स्थानीय और गरीब किसानों द्वारा बनाए जाने से वे अपनी लोकप्रियता भी कमाते हैं। ग्राहकों को "ग्रीन वॉश" किया जा रहा। मतलब कि, ऑर्गेनिक और आदिवासी कॉफी के नाम पर खूब बिक्री तो हो रही, लेकिन, मीलों निर्यात में यातायात के लिए ईंधन जलाए जा रहे और किसानों के श्रमिक हकों का हनन हो रहा। बहुत कंपनियां fair trade का सर्टिफिकेट खरीद लेती, लेकिन किसानों को fair wages और बाकी सुविधाएँ नहीं देती।


पर्यावरण परिवर्तन

कॉफी की बढ़ती मांग के कारण फेस्ट्रिलाइजर्स और मशीनीकरण से कॉफी की उत्पाद होते हैं। पारंपरिक तौर से चलने वाले बड़े पेड़ के नीचे छांव में खेती को भुलाया जा रहा। इस तौर के खेती से कॉफी तेज धूप और तापमान से बचती है, जो पौधों को सही और पानी की खपत को कम रखता है। साथ ही, अलग प्रकार के पेड़ पौधे होने से बायोडायवर्सिटी बनी रहती है जो मिट्टी को उपजाऊ रखती है। इथोपिया जैसे देशों में मोनोकल्चर फार्मिंग - केवल एक ही फसल उगाए जाने का भी प्रचलन चल रहा। यहां के जंगल काम हो रहे, और इन पौधों पर निर्भर पक्षियां भौरें भी।


तो क्या है उपाय?

कॉफी इंडस्ट्री में पारदर्शिता की कमी, श्रमिक अधिकारों का उलंघन और पर्यावरण खतरों को रोकना है; तो क्या कॉफी नहीं पिए? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं। हमें सरकार और कंपनियों को श्रमिक और वातावरण क़ानूनों को लागू करने के लिए दबाव डालना होगा। कोशिश करें कि स्थानीय मिलने वाले कॉफी विकल्पों के बारे जाने।


आइए, मैं एक ऐसे ही विकल्प के बारे में बताती हूं।


चाकोड़ कॉफी

झारखंड के आदिवासी भी कॉफी का मज़ा अपने अंदाज़ में लेते हैं। वे बनाते हैं बड़का चाकोड़ से दिलचस्प कॉफी। इसके पौधे आसानी से खेत खलिहानों या गांवों के मैदानों में मिल जाएंगे। इसके पौधे 3 से 4 फीट लंबे होते हैं, और इनपर पीले फूल खिलते है। ये बारिश के महीने के बाद उठते हैं और तीन महीनों में तैयार हो जाते हैं। अगस्त सितंबर में इसकी फलियां लगनी शुरू हो जाती हैं और नवंबर दिसंबर तक सुख जाती हैं। हल्की हवा चलने पर पौधे पर फलियों की बीज खल खल आवाज़ करती हैं। सुखी फलियां काफी नाज़ुक होती हैं इसलिए इसे समय पर तोड़ना ज़रूरी है, नहीं तो ये तेज हवा से झड़ जाएंगी।


इसकी सुखी फलियों में से बीजों को निकालकर इन्हें रोस्ट किया जाता है। फिर, इसे पीसा जाता है जिससे ये पाउडर बन जाए। इसे कॉफी पाउडर की तरह ही गरम पानी मिलाकर पिया जाता है। कुछ लोग इसके बीज को डायरेक्ट पानी में उबालकर भी पीते हैं।


बरसों पहले जब चाय- कॉफी के पैकेट्स दुकानों में नहीं मिलती थी, तो लोग शाम में काम कर इन्हें ही चुनकर घर लाते और राहत और स्वाद की चुस्की भरते थे। चाकोड़ का कड़क स्वाद और सुगंध इसे आज भी गांववासियों की पसंद बनाता है।


आदिवासी कॉफी, आदिवासी पर्यटन और आदिवासी पोशाकों को काफी बड़ावा दिया जा रहा है। लेकिन, इनके हानिकारक प्रभाव भी हो रहे। जैसे पर्यटन के नाम पर आदिवासियों का stereotyping, और आदिवासियों का कल्चरल ऐप्रोप्रिएशन। आदिवासियों और उनके संस्कृति को सही सम्मान देना ज़रूरी है।


इस प्रकार होगी कड़वी कॉफी मीठी

कॉफी की असली कहानी जानकर हम समझें कि कॉफी का स्वाद वाकई कड़वा (सच) है। स्थानीय और पर्वायारण परिस्थितियों को ध्यान में रख कर कॉफी सही स्वाद ले सकते।

GI का दर्जा इन आदिवासी कॉफी और उनसे संबंधित इलाकों को मान्यता देगी जिससे यहां के किसानों को मार्केट में निष्पक्ष, सही और फैयदेमांद समझौता करने में मदद हो।



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