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जानें कैसे, जंगलों में आग लगने से, आदिवासियों को हो रहा भारी नुकसान

पंकज बांकिरा द्वारा सम्पादित


आदिवासी समाज प्राचीन समय से ही जंगलों और पहाड़ों के बीच रहते आ रहे हैं, और वे इन्हीं जंगलों से मिलने वाले वनोपज संसाधनों पर निर्भर रहते हैं। इन्हीं वनोपजों में से एक वनोपज, महुआ फूल है। यह फागुन माह में गिरना प्रारंभ हो जाता है। जिसे, पीला सोना के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन, वर्तमान में, इसे बिनने (चुनने) के लिए, महुआ पेड़ के नीचे गिरे हुऐ सभी पत्तों को, एक जगह बटोर कर आग जला दिया जाता है। जिससे, उन्हें बिनने में आसानी हो। लेकिन, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो आग तो जला देते हैं, पर उसे बिना बुझाए घर आ जाते हैं। जिससे, आग दूर-दूर तक फैल जाती है, और प्राकृतिक संसाधनों को बहुत नुकसान पहुँचता है।

जलते हुए महुआ के पत्ते

आग के फैलने पर, वह घास-फूस, छोटी-बडी लकड़ी, पेड़-पौधों और जीव जंतुओं को भारी हानि पहुंचती है। और जंगलों में पाए जाने वाली अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियां, जिनका इस्तेमाल, आदिवासियों द्वारा विभिन्न प्रकार के बीमारियों को ठीक करने में किया जाता है, वे अब धीरे-धीरे नष्ट होने लगी हैं। और हमारे आस-पास पाए जाने वाले, छोटे-बड़े जीव, जो हमारे परिस्थिक तंत्र को बनाए रखने में मदद करती हैं, अब उनका जीवन भी विलुप्त होने के कगार पर आ गया है।

दूर-दूर तक खेतों में लगी आग के बाद का नजारा

इसी प्रकार की आगजनी, हमारे ग्राम पंचायत, डोंगरी में भी हुआ। जहां पर गांव के खलिहानों में आग लग गई थी। जिससे, गांव के खलिहानों का, एक तिहाई हिस्सा, जल कर राख हो गया। इस आग ने, कई आदिवासियों के खेतों पर लगे छोटे पौधों और सूखे पेड़ों को नुकसान पहुंचाया। जिसमें नंदलाल सिंह कंवर, नारायण सिंह कंवर, रन सिंह कंवर और दादू सिंह जैसे कई लोगों के बबूल और प्लाश के पेड़ जल गए। प्लाश के पेड़, वर्तमान में, लोगों के आमदनी का, एक जरिया बना हुआ है। इसके फूल को 10 रुपए किलो में खरीदा जा रहा है। यहां तक कि, हमारे पड़ोसी गांव, मुढ़ाली में संग्रहण करने के लिए, तेंदू पत्ता के प्रबंधक, श्री संतोष सिंह कंवर द्वारा, गांव में व्यवस्था भी करवाया गया है, और उसके द्वारा खरीदी भी किया जा रहा है। यह बात, लालसिंह कंवर से बात करने पर पता चला।

आग में झुलसे छोटे पौधे

इस आग के लगने से, गांव के मवेशियों के लिए, चारे का संकट हो गया है। क्योंकि, इस आग ने घास और धान कटाई से बचे हुए पराली, जो गांव के मवेशियों का, पूरे गर्मी भर का चारा होता है, वह पूरी तरह जला कर राख कर दिया है। ऐसी ही आग दिपका, बिंजरी और रंजना के जंगलों में भी लगा दिया गया है। जहां पर अधिक मात्रा में साल और कोरिया के पेड़ हैं। अब इन पेड़ों के जलने से, वहां के ग्रामीणों को, इन जंगलों से मिलने वाली, वनोपज संसाधनों में कमी आ रही है। क्योंकि, कोरिया के बीज को भी बेच कर, लोग अच्छा मुनाफा कमा रहे थे। जो बाजार में, अभी 150 रुपए किलो बिक रहा है। लगभग, हर साल, लोग जंगलों को आग लगा देते हैं। जिससे, अब नए पौधे नहीं उग पा रहे हैं।


महुआ पेड़ के नीचे बिखरे पत्तों को जलाना या खेतों में कंटीले पौधे उग जाने पर, आदिवासियों के लिए, उसे जलाना जरूरी हो जाता है। पर उनको जरूरत के हिसाब से ही जलाना चाहिए और समय रहते ही बुझा देना चाहिए। वन विभाग के लोगों को भी, इस सीजन में जागरूकता फैलाना चाहिए और जंगलों में लगे आग को बुझाने का भरसक प्रयास करना चाहिए।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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