मैं पृथ्वी के दर्द को महसूस करता हूँ!
- Rabindra Gilua

- Jun 5, 2025
- 7 min read
मैं पृथ्वी के दर्द को महसूस करता हूँ, और आज पर्यावरण दिवस (5 जून) पर, जब हम प्रकृति की बात करते हैं, मेरे मन में आदिवासियों की पुकार गूँजती है। ये दिन हमें याद दिलाता है कि प्रकृति हमारी माँ है, और इसे बचाना हमारा कर्तव्य है। लेकिन ये सिर्फ़ शब्दों का खेल नहीं—ये उन आदिवासियों की कहानी है, जो अपनी जान देकर जंगल, पहाड़ और नदियों को बचा रहे हैं।
मुझे अपने झारखंड के पहाड़ों की बर्बादी देखकर बहुत दुख होता है। टाटा, अडानी और रुंगटा जैसी कंपनियों ने विकास के नाम पर प्रकृति को उजाड़ दिया, और यहाँ के आदिवासियों की ज़िंदगी को तहस-नहस कर दिया। मैं चाहता हूँ कि उनकी आवाज़ आप तक पहुँचे, और हम सब मिलकर कुछ करें।
मैं अपने दोस्त सूरत, गुजरात की दर्शना वासावा और इंदौर मध्य प्रदेश के साथी आयुष डावर से पर्यावरण पर चर्चा कर रहा था। तब वो दोनों बताते हैं - “विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) एक ऐसा अवसर है, जो लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनने तथा पर्यावरण के संरक्षण हेतु प्रोत्साहित करता है। पर्यावरण दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व की याद दिलाने वाला पर्व है। आदिवासी समुदाय का जीवन, संस्कृति और परंपराएं पर्यावरण के संरक्षण और संतुलन का जीवंत उदाहरण हैं। आज ग्लोबल वॉर्मिंग विश्व की एक गंभीर समस्या बन चुकी है तथा सर्वविदित है कि यह ग्लोबल वॉर्मिंग दीर्घकाल में जलवायु परिवर्तन को जन्म दे रही है, जिस से दुनिया भर में मौसम के स्वरूप में बदलाव हो रहा है। पर्यावरण अनुकूल जीवन शैली आदि काल से ही भारत के आदिवासियों के जीवन की एक अभिन्न पहचान रही है। आदिवासियों का पर्यावरण के प्रति प्रेम, इसके संरक्षण का दूरगामी दृष्टिकोण एवं पर्यावरण के साथ उनका अन्योन्याश्रय संबध वर्तमान परिपेक्ष्य में पर्यावरण संरक्षण, संवर्धन तथा ग्लोबल वार्मिंग जैसे संकटों से बचाने की प्रेरणा देता है। आदिवासी कभी भी प्रकृति को नुकसान पहुँचाकर कुछ भी पाना नहीं चाहता इसलिए उसने पर्यावरण को नुकसान से बचा कर अपने जीवन को सरल बना रखा है। आदिवासी प्रकृति के पूजक हैं और प्रकृति में पाये जाने वाले सभी जीव, जंतु, पर्वत, नदियाँ, पेड़ पौधों आदि की पूजा करते हैं। आदिवासियों का पर्यावरण के साथ घनिष्ठ सम्बंध है।”
झारखण्ड के मेरे दोस्त विक्की मिंज जो अभी राँची विश्वविद्यालय डॉ डिग्री ले रहें हैं, वो कविता के रूप में प्रकृति की दर्द को लिखते हैं और साथ ही एक अपील भी करते हैं :

कान्क्रीट के जंगल में राख हो जाएंगे,
अब भी न जागे तो स्वाहा हो जाएंगे।
धरती बचाने का नाम नहीं काफी,
जब मनुष्यता ही हमसे रूठ जाएगी।।
सूखती हवाओं में जहर घुल रहा है,
धरती का आँचल भी अब जल रहा है।
संभालो समय को, बचाओ धरा को,
वरना हरियाली भी छूट रहा है।।
वृक्षों से चलती हैं साँसें हमारी,
इनसे ही महकती जीवन की क्यारी।
जो हरियाली को अपनाएंगे,
वही सच्चे सपूत कहलाएंगे।।
नदी जब हँसे तो जीवन मुस्काए,
पर्वत की छाया भी सुख बरसाए।
यदि हम उसे बहने दें गीतों में,
तो संकट दूर हो, सुख लौट आए।।
मत काटो पेड़, यही तो जीवन हैं,
इनकी जड़ों में बसे सारे सपनें हैं।
हर पत्ता कहे — “मुझे जीने दो”,
मेरे ही दम से ये मौसम सजें हैं।।
प्रकृति से लेना है तो देना भी होगा,
इसका स्नेह न, ये रोष भी भोगा।
जितना लिया है उतना लौटाओ,
धरती को माँ मान, उसे ना रुलाओ।।
फूलों से सजे पथ हों, पंछी चहकें,
हरियाली की ओट में सपने महकें।
प्रकृति का संरक्षण ही पर्व हमारा,
इसी सोच से सुंदर हो जहाँ सारा।।
चलो आज ये संकल्प उठाएँ,
धरती को फिर से हरा-भरा बनाएँ।
यही सच्चा उत्सव, यही अर्पण है
हरा-भरा ही हमारा पर्यावरण है।।
पूर्व विधायक और आंदोलनकारी श्री बहादुर उराँव जी से जब बातचीत की, तब वे बताते हैं:
झारखंड की बात करूँ तो, मेरा दिल और भारी हो जाता है। ये धरती, जो भारत के 40% खनिजों का खजाना है, टाटा स्टील और रुंगटा समूह जैसी कंपनियों की खदानों की भेंट चढ़ गई। 1907 में जमशेदपुर में टाटा ने कारखाना लगाया, और तब से झारखंड के जंगल, पहाड़ और नदियाँ तबाह हो रहे हैं। जोडा, बांसपानी, बड़बिल, मेघाहातुबुरु-किरीबुरु, चिरिया, नोआमुंडी और गुआ की लौह अयस्क खदानें, जो 1925 से चल रही हैं, ने सारंडा के घने साल के जंगलों को बर्बाद कर दिया। 50,000 से ज़्यादा पेड़ कटे, 100 से ज़्यादा जल स्रोत प्रदूषित हुए। कोयल और कारो नदियाँ गंदगी से भर गईं, जिससे पीने का पानी और मछली पकड़ने की आजीविका ख़तरे में है। इसके विरोध में बहुत बड़ा आंदोलन भी हुआ और नरसंहार भी हुआ। आज भी मुझे 8 सितंबर 1980 का वो दिन याद आता है, तो आँखों से खून के आँसू आते हैं, जिसे लोग आज गुआ गोलीकांड के नाम से जानते हैं। हो और संताल आदिवासियों को उजाड़ दिया गया। टाटा ने मुआवजा और नौकरी के वादे किए, लेकिन ज़्यादातर को कुछ नहीं मिला। आज वे खदानों के किनारे झुग्गियों में जी रहे हैं।

दूसरी और वेस्ट बोकारो की कोयला खदान ने रामगढ़ के पहाड़ों को बंजर बना दिया। हज़ारों एकड़ जंगल ख़त्म हुए, दामोदर नदी प्रदूषित हो गई। कोयले की धूल ने हवा को ज़हरीला कर दिया, जिससे साँस की बीमारियाँ बढ़ रही हैं। मुंडा और उरांव आदिवासियों की ज़मीनें छीनी गईं, और नौकरियाँ गैर-आदिवासियों को दी गईं। 10,000 से ज़्यादा आदिवासी प्रभावित हुए, 500 हेक्टेयर उपजाऊ ज़मीन बर्बाद हो गई। झरिया और जामाडोबा की कोयला खदानों में हाल और बुरा है। झरिया में दशकों से ज़मीन के नीचे आग जल रही है, जिसे टाटा की गतिविधियों ने और भड़काया। 70,000 लोग प्रभावित हैं, गाँवों में दरारें पड़ रही हैं, घर ढह रहे हैं। टाटा के पुनर्वास के वादे भी खोखले निकले।
जमशेदपुर में टाटा के कारखाने के लिए साकची गाँव की हज़ारों हेक्टेयर ज़मीन और जंगल लिया गया। स्वर्णरेखा नदी, जिसमें 80% प्रदूषण कारखानों से है, अब ज़हरीली हो चुकी है। दलमा पहाड़ भी खनन से प्रभावित हैं। 10,000 से ज़्यादा हो, मुंडा और संथाल आदिवासी उजड़े, उनकी सांस्कृतिक पहचान मिट गई। जादुगोड़ा में यूरेनियम खनन ने सुबर्णरेखा नदी को ज़हरीला कर दिया। कैंसर और दूसरी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। हो, संताल और मुंडा आदिवासियों को उजाड़ा गया, और विरोध करने वालों को दबाया गया। सरकारी और गैर सरकारी कंपनियों का ये 'विकास" सिर्फ़ कॉरपोरेट्स और शहरियों के लिए है, हम आदिवासियों ने सब कुछ खोया—ज़मीन, संस्कृति, और सम्मान।
पद्मश्री मधु मंसूरी हंसमुख झारखंड के प्रसिद्ध गायक हैं। वो अपने गीत में इस दर्द को और आंदोलनकारियों को हिम्मत देने के लिए लिखते हैं:
गाँव छोड़ब नहीं, जंगल छोड़ब नहीं
माय माठी छोड़ब नहीं, लड़ाई छोड़ब नहीं।।
बाँध बनाए, गाँव डुबोए, कारखाना बनाए ,
जंगल काटे, खदान खोदे , सेंक्चुरी बनाए,
जल जंगल जमीन छोड़ी हमिन कहाँ कहाँ जाए,
विकास के भगवान बता हम कैसे जान बचाए॥
रुंगटा समूह की खनन और इस्पात गतिविधियाँ भी झारखंड, खासकर चाईबासा और सरंडा वन क्षेत्र में, पर्यावरण पर गहरा असर डाल रही हैं। सारंडा जंगल, जो 820 वर्ग किमी में फैला और जैव-विविधता से समृद्ध है, रुंगटा समूह को दिए गए खनन पट्टों की वजह से खतरे में है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 8,898 हेक्टेयर भूमि पर 24 खनन पट्टों को रद्द करने की सिफारिश की गई थी, क्योंकि ये पर्यावरणीय अनुमतियों के बिना चल रहे थे। रुंगटा समूह पर अवैध खनन का भी आरोप है, जिसमें ₹14,541 करोड़ मूल्य के खनिजों का दोहन शामिल है। ये पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन तो है ही, स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी नष्ट कर रहा है। रुंगटा की सहायक कंपनी, झारखंड इस्पात प्राइवेट लिमिटेड, रामगढ़ में काम करती है, और झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) ने इसके खिलाफ वायु प्रदूषण और धूल के कारण नोटिस जारी किया था। स्थानीय लोग धूल और कचरे के गलत निपटान से स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत कर रहे हैं।

चाईबासा में रुंगटा समूह की वर्तमान परियोजनाएँ मुख्य रूप से लौह अयस्क खनन और इस्पात उत्पादन से जुड़ी हैं। सारंडा और चाईबासा के आसपास उनकी खदानें और प्रोसेसिंग यूनिट्स चल रही हैं, जो स्थानीय जल स्रोतों और जंगलों को प्रभावित कर रही हैं। पर्यावरणीय रिपोर्टों के मुताबिक, इन खदानों से निकलने वाला कचरा और धूल कोयल नदी को प्रदूषित कर रहा है, जिससे आदिवासियों की आजीविका और पेयजल संकट में है। 2023 की एक पर्यावरणीय रिपोर्ट में बताया गया कि सारंडा में खनन गतिविधियों ने जंगल के 15% हिस्से को नुकसान पहुँचाया है, जिसमें रुंगटा की खदानें भी शामिल हैं। स्थानीय समुदायों ने वायु प्रदूषण और जंगल की कटाई के खिलाफ कई बार प्रदर्शन किए, लेकिन इनका समाधान अभी तक नहीं हुआ।
टाटा, अडानी और रुंगटा जैसे कॉरपोरेट्स लालच में अंधे हैं। झारखंड में टाटा और रुंगटा ने दामोदर, स्वर्णरेखा और कोयल नदियों को ज़हरीला कर दिया। खनन का कचरा नदियों को मार रहा है, जंगल कटने से जलवायु बदल रही है। ये लोग विकास का ढोंग करते हैं, लेकिन असल में सिर्फ़ मुनाफा कमाते हैं।
रुंगटा समूह ने कुछ पर्यावरणीय प्रयास भी किए हैं। रुंगटा ग्रीनटेक लिमिटेड ने 3 अरब PET बोतलों का पुनर्चक्रण किया, जिससे 85,000 टन CO₂ उत्सर्जन बचा। जल संरक्षण के लिए चेक डैम और तालाबों का नवीनीकरण किया, जिससे स्थानीय समुदायों को फायदा हुआ। चाईबासा में स्वास्थ्य शिविर और महिला कॉलेज में स्टाफ क्वार्टर बनवाए। लेकिन ये प्रयास उनके खनन के नुकसान की तुलना में बहुत कम हैं।
आदिवासी समाज की कुर्बानियाँ हमारी आंखें नम कर देती हैं। सदियों से वे जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए लड़े हैं—न केवल अपने अधिकारों के लिए, बल्कि धरती और प्रकृति की रक्षा के लिए भी।
1820-21: छोटानागपुर के हो लोगों ने जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए विद्रोह किया।
1831-32: सिंदराय और बिंदराय ने कोल विद्रोह का नेतृत्व किया, जब ज़मीनें छीनी जा रही थीं।
1899-1900: बिरसा मुंडा ने उलगुलान का बिगुल फूंका, और उनका नारा "अबुआ दिशोम, अबुआ राज" आज भी गूंजता है।
1914-19: ताना भगत आंदोलन ने अहिंसा के रास्ते जंगल और जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
1990: नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के खिलाफ ग्रामीणों का आंदोलन हुआ, जिसमें कई घायल हुए और कुछ जानें भी गईं।
आज आदिवासियों के पवित्र स्थल जैसे मरांग बुरु और सरना स्थल खनन और विस्थापन से खतरे में हैं। लेकिन उनकी यह लड़ाई सिर्फ अपने अस्तित्व की नहीं है, बल्कि पूरी मानवता और पृथ्वी की रक्षा की लड़ाई है। वे जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता की हानि और प्रदूषण के खिलाफ सबसे आगे खड़े हैं—बिना किसी ग्लोबल मंच के, बिना कैमरों की चमक के।+
पर्यावरण दिवस हमें आदिवासियों से सीखने का मौक़ा देता है। उनकी झूम खेती, जल संरक्षण, और जैविक खेती का ज्ञान हमें सतत जीवन जीने की राह दिखाता है। हमें पेसा कानून को सख्ती से लागू करना होगा, हसदेव और सारंडा जैसे जंगलों को संरक्षित करना होगा। टाटा, अडानी और रुंगटा पर खनन का प्रतिबंध लगे, और उन्हें बंजर ज़मीन पर पेड़ लगाने को मजबूर करना होगा। आदिवासी नेताओं को नीतियाँ बनाने में जगह देनी होगी।
हम आदिवासियों का समर्थन कैसे करें? उनके आंदोलनों को कानूनी और आर्थिक मदद दें। पर्यावरण दिवस पर उनकी कहानियाँ सोशल मीडिया, वृत्तचित्रों और पत्रकारिता से दुनिया तक पहुँचाएँ। टाटा, अडानी और रुंगटा के उत्पादों का बहिष्कार करें, जब तक वे ज़िम्मेदारी नहीं लेते। खनन से पहले आदिवासियों की सहमति और पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन ज़रूरी हो।
आज पर्यावरण दिवस पर मैं संकल्प लेता हूँ - आदिवासियों की आवाज़ सुनूँगा, उनके संघर्ष को समर्थन दूँगा, उनकी सतत जीवनशैली को अपनाऊँगा और उनकी अवाज़ बनूंगा। आप भी उनकी पुकार सुनो। खनन मशीनों की गड़गड़ाहट में उनकी आवाज़ को दबने मत दो। ये पृथ्वी हम सबकी है, और इसका भविष्य हमारी ज़िम्मेदारी है। - रबिन्द्र गिलुवा लेखक परिचय:- चक्रधरपुर, झारखंड के रहने वाले, रविन्द्र गिलुआ इस वक़्त अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर कर रहे हैं, भारत स्काउट्स एवं गाइड्स में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हैं। लिखने तथा फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी करने के शौकीन रविन्द्र जी समाजसेवा के लिए भी हमेशा आगे रहते हैं। वे 'Donate Blood' वेबसाइट के प्रधान समन्वयक भी हैं।



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