विकास किसके लिए? जोजोबेडा़ - उलीहुड़ङ में प्रस्तावित स्वर्ण खनन से जंगल, जमीन और आदिवासी जीवन पर संकट
- Narendra Sijui

- Jan 7
- 5 min read
Updated: Jan 8
झारखंड में खनिज संपदा का मिलना कोई नई बात नहीं है। यहाँ खनन की गतिविधियाँ ब्रिटिश काल से भी पहले से चली आ रही हैं। देश की कुल खनिज संपदा का लगभग 40 प्रतिशत अकेले झारखंड से आता है, इसी कारण इसे “Ruhr of India” कहा जाता है।
वर्तमान समय में झारखंड के खूंटी, सरायकेला–खरसावां और रांची जिलों में स्वर्ण (सोना) खनन से जुड़ी कई परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं। इन परियोजनाओं के अंतर्गत जिन क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है, वे लगभग पूरी तरह पहाड़ों और घने जंगलों के बीच स्थित हैं।
तमाड़ क्षेत्र के बाबाईकुंडी और सिंदौरी घनश्यामपुर में दो स्वर्ण खनन ब्लॉकों की नीलामी पहले ही हो चुकी है। वहीं तमाड़ के समीप दिउड़ी दिरी के पास स्थित पारसी बुरू क्षेत्र में भी स्वर्ण खनन प्रस्तावित है, जिसकी नीलामी रुंगटा कंपनी ने हासिल की है। इसके अतिरिक्त पुंडीदिरी और हुड़ंगदा क्षेत्रों में भी खनन की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है, केवल उत्खनन कार्य शुरू होना शेष है।
जोजोबेडा़-उलीहुड़ङ: स्वर्ण खनन परियोजना का केंद्र
इसी क्रम में खूंटी जिले के अड़की प्रखंड के जोजोबेडा–उलीहुरगं क्षेत्र में भी एक स्वर्ण खनन परियोजना प्रस्तावित है। यह परियोजना लगभग 10.61 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है, जहाँ G-4 स्तर का सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है। G-4 स्तर का अर्थ है कि खनन की संभावनाओं को लेकर प्रारंभिक जांच की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इस परियोजना की निगरानी झारखंड अन्वेषण एवं खनन निगम लिमिटेड (JEMCL) द्वारा की जा रही है। JEMCL को इस परियोजना के लिए ₹113.3 लाख (एक करोड़ तेरह लाख तीस हज़ार रुपये) की आधिकारिक स्वीकृति भी मिल चुकी है।

अड़की प्रखंड में इस परियोजना को लेकर स्थानीय लोगों में गहरी चिंता व्याप्त है। चिन्हित 10.61 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में घने जंगल, बड़े-बड़े पहाड़ और कई बसे हुए गांव आते हैं। जोजोबेडा, जो इस परियोजना का केंद्र बिंदु है, वहाँ के निवासी दिनेश मुंडा बताते हैं कि चिन्हित क्षेत्र के भीतर कुल 14 मौजा (गांव) शामिल हैं। इनमें जोजोडीह, बरुबेडा, हुरुवा, लोबो, लेबेद, जोजोबेडा, कोरवा चाटोमसाल, राबो, किताडीह, बुरुडीह, डोरेया, बडानी और अत्रा जैसे गांव आते हैं।
दिनेश मुंडा का कहना है कि जब इस क्षेत्र में सर्वे किया जा रहा था, तब गांव के किसी भी व्यक्ति को इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई। आज तक ग्रामीणों को इस परियोजना के बारे में आधिकारिक रूप से कुछ भी नहीं बताया गया है। वे आगे कहते हैं,“मुझे तो थोड़ा-बहुत पता अख़बारों और लोगों की बातचीत से चला। 30 नवंबर को कोरवां गांव में ग्रामीणों द्वारा एक आमसभा बुलाई गई थी। वहीं चर्चा के दौरान पता चला कि उलीहुड़ङ गांव से लगभग 10 किलोमीटर के दायरे में स्वर्ण खनन किया जाना है।”

हुरुवा के चंदुरा गांव की निवासी सनिका मुंडा बताते हैं कि वे बचपन से जंगल में सोने की मौजूदगी के बारे में केवल कहानियाँ ही सुनते आए थे। लेकिन पिछले दो वर्षों में सरकार द्वारा ड्रोन कैमरों से किए गए सर्वेक्षण के बाद यह स्पष्ट हुआ कि इस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में स्वर्ण खनिज मौजूद है। वे यह भी बताती हैं कि उनकी खुद की लगभग पाँच एकड़ जमीन को इस परियोजना के लिए चिन्हित किया गया है।
उलीहुड़ङ के निवासी सामु मुंडा कहते हैं कि उनकी जमीन खुंटकट्टी भूमि है और वे किसी भी हालत में खनन की अनुमति नहीं देंगे। उनका कहना है कि यदि खनन शुरू हुआ, तो पूरा गांव उजड़ जाएगा। इन 14 गांवों की अधिकांश आबादी आदिवासी समुदाय की है और यह पूरा क्षेत्र जंगलों और पहाड़ों से घिरा हुआ है।
वे साफ शब्दों में कहते हैं,“सच यह है कि गांव के अधिकतर लोगों को आज भी इस परियोजना की पूरी जानकारी नहीं है।”
30 नवंबर 2025 को कोरवां गांव में आयोजित आमसभा में सैकड़ों ग्रामीणों ने अपनी नाराज़गी व्यक्त करते हुए स्पष्ट कहा कि वे अपनी जमीन छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। इसके बाद 4 जनवरी 2026 को हुरुवा गांव में एक और आमसभा आयोजित की गई, जिसमें खुंटकट्टी जमीन को कैसे बचाया जाए, इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई।
स्थानीय लोगों को आशंका है कि कहीं उनके साथ भी छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल की तरह व्यवहार न किया जाए, जहाँ जंगल, जमीन और गांवों को खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर उजाड़ दिया गया।
लोग लगातार ग्रामसभाओं के माध्यम से एक-दूसरे को जागरूक कर रहे हैं और यह जानकारी साझा कर रहे हैं कि अड़की प्रखंड के पूरे 14 गांव इस परियोजना के दायरे में आते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि आने वाले वर्षों में उन्हें अपनी ही जमीन से विस्थापित होने का खतरा है। ग्रामीणों का यह भी स्पष्ट कहना है कि यदि बिना ग्रामसभा की सहमति के कंपनी इस क्षेत्र में खनन शुरू करती है, तो वे संगठित होकर इसका विरोध करेंगे।
करकरी नदी और पारंपरिक सोना निकासी
जोजोबेडा गांव के पास, चिन्हित खनन क्षेत्र के भीतर करकरी नदी बहती है, जिसे स्थानीय लोग मरांग गाड़ा के नाम से जानते हैं।, यही मारांग गाड़ा डॉ. रामदायल मुंडा के गीतों में भी आता है।

जोजोबेडा निवासी दिनेश मुंडा बताते हैं कि पहले के समय में यह नदी आदिवासियों के लिए सोने की पारंपरिक निकासी का एक महत्वपूर्ण स्रोत थी। लोग नदी से सोना निकालकर अपने छोटे-छोटे व्यवसाय चलाते थे और इससे आजीविका के साधन जुटाते थे। लेकिन समय के साथ यह परंपरा लगभग खत्म हो गई है। वर्तमान पीढ़ी में अब केवल कुछ गिने-चुने लोग ही इस पारंपरिक तरीके से सोना निकालने की कला जानते हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि करकरी नदी चट्टानी इलाकों से होकर गुजरती है, जहाँ से चट्टानों के कणों के साथ सोने के अंश नदी के पानी में मिल जाते हैं। यही कारण है कि करकरी नदी में सोना पाया जाता है।
ग्रामीण यह भी मानते हैं कि स्वर्णरेखा नदी में मिलने वाला सोना भी करकरी नदी से बहकर ही वहाँ पहुँचता है, क्योंकि करकरी नदी, स्वर्णरेखा नदी की एक सहायक नदी है।
जोजोबेडा–उलीहुड़ङ क्षेत्र में प्रस्तावित स्वर्ण खनन परियोजना केवल एक खनन परियोजना नहीं है, बल्कि यह जंगल, जमीन, नदी और आदिवासी जीवन पद्धति के भविष्य से जुड़ा सवाल है। जहाँ एक ओर सरकार और कंपनियाँ विकास और राजस्व की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समुदाय अपने अस्तित्व, संस्कृति और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए चिंतित और सजग है।

आने वाला समय यह तय करेगा कि यह क्षेत्र विकास के नाम पर उजाड़ का गवाह बनेगा या फिर ग्रामसभा, खुंटकट्टी व्यवस्था और आदिवासी स्वशासन की आवाज़ को सुना जाएगा। फिलहाल, जोजोबेडा और आसपास के गांवों में यह सवाल गूंज रहा है कि विकास आखिर किसके लिए और किसकी कीमत पर।
लेखक परिचय:- झारखण्ड के रहने वाले नरेंद्र सिजुई जी इतिहास के छात्र हैं और आदिवासी जीवनशैली से जुड़े विषयों पर प्रखरता से अपना मत रखते हैं।




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