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जानिए आदिवासियों द्वारा पैरा/पुआल से बनाये जाने वाले इस सुन्दर पीढ़ा के बारे में

हम सभी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ आदिवासी वनांचल क्षेत्र है जहाँ विशेष रुप से आदिवासियों का ही निवास है। यदि कोरबा जिले को ही देखा जाए तो वहाँ कोरवा, मांझी, धनवार, कंवर, पांडो, गोंड, अगरिया आदि आदिवासी समुदायों का निवास है। ये सभी समुदाय प्राचीन काल से ही आत्मनिर्भर रहे हैं, और अपनी ज़रूरत की चीज़ें खुद ही बना लेते हैं। हालाँकि अब आधुनिकीकरण का प्रभाव हर जगह दिखने को मिल रहा है, इससे आदिवासी भी अछूते नहीं हैं। परंतु आदिवासी समुदाय अभी भी अपने पुराने ज्ञान को भूले नहीं हैं और अपने इस ज्ञान का उपयोग करते रहते हैं।


आज के जमाने में लोग बैठने या खाना खाने के लिए कुर्सी-टेबल, बेंच, आदि का प्रयोग करते हैं, परंतु आदिवासी समुदाय रचनात्मक तरीके से अपने हाथों से ही इन सुविधाओं का इंतजाम करते आये हैं। ऐसे ही एक अनोखे कला का नमूना धान के फसल कटने के बाद देखने को मिलता है। छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी समुदाय धान मिसाई/पिटाई के बाद बचे पैरा/पुआल का अनेकों उपयोग करते हैं। इससे रस्सी, बैठने के लिए छोटा पीढ़ा एवं सोने के लिए गद्दा बनाया जाता है।

पैरा/पुआल को गूँथ कर रस्सी नुमा आकार दिया जा रहा है।

शहरों में मशीनों से प्लास्टिक के छोटे-छोटे पीढ़ा बैठने हेतु बनाए जाते हैं, वहीं आदिवासी घरों में सामान्यतः लकड़ी का पीढ़ा मिलता है। परंतु कई लोग धान के पैरा से भी गोलाकार पीढ़ा तैयार करते हैं, जिसकी ऊँचाई लगभग 12 से 15 सेंटीमीटर होती है। इस खूबसूरत एवं बहुउपयोगी पीढ़ा को बनाने में लगभग 1 घंटा लगता है।


पैरा का उपयोग करके विभिन्न उपयोगी वस्तुओं को बनाने की कला गाँव में चंद लोगों को ही पता होता है, कोरबा जिले के ऐसे ही एक आदिवासी प्रेम सिंह अगरिया से हमारी मुलाक़ात हुई। प्रेम जी ने बहुत कम समय में ही इन चीज़ों को बनाने की जानकारी हासिल कर लिए थे। वे बताते हैं कि, उन्होंने अपने पूर्वजों और पड़ोसियों से देखकर ही इस कला को सीखा है।


बड़े ही अनोखे अंदाज में उन्होंने हमें बताया कि, जिस प्रकार महिलाओं की बेनी (चोटी) बनता है, उसी प्रकार पैरा को भी बेनी के समान गूथते हुए रस्सी का आकार दिया जाता है। पैरा के जो हिस्से इधर उधर बिखरे होते हैं उन्हें कैंची या हँसिया से काट दिया जाता है। और फिर उसे गोलाकार आकार में लपेट-लपेट कर पीढ़ा बना दिया जाता है, अंत में उस पीढ़ा को पत्थर की सहायता से हल्का-हल्का पिट कर सभी हिस्सों को अच्छे से बैठा दिया जाता है।

पैरा से तैयार हुए इस पीढ़ा का इस्तेमाल कहीं भी बैठने के रूप में किया जा सकता है। ठंड के दिनों में यह पीढ़ा गर्मी का एहसास भी दिलाता है। इन दिनों होने वाले शादी विवाहों में अक्सर इस पीढ़ा का उपयोग किया जाता है।

कई आदिवासी इस पीढ़ा को अच्छे से सजाकर बाज़ार में बेचते भी हैं, अतः पैरा से पीढ़ा बनाना आमदनी का भी एक साधन है।

पैरा से बने पीढ़ा पर आराम से बैठे हुए प्रेम सिंह जी।

पैरा पीढ़ा जैसे अनेकों ज़रूरत की चीज़ें आदिवासी खुद से बना लेते हैं। सरकार आत्मनिर्भर भारत की बात करती है, वहीं आदिवासी सदियों से आत्मनिर्भर रहे हैं। सरकारों को आदिवासियों की इन आत्मनिर्भरता से सीखना चाहिए, और इस चीज़ का बढ़ावा भी देना चाहिए। हम युवाओं को भी प्रेम जी जैसे गुणवान बुज़ुर्गों से इन बहुमूल्य कलाओं को सीखना चाहिए।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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