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क्यों इस त्योहार के बाद ही शादी कर सकते हैं बिंझवार समुदाय के लोग?

धान का कटोरा कहलाने वाले छत्तीसगढ़ में बहुत से त्योहार मनाए जाते हैं। यहाँ के प्रत्येक समुदाय कोई न कोई त्योहार या पर्व जरूर मनाते हैं। छतीसगढ़ में त्योहार को तिहार कहा जाता है। यहाँ आदिवासीयों के त्योहार प्राचीन काल से ही मनाए जा रहें हैं, और प्रत्येक लोक त्योहार में कुछ खास व्यंजन, गीत और नृत्य जरूर होते हैं।

इन्हीं अनेक खूबसूरत त्योहारों में से एक है बिंझवार समुदाय का देवउठनी त्योहार।

चौरा का पूजन करते गाँव के बुजुर्ग

यह त्योहार हर वर्ष कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष के एकादशी को मनाया जाता है l इस त्योहार से एक दिन पहले शाम को गाँव के कोतवाल द्वारा पूरे गाँव को सूचित किया जाता है, और गाँव के लोग सुबह से ही इस त्योहार की तैयारीयों में जुट जाते हैं। इस दिन व्यंजन के रूप में मखना, शक्कर, कंद, गेठिया कंद, और झुनगा के बीज को एक साथ बाँफा (उबाला) जाता है ।


उबाला गया कंद, मखना, और, झूनगा के बीजों बीज एक दोने में लेकर गवाटिया के घर में शाम को पूरे गाँव के लोग एकत्रित होते हैं और गवाटिया के आंगन में मौजूद चौरा के पास अपने-अपने दोना को रख देते हैं। इसी दिन गाँव के कुँवारे लड़कों द्वारा उपवास रखा जाता है और उन्हीं के द्वारा ही धान के पौधों को चौरा में रखा जाता है, उपवास रखे सात कुँवारे लड़कों द्वारा चौरा के चारों चक्कर लगाया जाता है। उसी समय गाँव के बुजुर्गों द्वारा देवउठनी का गीत गाया जाता है।

चौरा के चारों ओर चक्कर लगाते युवक

तत्पश्चात गाँव वासियों द्वारा लाये गये सभी दोने से थोड़ा-थोड़ा लेकर को गाँव के देवी-देवताओं को भोग कराया जाता है। इसके बाद सातों लड़कों को एक-एक दोना दिया जाता है। कोतवाल को सात दोना, लोहार को सात, छेरका को सात, राउत को सात, पटेल को सात, और जो बचता है उसे बैगा और गवाटिया रख लेते हैं। कार्यक्रम होने के बाद धान के पौधों को सात लड़कों में से किसी एक के द्वारा बांये हाथ से गवाटिया के छानहीं (छत ) में फ़ेंका जाता है। कार्य समापन के समय बैगा, और गवाटिया द्वारा कहा जाता है कि हमारा साल पुरा हो गया है और गाँव के देवताओं को भी भोग लगा लिए तो जिनके-जिनके भी बेटे शादी के लायक हो गये हैं, वो अपने बेटे के लिए बेटी ढूँढना शुरु कर सकते हैं। अत: इसी दिन के बाद से ही बिंझवार समाज में शादी कर सकते हैं, इससे पहले नहीं। अंत में सब अपने-अपने घर चले जाते हैं और घर मे बने व्यंजन को पूरे परिवार एक साथ बैठकर खाते हैं। इसके अलावा इस दिन लोग अपने-अपने घरों मे तुलसी पूजा,और गन्ना पूजा भी करते हैं। हरेली के त्योहार के दिन बैगा अपने नए शिष्यों को सीखना शुरू करते हैं और देवउठनी के दिन ही यह पूर्ण किया जाता है। जो लोग बैगा की शिक्षा पुरा किये होते हैं वो अगले सुबह नए चावल से रोटी बनाकर गुरु के माध्यम से देवी-देवताओं को भोग कराते हैं ।

पारम्परिक रूप से चली आ रही देवउठनी का त्योहार बिंझवार समुदाय के लिए अति महत्वपूर्ण है। आशा है कि इस आधुनिकता के दौर में भी हम अपनी इन परम्पराओं को अपनाकर अपनी संस्कृति को जीवित रख पाएंगे।



नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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