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जानिए आदिवासियों के शम्भू नरका पंडुम के बारे में

इतिहास गवाह है कि जब भी कोई एक संस्कृति किसी दूसरे संस्कृति में आती है तब या तो वह उस संस्कृति को प्रभावित करती है, या फ़िर उस संस्कृति से प्रभावित होती है। इसका प्रत्यक्ष असर रीति-रिवाजों तथा पर्व त्योहारों पर पड़ता है। आदिवासी अपने पर्व त्योहार प्राचीन काल से मनाते आ रहे हैं परन्तु जैसे-जैसे अन्य संस्कृति के लोगों का आगमन आदिवासी क्षेत्रों में होता गया वैसे वैसे वे भी आदिवासी पर्व-त्योहारों को अपनाने लगे, परंतु उनका तरीका अलग होता गया।


शम्भू शेक नरका पंडुम (पर्व) को संभु जागरण की रात्रि भी कहा जाता है। यह पंडुम माघ पूर्णिमा से तेरह दिन बाद मनाया जाता है, कोयावंशीय गोंड समुदाय के गण्डजीव इस पर्व को इसलिये मनाते हैं क्योंकि इस दिन 'गंडोद्विप' के अधिपति शम्भू शेक ने अपने गण्डजीवों को मौत के मुँह से बचाने हेतु विष का सेवन खुद से किया था, गैर आदिवासियों द्वारा यह विष छल से गंडजीवों को दिया गया था। शम्भू ने विष पीकर उसे पचाकर होश में आ गए थे, तब यहाँ के गण्डजीव में खुशी/उल्लास का माहौल पैदा हो गया और वे लोग इस दिन को शम्भू नरका पंडुम के रूप में मनाते हैं।

शम्भू शेक का चित्र (स्रोत-इंटरनेट)

कोयवंशीय गोंड समुदाय में 'कोसोडूम' नामक पेंकमढ़ी कोट के गण प्रमुख कुलितरा के पुत्र थे जिसने अपने तपोबल से'मूंद शूल सर्री' त्रिगुण मार्ग को प्रतिपादित किया। इस कार्य हेतु उसे संभु शेक या पांच खंड धरती के मालिक कहा जाने लगा, इन्हें शम्भू मादाव भी कहा जाता था।


गंडोद्विप में कुल 88 संभु (44जोड़ी) हुए जो दाई शुक्ति के नाम से पहचाने जाते थे, संभु-मुला प्रथम जोड़ी, संभु-गवरा मध्य जोड़ी एवं संभु-पार्वती अंतिम जोड़ी हुए इन्हीं संभु-पार्वती के समय में ही गंडोद्विप में गैर आदिवासियों के टोलियों का आगमन हुआ, वे सीधे तौर से नगर में प्रवेश नहीं कर पाए, क्योंकि बाहरी लोगों का किसी नगर में प्रवेश असम्भव होता था।


तब उनके और यहाँ के आदिवासियों के बीच आक्रमण होने लगा, इन दोनों के संस्कृति और संस्कार में ज़मीन - आसमान का अंतर था, इस युद्ध में गैर आदिवासियों ने कोयावंशिय के गढ़ कोटों को जलाकर राख कर दिए थे, जिससे छुब्ध शम्भू का तांडव होने से पहले कूटनीतिक तरीके से उनके द्वारा माघ पूर्णिमा में शांति प्रस्ताव रखा गया। इसे भोले भाले आदिवासी समझ नहीं सके, विभिन्न शांति और विकास के प्रस्तावों में सहमति होने के बाद पूरे गण्डजीवों के लिए विषाक्त भोज परोसा गया, शम्भू शेक को दाल में कुछ काला नजर आया और उन्होंने खुद उस भोजन का पहले सेवन करने का निर्णय लिया और जैसे ही अंदेशा सच हुआ उन्होंने उस भोजन को सेवन करने से मना कर दिया।


शम्भू के साथ आए गण भड़क उठे और उन्होंने बाहरी व्यक्तियों को मार-पीट कर उस क्षेत्र से भगा दिया, किन्तु शम्भू बेहोश हो गए थे, चारों तरफ़ गमगीन माहौल था, शम्भू विभिन्न योग के ज्ञाता थे और उसी योग के बल से 13 दिन बाद उनको होश आया। तब सभी गंडजीव खुशी से उत्सव मनाने लगे और तब से लेकर आज तक इस दिन को शम्भू नरका पंडुम के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है।


आभार:- पेन मोती रावेन कंगाली


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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