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आप जाल के बिना भी मछली पकड़ सकते हैं, गरियाबंद के आदिवासी आपको बताते हैं कि कैसे

Updated: Apr 10, 2021


एक बांस के डंडे में एक रस्सी बांधकर उसके अंतिम छोर में एक हूक लगाकर आप आराम से अपने भोजन के लिए मछली पकड़ सकते हैं

छत्तीसगढ़ के आदिवासी अपने भोजन के लिए हमेशा से ही प्रकृति पर निर्भर रहे हैं। इसलिए जब भी वह शिकार पर जाते हैं तो अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना करने के बाद ही जाते हैं।


जब बरसात में अधिक वर्षा होने के कारण बांध नदी का पानी मैदानी इलाके में भरने लगता है तो नदियों की मछलियां, बांध की मछलियां, मैदानी इलाके की ओर बढ़ती है। आदिवासी इन मछलियों का शिकार करते हैं। शिकार करने के लिए वे मछली पकड़ने का जाल अथवा तीर कमान का उपयोग करते हैं। और इस तरह से भी बरसात भर में बहुत सी मछलियां पकड़ लेते हैं जिन्हें वे अच्छे से साफ करने के बाद हल्की आग में भूनते हैं फिर उसे धूप में सुखा कर रखती हैं । ऐसा करके वे पूरे साल मछलियों का भंडारण करते हैं।

मछली पकड़ने के बाद उन्हें सुखाकर लम्बे समय तक संग्रहीत किया जा सकता है

आइए जानें कुछ ऐसे और तरीकों के बारे में जिनसे आदिवासी अपने इलाके में मछली पकड़ते हैं-


जाल से मछली पकड़ना: हम आदिवासी तालाबों और बांधों में जाल के इस्तेमाल से मछलियां पकड़ते हैं। कभी-कभी हमें इस तरह से मछली पकड़ने के लिए लोगों की एक टीम की आवश्यकता होती है। एक व्यक्ति जाल को पानी में फैलाता है और दूसरे लोग पानी में हलचल मचाते हैं जिससे मछलियां इधर-उधर होने लगती है और जाल में जाकर फंस जाती ह। इस तरीके से बहुत ही आसानी से बड़े-बड़े बांधों की मछलियां मिल जाती है।

बिना किसी जाल के मछली पकड़ना: आदिवासी हमेशा से ही जल जंगल जमीन से ही सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करते आये हैं। जब बरसात का मौसम खत्म हो जाता है तो मैदानी इलाके में बने गड्ढों में बड़ी नदियों से आया पानी रुक जाता है। उनके साथ आई मछलियां भी उन्हीं गड्ढों में रुक जाती है । ऐसे मैं अगर जाल का बंदोबस्त न हो तो एक नायब तरीके से मछली पकड़ी जासकती हैं। आदिवासी जंगल से ऐसे पेड़ों की मदद लेते हैं जिन की पत्तियां या छाल कड़वा होता है जैसे की नीम का पेड़। नीम के छाल और पत्तियों को पत्थर से कुचलते हैं जिससे उसका रस पूरा पानी को कड़वा कर देता है। मछलियां कड़वे पानी में ज्यादा वक्त तक नहीं रह पाती हैं और ऊपर आने की कोशिश करती हैं। तब आदिवासि लोग उन्हें बड़ी आसानी से पकड़ लेते हैं। इस प्रक्रिया को छत्तीसगढ़ के आदिवासी मतार कहते हैं।

बांस की झापी द्वारा भी सूखते हुए नदी की मछलियां पकड़ सकते हैं

लकड़ियों से मछली पकड़ना: जब नदी का जलस्तर बेहद कम हो जाता है तो आदिवासी लोग उस नदी में लकड़ियां लगाकर पानी को रोक देते है। लकड़ियों के बने इस "बाँध" के बीच में बांस का एक मछली पकड़ने का झापी बनाते हैं जोकि गोलाकार में होती है। देखने में यह मिसाइल की तरह है, इसका अंतिम सिरा नुकीला होता है और इसका ऊपरी सिरा गोल होता है। इसे बास के पतले पतले टुकड़ों से इस प्रकार एक के ऊपर एक रखा जाता है ,जिससे पानी तो बह जाता है लेकिन मछलियां नहीं निकल पाती है।

नदी का पानी उसी में छोड़ते हैं जिससे पानी तो बाहर निकल जाता है लेकिन मछलियां उसी में रुक जाती है। इस तरीके से भी आदिवासी मछलियां पकड़ते हैं।

तीर धनुष से मछलियों का शिकार: बहती हुई नदी में जब मछलियां तैर रही होती है तो आदिवासी शिकारी अपने धनुष और तीर से मछली के शरीर पर निशाना लगाते हैं जिससे मछलियां वही मर जाती है। आदिवासी इसमें इतने नीपूर्ण होते हैं कि कभी उनका निशाना नहीं चूकता। इससे भी दिन भर में बहुत सारी मछलियां पकड़ लेते हैं। इसके लिए मौसम और पानी दोनों साफ होना आवश्यक होता है।


आदिवासी कुंवा से भी पकड़ते है मछलियां: इसके लिए वे एक बांस के डंडे में एक पारदर्शी रस्सी बांधकर उसके अंतिम छोर में एक हूक लगाते हैं। हुक में केचुआ को लगा देते हैं, और उसको पानी में डाल देते हैं। रस्सी पारदर्शी होने कारण रस्सी दिखाई नहीं देती और हुक के ऊपर केंचुवे होने के कारण हुक भी दिखाई नहीं देता। मछलियां उसे खाने के लिए आ जाती है और उसे खा लेती है जिससे हुक उनकी मुंह में फंस जाता है और उसे छुड़ाने की कोशिश करती है मछलियां तो मछवारे को पता चल जाता है और वह बांस की डंडी को ऊपर खींच लेते हैं जिससे मछली भी ऊपर आ जाती है।

छत्तीसगढ़ की छोटे-छोटे नदियों तालाबों और बड़े-बड़े बांधों नदियों में लगभग 45 किस्म की मछलियां पाई जाती है जैसे कि- मुंगरी टेंगरा, बमर ,केवई खोखशी, भूंडा,आदि । मछलियां छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के लिए एक महत्वपूर्ण भोजन है , मछलियों से ही छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी अपना घर भी चला रहे हैं। वे अधिक मछलियां पकड़ने पर उन्है बाजार में बेचते हैं जिससे उन्हें अच्छा खासा आमदनी हो जाता है। मछली पकड़ने में महिलाओं का भी पूर्ण योगदान रहता है l


This article is created as a part of the Adivasi Awaaz project, with the support of Misereor and Prayog Samaj Sevi Sanstha.


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