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रासायनिक उर्वरक खादों के दाम बढ़ने से आदिवासी किसान परेशान !

मनोज कुजूर द्वारा सम्पादित


बढ़ती हुई महंगाई के कारण आज आदिवासी किसानों को खेती करने में परेशानी हो रही है, क्योंकि कच्चे तेल से लेकर रासायनिक उर्वरक, खाद, और पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ गए हैं। अब किसान इन उपकरणों पर निर्भर होते जा रहे हैं।


रासायनिक उर्वरक खाद का उपयोग खेती के कामों में सबसे ज्यादा होता है, जो अच्छी पैदावार और उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए आवश्यक है। इसके दाम बढ़ने से आदिवासी किसान भाइयों को खेती करने में आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।


समस्या यह है कि किसानों के पास इन उपकरणों को खरीदने के लिए पर्याप्त धन नहीं होता है। इससे उन्हें बेहतर खेती के लिए आवश्यक सामग्री के अभाव का सामना करना पड़ता है। इससे उनकी उत्पादकता प्रभावित होती है और वे समृद्धि की दिशा में अग्रसर नहीं हो पाते हैं।


सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि वे आदिवासी किसानों को इन उपकरणों के लिए सहायता प्रदान कर सकें और उन्हें आर्थिक समस्याओं से निकालने में मदद कर सकें। विकासशील और समृद्ध गांवों को समर्थन और संवेदनशीलता के साथ प्रोत्साहित करना भी जरूरी है ताकि उन्हें अपनी खेती को आधुनिक तकनीकों द्वारा सुधारने का अवसर मिल सके।


इस प्रकार, अगर सरकारी उपाय और संबद्ध संगठनों के साथ मिलकर आदिवासी किसानों को समृद्धि की दिशा में प्रोत्साहित किया जाए ताकि वे महंगाई के प्रभाव से सुरक्षित रह सकते हैं और खेती में अधिक सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

रासायनिक कीटनाशक दवाई छिड़काव


आदिकाल में आदिवासी लोग खेती कार्य करने के लिए देशी खाद अर्थात् जैविक उर्वरक का उपयोग करते थे, जिससे फसल की पैदावार एवं गुणवत्ता उच्च कोटि का होता था। लेकिन जब से रासायनिक खादों का प्रयोग करने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब से धीरे-धीरे जैविक खादों का उपयोग कम होता गया है, और वर्तमान में सभी किसान ज्यादातर रासायनिक उर्वरक का ही उपयोग करके अपनी फसल की तैयारी करते हैं। इसके कारण रासायनिक खादों के दाम बढ़ रहे हैं, ऐसे में सभी किसानों को अगर महंगाई से छुटकारा पाना है तो जैविक उर्वरक और काम्पोस्ट खादों का अधिक मात्रा में उपयोग करना चाहिए।


आदिवासी युवा किसान दिलीप मरकाम का कहना है कि पहले आदिवासी किसान लोग पूरी तरह से देशी तरीके से ही खेती कर अपना जीवन यापन करते थे। अब धीरे-धीरे आदिवासी किसान जैविक खादों से खेती करना भूलते जा रहे हैं, जिससे महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। आदिवासी किसान व अन्य किसानों को सरकार ही रसायनिक खादों का उपयोग करना सिखाया जिससे उन्हें पैदावार बढ़ाने में सफलता तो मिली। लेकिन अब सरकार रासायनिक खादों की कीमतों को बढ़ा रही है, जिससे किसानों को खेती करने में परेशानी हो रही है लेकिन उनके पास कोई वैकल्पिक उपाय नहीं है। मजबूरी में, किसान को रसायनिक खाद खरीदने के लिए महंगे दामों पर भरोसा करना पड़ रहा है। इसलिए सभी किसान भाइयों को जैविक उर्वरक खाद का उपयोग अपनाना चाहिए।

रासायनिक उर्वरक खाद


रासायनिक खादों से फसल का उत्पादन तो अच्छा होता है, लेकिन ये कई गुणा मृदा को प्रदूषित करते है। इसलिए, रासायनिक खाद और महंगाई के बढ़ते दामों को ध्यान में रखते हुए आदिवासी किसानों से निवेदन है कि वे अब ज्यादा से ज्यादा जैविक खादों का प्रयोग प्रारंभ करें। इससे हमारी प्राकृति को भी प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है और साथ ही मिट्टी की उर्वरता को भी बरकरार रखा जा सकता है। जिसमें कृषि कार्य में लागत को भी काम किया जा सकत है। जैविक खाद से न सिर्फ खेती को बढ़ावा होगा, बल्कि सभी अपशिष्ट कचरे का भी कृषि कार्यों में उपयोग हो सकेगा।


कई आदिवासी किसान लोग आज भी जैविक खादों से खेती करते हैं और रासायनिक उर्वरक का उपयोग बिल्कुल कम मात्रा में करते हैं। लेकिन किसान भाइयों को रासायनिक खादों का उपयोग कम करना चाहिए, साथ-साथ खेती में जैविक खादों को बढ़ावा देना चाहिए और अपने फसलों में गोबर की खाद और अन्य जानवरों की मल मूत्र की खाद व काम्पोस्ट खाद का प्रयोग करना चाहिए। इससे किसान को खेती करने के लागत में कमी आएगी और उत्पादन अधिक होगा। इससे अचानक रासायनिक खादों की कीमतों में वृद्धि होने पर भी किसानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा तथा

महंगाई की मार से किसान कर्ज में डूबने से बच जायेगा।


हमारे कृषि प्रधान देश में रासायनिक उर्वरक खादों के उपयोग का स्तर काफी बढ़ रहा है, जिसे कम करने का प्रयास सरकार को करना चाहिए। खेती हमारे भारत देश में मुख्य रोजगार बन गई है, जो सबसे अधिक रोजगार प्रदान करने वाला कार्य है।


हमारे भारत देश में जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण साथ ही पर्यावरण प्रदूषण में, रासायनिक खादों का अत्यधिक उपयोग एक प्रमुख कारण है। सरकार से यह निवेदन है कि वे रासायनिक खादों के बढ़ते हुए दामों को कम करें और जैविक उर्वरक खाद और वर्मीक काम्पोस्ट खाद के उपयोग को बढ़ावा दें। जिससे आदिवासी किसान और अन्य किसानों को खेती करने में किसी प्रकार की परेशानी और समस्याओं का सामना ना पड़े।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


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