कोल्हान के वीर देवेन्द्र मांझी की पुण्यतिथि, जंगल आन्दोलन की लौ आज भी जल रही है!
- Narendra Sijui

- Oct 14, 2025
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कोल्हान में अनेक विद्रोह और आंदोलनों हुए हैं। आज़ादी से पहले यहाँ हुए हो-विद्रोह और कोल विद्रोह अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भारत में सबसे पहली लड़ाइयों में से एक माने जाते हैं। लेकिन आज़ाद भारत में भी यहाँ बड़े आंदोलन हुए और झारखंड के बनने में उन आंदोलनों की बड़ी भूमिका रही है। उन्हीं में से एक प्रमुख आंदोलन रहा है जंगल आंदोलन, और उसी आंदोलन के एक अग्रणी नेता देवेन्द्र मांझी की आज पुण्यतिथि है। उन्हीं की याद में यह लेख देवेन्द्र मांझी के जीवन और उनके नेतृत्व में किए गए आंदोलन पर प्रकाश डालता है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से यह आदेश दिया गया कि कोल्हान के सारंडा जंगल को वन्य अभयारण्य घोषित किया जाए, परंतु वहाँ के लोग विरोध में उतर गए हैं। कोल्हान के लोगों ने कभी भी अपनी स्वायत्ता का समझौता नहीं किया है, और जब कोल्हान के विद्रोह, आंदोलनों और उनमें से निकले नेताओं की बात होगी तो उनमें से एक नायक देवेन्द्र मांझी को जरूर याद किया जाएगा।
देवेंद्र मांझी का नाम और जंगल आंदोलन सतही तौर पर सुनने में साधारण लग सकता है, जैसे यह भी जल, जंगल और जमीन से जुड़ा एक सामान्य आंदोलन रहा हो। परंतु जब आप इस लेख को विस्तार से पढ़ेंगे, तो जान पाएंगे कि इस आंदोलन के कारण धारा 107 के तहत लगभग 15,000 आदिवासी-मूलवासियों को गिरफ्तार किया गया था।
इस आंदोलन का नेतृत्व आंदोलनकारी देवेन्द्र मांझी कर रहे थे। देवेन्द्र मांझी के बचपन के बारे में बताया जाता है कि जब वे आठवीं कक्षा के विद्यार्थी थे, तब एक शिक्षक ने कक्षा में आदिवासियों को अपशब्द कहे। इस पर उन्होंने तीव्र विरोध किया और प्रधानाध्यापक के समक्ष शिक्षक को अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ी। देवेन्द्र मांझी तीन भाइयों और छह बहनों में सबसे छोटे थे। जब वे मात्र पाँच वर्ष के थे, तभी उनके पिता जगत मांझी का निधन हो गया था।
सोचिए, उस समय का माहौल कैसा रहा होगा, जब रात के 12 बजे पुलिस घरों में घुसकर आदिवासी-मूलवासी लोगों को जबरन उठा ले जाती थी, और जो घर पर नहीं मिलते थे, उनके घरों की कुर्की कर सभी सामान जब्त कर लिए जाते थे। यदि उस दर्द को और गहराई से महसूस करना चाहते हैं, तो 8 सितंबर 1980 के गुवा गोलीकांड के बारे में अवश्य जानिए।
चक्रधरपुर में उस समय बीड़ी कंपनियों का बड़ा अड्डा था। असनतलिया, इन्दकाटा आदि गाँवों में बीड़ी बनाने का काम होता था। मजदूरी मात्र ₹1.50 मिलती थी। कम मजदूरी के प्रति मजदूरों में असंतोष तो था, लेकिन कोई नेतृत्वकर्ता नहीं था। ऐसे में देवेन्द्र मांझी ने नेतृत्व संभाला और आंदोलन की रणनीति तैयार की।
जब चक्रधरपुर में एक विशाल रैली आयोजित की गई, तो उस दिन पूरा क्षेत्र बंद रहा। कहा जाता है कि आदिवासियों की इतनी बड़ी रैली “दिकुओं” (शोषक वर्ग) ने पहले कभी नहीं देखी थी। सरकार और कंपनी दोनों बौखला गए। आंदोलनकारियों को जेल में डाल दिया गया, लगभग 300 लोगों को गिरफ्तार किया गया। चाईबासा जेल भर जाने के कारण कुछ को हजारीबाग जेल भेजा गया। वे लगभग ढाई महीनों तक जेल में रहे। जनसमर्थन इतना प्रबल था कि 300 आंदोलनकारियों की जमानत जन सहयोग से कराई गई। इस आंदोलन के बाद बीड़ी मजदूरों की मजदूरी ₹2.50 कर दी गई।
जब कोल्हान, विशेषकर चक्रधरपुर क्षेत्र से मजदूरों को कोलकाता के ईंट-भट्ठों में काम करने के लिए बड़े पैमाने पर ले जाया जा रहा था, तो व्यापक पलायन हो रहा था। देवेन्द्र मांझी, गंगाधर महतो और अन्य सहयोगियों ने इस समस्या के विरोध में आवाज़ उठाई। परिणामस्वरूप, उनके विरुद्ध ही केस दर्ज कर दिए गए।
1976 में बिहार सरकार ने वन विकास निगम गठित किया और विश्व बैंक से सहायता लेकर परंपरागत साल और फलदार पेड़ों को काटकर सागवान (टीक) के पेड़ लगाने की नीति बनाई। स्थानीय आदिवासियों और मूलवासियों ने इसका विरोध किया। सीधी आंदोलन के तहत सरकार को सहयोग न देना, हाट-बाज़ार में टैक्स न देना और सागवान वृक्षारोपण का विरोध करना शुरू हुआ। कई स्थानों पर टकराव की स्थिति बनी और पुलिस ने लाठीचार्ज किया। सागवान के पौधों को उखाड़कर फेंकने की शुरुआत सोमरान वन क्षेत्र से हुई, क्योंकि इसके लिए साल और फलदार पेड़ों को काटा जा रहा था।
इस विरोध को लेकर हो भाषा में एक गीत प्रचलित हुआ:
ओरा नातोम सागोवन दारू
लेसे केन लेसे केन ना
दिकु दिसुम बागे कियाते
चिना चिकाम हुजु लेना
वीर जिलु शांगर लेका को तोञं गोए पिया
(बा पोरोब के धुन में)
हिन्दी अर्थ:
रास्ते किनारे के सागवान दारू पेड़
क्यों इतना इतरा रहें हो..
दिकु शासक ( अपना दिसुम) छोड़ कर
क्या करने आए यहां पर
तीर धनुष थामे एकजुट है-हम
जंगली जानवर की तरह तीर धनुष से शिकार कर देंगे।
इस प्रकार जंगल कटाई को रोकने के लिए आंदोलन की नई रणनीति बनी, जो आगे चलकर जंगल आंदोलन के रूप में प्रसिद्ध हुआ। धीरे-धीरे जनता देवेन्द्र मांझी को एक नेतृत्वकारी चेहरे के रूप में देखने लगी। देवेन्द्र मांझी को स्नेहपूर्वक “देवेन” कहा जाता था। उनके सहयोगी मित्रों में बागुन सुम्ब्रुई, जयपाल सिंह मुंडा, सुशील बागे और चक्रधरपुर के गंगाधर महतो प्रमुख थे। सभी सहयोगी देवेन्द्र मांझी के घर माढ़-भात खाकर आंदोलन के लिए निकलते थे।
देवेन्द्र मांझी की लोकप्रियता इस कदर थी कि उनके सम्मान में हो भाषा में गीत गाए जाने लगे:
देवेन आयार आयारे को ते
देवेन तयोम तयोमे को ते
पुतेम पारा पारा को लेका
सिरेमे अपीर ओए को लेका
देवेन आयार आयारे को ते
देवेन तयोम तयोमे को ते
हिन्दी अर्थ:
देवेन्द्र के साथ आगे आगे चले
देवेन्द्र के साथ पीछे पीछे चलें
कबुतर, जंगली कबुतर की झुंड की तरह
आसमान में उड़ते चिड़ियों की तरह
देवेन्द्र के साथ आगे आगे चले
देवेन्द्र के साथ पीछे पीछे चलें
गुवा क्षेत्र में खनन कंपनियों के शोषण के खिलाफ भी आक्रोश था। इसी क्रम में 8 सितंबर 1980 को गुवा बाजार में आंदोलन हुआ, जिसमें पुलिस ने निर्मम गोलीबारी की। इसमें 11 आंदोलनकारी और 4 पुलिसकर्मी शहीद हुए। इसके बाद देवेन्द्र मांझी को गिरफ्तार कर लिया गया और तीर-धनुष पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पुलिस ने हजारों लोगों को अंधाधुंध गिरफ्तार किया, थानों में पिटाई की और घरों की कुर्की की। काले रंग का कोई भी व्यक्ति दिखने पर उसे गिरफ्तार कर लिया जाता था। इस पूरे घटनाक्रम में लगभग 15,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
देवेन्द्र मांझी ने आंदोलन के साथ-साथ राजनीति में भी कदम रखा। उन्होंने 1980 में चक्रधरपुर और 1985 में मनोहरपुर विधानसभा सीट से चुनाव में विजय प्राप्त की। 14 अक्टूबर 1994 को गोइलकेरा हाट बाजार में बारूदी विस्फोट में उनकी हत्या कर दी गई। हालांकि उनका देहांत हो गया, लेकिन उनके सिद्धांतों और विचारों की गूंज आज भी सारंडा और कोल्हान के जंगलों में सुनाई देती है।

वर्तमान में उनका परिवार राजनीति के क्षेत्र में काफी चर्चित है, क्योंकि उनकी पत्नी जोबा मांझी मनोहरपुर विधानसभा से पाँच बार विधायक रह चुकी हैं और वर्तमान में सिंहभूम लोकसभा से सांसद हैं। उनके बेटे जगत मांझी ने 2024 के विधानसभा चुनाव में विजय प्राप्त की है और वर्तमान में मनोहरपुर के विधायक हैं। जगत मांझी अपने पिता देवेन्द्र मांझी और दादा जगत मांझी द्वारा दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं। उन्हें उनके दादाजी के नाम पर नामित किया गया ताकि उनके गौरवशाली व्यक्तित्व को जीवित रखा जा सके। दरअसल, आदिवासी समाज में बच्चों का नामकरण अपने पूर्वजों के नाम पर करने की परंपरा रही है।
जोबा मांझी कहती हैं —
“जल, जंगल, जमीन की रक्षा करना हमारी प्राथमिकता है। हमने जंगल में रहने वालों को वनाधिकार का पट्टा दिलाया है। हम देवेन्द्र मांझी का सपना साकार करेंगे।”
आंदोलनों की श्रृंखला में कोल्हान–पोड़ाहाट का जंगल आंदोलन एक ऐतिहासिक घटना रही है। जब-जब जंगल आंदोलन की बात होगी, तब-तब देवेन्द्र मांझी का नाम इतिहास के पन्नों में गौरव के साथ लिया जाएगा।
देवेन्द्र मांझी का जीवन और उनका संघर्ष केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है; यह कोल्हान के आदिवासी समाज की अपनी ज़मीन, जंगल और सांस्कृतिक आत्मा की रक्षा की अनवरत लड़ाई का प्रतीक है। उनके नेतृत्व में हुए आंदोलनों ने न केवल स्थानीय आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को उजागर किया बल्कि आदिवासी अधिकारों के संदर्भ में व्यापक राजनीतिक सतर्कता और सक्रियता को भी जन्म दिया। आज जब सारंडा और अन्य जंगलों के भविष्य पर विवाद खड़ा है, देवेन्द्र मांझी की आवाज़ और उनकी नीतियाँ हमें याद दिलाती हैं कि पर्यावरणीय न्याय और समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए सतत जागरूकता और संगठित संघर्ष जितना आवश्यक था तब था, उतना ही आज भी आवश्यक है।
साभार : livehindustan.com, downtoearth.org.in, Voice of the Forest: Totem Talkies
लेखक परिचय:- झारखण्ड के रहने वाले नरेंद्र सिजुई जी इतिहास के छात्र हैं और आदिवासी जीवनशैली से जुड़े विषयों पर प्रखरता से अपना मत रखते हैं।




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