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सोनी सोरी 11 सालों बाद हुईं रिहा, पुलिस और न्यायिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल

सोनी सोरी को आज से 11 साल पहले साल 2011 में एक झूठे मामले में दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किया गया था। 1 5 मार्च 2022 को स्पेशल कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए सोनी को इस मामले में बेगुनाह पाया और उन्हें बरी कर दिया।


सोनी सोरी, ये नाम जिसे मैं पहले नहीं जानती थी कभी नहीं भूल पउंगी। मेरे ख्याल से हर एक व्यक्ति को सोनी सोरी का नाम याद रखना चाहिए। उस समय भी जब वह खुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहती है या कहता है। उस समय भी जब वह समाज में हो रहे अपराधों के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाता है। उस समय भी जब कानून और इंसाफ की बात की जाती है। हर एक उस पल में जब यह कहा जाता है कि पुलिस और अदालत इंसाफ़ और लोगों की सुरक्षा के लिए है। न्याय की देवी की आँखों पर लगी पट्टी सच में बंद नहीं है, उस समय भी सोनी सोरी का नाम याद रखा जाना चाहिए।

credit – New Internationalist

मैं पूछती हूँ, क्या कभी किसी को देखा है दर्द की आह निकल जाने तक भी लड़ते रहना? सिर्फ़ आरोपों के बिनाह पर सालों अँधेरी कोठरी में उम्र बिता देना। यौन प्रताड़ना सहना। नाम के पुलिस सुरक्षाकर्मियों, पुलिस अध्यक्ष द्वारा भद्दी बातें सुनकर भी हक़ और इंसाफ़ के लिए लड़ते रहना, तब तक जब तक शरीर थककर खुद को समेट नहीं लेता। फिर दोबारा होश आने पर अपनी लड़ाई शुरू कर देना वो भी उस जगह जहां पहले ही आपको दोषी करार दिया जा चुका है।


इन सब चीज़ों के बावजूद भी आखिर में जीतकर दिखाना कि हाँ, मेरी लड़ाई लंबी ज़रूर थी पर मेरा हौसला कभी कम नहीं हुआ। मैनें वो लड़ाई जीती जिसमें सब मुझे हराना चाहते थे।


मैंने एक ऐसी ही निडर महिला के बारे में जाना, जिसे कानून की हर किताब और समाज का हर एक इंसान जानेगा, उनका नाम है (सामजिक कार्यकर्ता) सोनी सोरी। मुझे नहीं पता कि आखिर वह क्या चीज़ थी जिसने इन्हें सालों लड़ते रहने की उम्मीद दी। मुझे यह पता है कि इन्होंने आगे कई और महिलाओं को लड़ते रहने का जज़्बा दिया है।


सोनी सोरी को आज से 11 साल पहले साल 2011 में एक झूठे मामले में दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किया गया था। सोरी और तीन अन्य लोगों पर आरोप था कि वे माओवादियों को पैसा पहुंचाते थे। बीते 15 मार्च 2022 को स्पेशल कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए सोनी को इस मामले में बेगुनाह पाया और उन्हें बरी कर दिया। इस मामले में बरी होने के साथ ही सोरी पिछली भाजपा सरकार के दौरान उनके ख़िलाफ़ दर्ज़ हुए सभी मामलों से भी बरी हो गई हैं।


आपको बता दें, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के कटेकल्याण तहसील स्थित बड़े बेदमा की रहने वाली सोनी सोरी दंतेवाड़ा में एक स्कूल में पढ़ाती थी व आदिवासी बच्चों के हॉस्टल को संभालने का काम करती थीं। जब उन पर यह आरोप लगाया गया कि वह माओवादियों से पैसे लेन-देन का काम कर रही हैं तो उन्हें अध्यापिका की पोस्ट से बर्ख़ास्त कर दिया गया। उनके पिता मुंडा राम कांग्रेस में नेता और बड़े बेदमा गाँव के सरपंच भी रहे हैं।


विशेष जज विनोद कुमार देवांगन ने सोरी, उनके साथी लिंगाराम कोडोपी, एक ठेकेदार बीके लाला और एस्सार के अधिकारी डीवीसीएस वर्मा को सितंबर 2011 में दंतेवाड़ा पुलिस द्वारा दर्ज की गई प्राथमिक रिपोर्ट में दोषी नहीं पाया। पुलिस ने आरोप लगाया था कि आरोपी लाला ने एस्सार कंपनी की ओर से माओवादियों को देने के लिए 15 लाख रुपये सोरी और कोडोपी को दिए थे।


“11 साल लौटा सकते हो मेरे”- सोनी सोरी

11 सालों बाद झूठे मामले के आरोप से रिहा होने के बाद पीटीआई को दिए बयान में सोनी सोरी कहती हैं, “मुझे गलत केस में फंसाया गया। खुद को निर्दोष साबित करने में मुझे 11 साल लग गए। मैं लड़ती रही। मैं एक स्कूल टीचर थी लेकिन झूठे आरोपों ने मेरी जिंदगी, मेरी गरिमा और मेरे सम्मान को बर्बाद कर दिया। मेरे साथ मेरे परिवार को परेशान होना पड़ा। कौन मेरे 11 साल लौटाएगा? उन्होंने पूछा कि क्या केंद्र और राज्य सरकारें उनके 11 साल लौटा सकती हैं?”


सोनी सोरी पर यह थे आरोप


साल 2010 में स्वतंत्रता दिवस के विरोध में 14 अगस्त को नक्सलियों ने 6 ट्रकों में आग लगा दी थी। पुलिस ने इस मामले में सोनी सोरी को भी आरोपी मान गिरफ़्तार किया था। पुलिस ने सोनी सोरी पर राजद्रोह, दंगा भड़काने, एक्सटॉर्शन (ज़बरन वसूली) आदि से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज़ किया था।


प्रताड़ना का आरोपी डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर

अंकित गर्ग (credit – Feministsindia)

सोनी सोरी के आरोप के अनुसार, जिस बड़े पुलिस अधिकारी की वजह से उन्हें प्रताड़ना सहनी पड़ी, उसका नाम है अंकित गर्ग। यह उस समय दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक थे। वर्तमान में छतीसगढ़ पुलिस में डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल के पद पर हैं।


डिप्टी इंस्पेक्टर जैसा बड़ा पद उस व्यक्ति को दिया गया है जिसका प्रताड़ना में सबसे बड़ा हाथ था। एक आरोप के बिनाह पर एक महिला सामजिक कार्यकर्ता को 11 सालों तक जेल में रखना यहां कानून व्यवस्था ने जायज़ समझा। वहीं जब यौन उत्पीड़न का आरोप महिला ने लगाया तो इसके बदले में न तो पुलिस अधिकारी को लेकर कोई कार्यवाही की गयी, न उसे बर्खाश्त किया गया और न ही उसके बारे में अदालत ने कुछ कहा। इसे क्या अदालत का इंसाफ कहना जायज़ कहा जाएगा ?


सोनी सोरी की ज़मानत याचिका


साल 2013 में जब सोनी ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ज़मानत के लिए याचिका दी थी तो सरकार ने यह कहकर अर्ज़ी रद्द कर दी थी कि उनके ऊपर लगाए गए सारे आरोप बहुत ही ज़्यादा गंभीर है। उसी साल सुप्रीम कोर्ट ने सोनी की ज़मानत याचिका इस शर्त पर मानी थी कि वह छत्तीसगढ़ में नहीं रहेंगी। साथ ही उन्हें हर हफ़्ते दिल्ली पुलिस को रिपोर्ट करना पड़ेगा।


ज़मानत के बाद राजनीति में हुईं शामिल

credit – Patrika News

साल 2013 में ज़मानत के बाद उन्होंने राजनीति में अपना कदम रखा। साल 2014 में वह आम आदमी पार्टी में शामिल हो गयीं। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में आप पार्टी ने सोनी को बस्तर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा लेकिन वह हार गयीं। इसके बाद उन्होंने साल 2019 में आम आदमी पार्टी छोड़ दी।


सोनी सोरी पर हुआ था हमला


एक प्रेस कांफ्रेंस से जब सोनी सोरी वापस लौट रही थीं। उस समय बाइक पर सवार तीन लोग आये और उनके मुंह पर जली हुई ग्रीस फेंक दी। इस हमले में उनका चेहरा बुरी तरह से जल गया। उन्हें सरिता विहार, दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था।


इस हमले के बारे में सोनी सोरी ने कहा कि वे सिर्फ अपने ज़ख्मों के भरने का इंतज़ार कर रही हैं इसके बाद वे फिर काम पर लग जाएंगी, ‘‘इस हमले ने मुझे चुनौती दी है, अब मुझे कोई नहीं रोक सकता’’।


जानें सोनी सोरी ने रिहा होने के बाद क्या कहा – रिपोर्ट


झूठे केस से रिहा होने पर सोनी सोरी से न्यूज़्लॉन्डरी ने बात की। न्यूज़्लॉन्डरी की 24 मार्च 2022 को प्रकाशित रिपोर्ट में सोनी सोरी ने बताया, आधी रात बीत चुकी थी। दंतेवाड़ा पुलिस थाने के एक कमरे में मौजूद एक बड़े पुलिस अधिकारी वहां मौजूद दो महिला पुलिसकर्मियों को कुछ नसीहत दे रहे थे। कहा, “आज यहां जो भी होगा इस बात की किसी को भनक नहीं लगनी चाहिए वरना तुम्हारी नौकरी चली जाएगी।”

इतना कहने के बाद महिला पुलिसकर्मियों को उस कमरे से बाहर जाने को कह दिया गया। उनके जाते ही वहां पर मौजूद पुलिस वालों ने कमरे में बंद 37 साल की सोनी सोरी को गंदी-गंदी गालियां देते हुए मारना शुरू कर दिया।


ये पुलिस वाले यहां नहीं रुके। कुछ देर बाद पुलिस वाले उसे बिजली के झटके देने लगे। काफ़ी देर तक इसी तरह यातनाएं देने के बाद उन पुलिस वालों ने ज़बरदस्ती महिला के कपड़े उतार दिए। महिला को पूरी तरह निर्वस्त्र कर दिया। भद्दी-भद्दी बातें कहने लगे और उसे एक दीवार के सहारे खड़ा कर दिया। महिला अपने हाथों से अपने शरीर को ढकने की कोशिश करती तो पुलिस वाले बंदूकों से उसके हाथों को हटा देते। उसकी छाती पर बंदूक की नालियों से मारने लगते, कहते “हाथ नीचे रखो।”


सोनी ने आगे कहा, मौके पर मौजूद बड़ा पुलिस अधिकारी गालियां देते हुए कह रहा था, “तेरा शरीर देखकर तो नहीं लगता कि तू इतना सेक्स कर सकती है, कैसे तू नक्सलियों को खुश रखती है, तू बुलाती है ना नक्सलियों को अपने घर लेकिन शरीर देखकर तो नहीं लगता कि तू उनको खुश कर पाती होगी। शरीर के दम पर आश्रम (आदिवासी बच्चों का हॉस्टल) बचाने की बात करती है। एक दिन में कितने लोगों के साथ करती हो।”

इतना कहने के बाद, थोड़ी देर में 4-5 पुलिसवालें महिला के सामने खुद के कपड़े उतारना शुरू कर देते हैं। महिला उन पुलिस वालों से गुज़ारिश कर रही थी, उन्हें मना कर रही थी पर उन पुलिस वालों ने उसे ज़मीन पर पटक दिया। उसके दोनों हाथों और पैरों को पकड़ उसके गुप्तांगो में पत्थर डाल दिए। कुछ ही देर में दर्द से महिला बेहोश हो गयी।


यह जानकर या पढ़कर आपको भी मेरी ही तरह गुस्सा आ रहा होगा। यह कानून व्यवस्था की बर्बरता का जीता-जागता सबूत है। 9 अक्टूबर 2011 को शुरू हुए झूठे आरोपों के सिलसिले ने सोनी सोरी से उसके जीवन के कीमती 11 साल छीन लिए। इतना ही नहीं उसे इस कदर प्रताड़ित किया कि अब यह सवाल उठता है कि जिन महिलाओं को पुलिस हिरासत में रखा जाता है उनके साथ क्या होता होगा?


“बाइज़्ज़त बरी” करना उलाहना नहीं तो क्या है?


15 मार्च 2022 को दंतेवाड़ा की एक विशेष अदालत ने सोनी सोरी को बेगुनाह पाते हुए बाइज़्ज़त बरी कर दिया। “बाइज़्ज़त बरी कर दिया”, यह शब्द बेहद उलाहना करने वाला है। 11 सालों तक महिला के साथ यौन उत्पीड़न करना, शारीरिक और मानसिक तौर पर दर्द देते रहना और बिना गलती की सज़ा देने के बाद यह कहा जा रहा है कि महिला को “बेगुनाह पाते हुए बाइज़्ज़त बरी कर दिया।” क्या यह वाक्य अदालत या फिर किसी के भी द्वारा कहना यहां शोभायमान लगता है? इस वाक्य को भी गलत आरोप की तरह बस रिहाई का फैसला सुनाते हुए थोप दिया गया है ताकि अख़बारों और इतिहास के पन्नों में कहीं कोई यह न कह दे कि अदालत ने किसी महिला का अपमान किया है। उसे बिना किसी अपराध के 11 सालों तक जेल में रखा है। उसे इस बात का अफ़सोस नहीं है।


सोनी सोरी का जीवन और नक्सलियों से लड़ाई


सोनी सोरी साल 2014 के बाद से गीदम में रहती हैं। दंतेवाड़ा, बीजापुर, जगदलपुर, सुकमा, बस्तर आदि के ग्रामीण इलाकों में जब भी किसी आदिवासी को पुलिस या नक्सलियों द्वारा प्रताड़ित किया जाता तो उनकी मदद के लिए सोनी सोरी सामने आ खड़ी होतीं। जानकारी के अनुसार, बस्तर में हज़ारों की संख्या में बेगुनाह आदिवासियों को नक्सली घोषित कर जेलों में कैद किया गया है। वैसे भी छत्तीसगढ़ को नक्सलियों का गढ़ भी कहा जाता है तो ऐसे में निर्दोषों को नक्सली बना देना तो बेहद आसान काम है।


नक्सलियों द्वारा की जाने वाली हिंसाओं के नाम पर कई बेगुनाहों की हत्याएं भी हुई हैं। एक तरफ पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा लोगों पर अत्याचार होते हैं। वहीं नक्सलियों को जब यह लगता कि व्यक्ति पुलिस का कोई खबरी है तो उन्हें बेरहमी से मार दिया जाता। ऐसे में सोनी सोरी छत्तीसगढ़ के लोगों व उन्हें इंसाफ देने के लिए पिछले 8-9 सालों से लड़ती आ रही हैं।


उनके पारिवारिक जीवन की बात की जाए तो साल 2007 से 2008 एक ऐसा समय था जब उनका एक भरा-पूरा परिवार था। उस समय वह दंतेवाड़ा की कुवाकोंडा तहसील के जबेली गांव में आदिवासी बच्चों के लिए बनाए गए एक हॉस्टल की अधीक्षिका थीं। उनके तीन बच्चे थे और उनके पति अनिल फुटाने भी उस समय जीवित थें। यह वह समय था जब नक्सलियों का उस क्षेत्र में दबदबा बढ़ता जा रहा था। नक्सलियों द्वारा कई कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की हत्याएं भी कर दी गई थी। इलाके में स्कूल, हॉस्टल जैसे शैक्षणिक संस्थानों को वह बर्बाद कर रहे थे। ऐसे में एक दिन नक्सलियों ने फरमान ज़ारी किया कि सभी हॉस्टल अधीक्षक उनसे आकर जनअदालत में मिलें। यह सूचना सोनी सोरी तक भी पहुंची।


जब पहली बार नक्सलियों से मिलीं सोनी सोरी


न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत के दौरान वह उस समय को याद करते हुए कहती हैं, “मैं उस वक्त जबेली के नवीन सयुंक्त आश्रम की अधीक्षक थी। वहां लड़के-लड़की दोनों पढ़ते थे। नक्सलियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था और वह बहुत से स्कूलों को तोड़ रहे थे। मार्च के महीने में उन्होंने जबेली के पास के जंगलों में बुलाया तो पहले तो मैं बहुत डर गई थी फिर जबेली पंचायत के लोगों ने मुझसे कहा कि नक्सली अगर बुलाते हैं तो जाना पड़ता ही हैं और अगर मुझे उस इलाके में काम ज़ारी रखना है तो जाना भी होगा और ऐसे डरने से काम नहीं चलेगा। जब मैं गांव के 3-4 लोगों के साथ वहां पहुंची तो मेरे अलावा अन्य कोई भी हॉस्टल अधीक्षक वहां नहीं आया था। मैं बहुत डरी हुई थी। वहां जनसभा शुरू थी, लगभग 5,000 गांव वाले वहां मौजूद थे। वो पहला मौका था जब मैंने नक्सलियों को आमने-सामने देखा था। मैं लगभग तीन घंटे उस जनसभा में थी।


नक्सलियों ने मुझसे कहा कि वो मेरा हॉस्टल और उस इलाके में आने वाले सारे हॉस्टलों को तोड़ देंगे। मैंने बहुत डरते-डरते उनसे पूछा कि वो ऐसा क्यों करना चाहते हैं। उनका जवाब था कि सुरक्षाबल, स्कूलों और हॉस्टलों में आकर रुकते हैं और आदिवासियों को परेशान करते हैं इसीलिए वो उन्हें तोड़ना चाहते हैं।”

वह आगे कहती हैं, “मेरी हिम्मत तो नहीं हो रही थी लेकिन कुछ समय बाद बहुत हिम्मत बटोर कर मैंने उनसे कहा कि वो उनका हॉस्टल न तोड़ें वरना बहुत से आदिवासी बच्चे मुश्किल में आ जाएंगे। मेरे हॉस्टल में बहुत से बच्चे ऐसे थे जो सलवा जुडुम हिंसा का शिकार थे। उनके पास ऐसे हॉस्टलों के अलावा और कोई ठिकाना नहीं था। कुछ देर आपस में चर्चा करने के बाद नक्सलियों ने मुझसे कहा कि वह मेरा हॉस्टल नहीं तोड़ेंगे बशर्ते पुलिस और सुरक्षाबल वहां कभी नहीं ठहरने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर एक बार भी पुलिस वाले हॉस्टल में रुके तो मुझे जनसभा में अधमरा होने तक पीटा जाएगा या फिर मौत के घाट उतार दिया जाएगा। मेरे साथ जो गांव के लोग थे वो भी डर गए थे। वो मुझसे कह रहे थे कि मैं कैसे पुलिस को स्कूल और हॉस्टलों में रुकने से मना करुंगी।”


नक्सलियों से बातचीत के बाद उन्होंने सोरी का हॉस्टल तो नहीं तोड़ा लेकिन पुलिस ने उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया था। जब भी वह जबेली से अपने घर समेली आती-जाती तो पुलिस उन्हें रास्ते में रोककर उनसे पूछताछ करने लगती। पूछती थी कि उन्होंने किस तरह से नक्सलियों से अपनी आश्रमशाला को बचाया जबकि बाकी आश्रमशाला नक्सलियों ने तोड़ दी हैं।

पुलिस वाले सोरी से कहते कि उनके नक्सलियों से गहरे संबंध हैं। उन्हें उनके बारे में काफ़ी जानकारी है। वह उनसे कहते कि उन्हें पुलिस के लिए नक्सलियों की मुखबिरी ( खबरी, सूचना देने वाला) करनी चाहिए।


सोरी के पिता, पति पर भी हुए हमले


साल 2010 में नक्सलियों ने कांग्रेस नेता अवधेश गौतम के घर पर हमला कर दिया जिसमे दो लोगों की मौत हो गयी। इस मामले में पुलिस ने सोरी के पति अनिल फुटाने को भी गिरफ़्तार कर लिया। तीन साल बाद अदालत ने उन्हें रिहा कर दिया लेकिन तब तक उनके आधे शरीर को लकवा मार चुका था। बरी होने के कुछ दिनों बाद ही उनकी मौत हो गयी।


सोनी सोरी कहती हैं, “मैं जहां भी जाती थी पुलिस मुझे रोक लेती थी। वो मुझ पर इलजाम लगाते थे कि मेरे नक्सलियों से करीबी संबंध हैं। वो मुझसे कहते थे कि मुझे पुलिस का मुखबिर बनना होगा वरना जैसे मेरे पति को जेल में डाला है वैसे ही वो मुझे भी जेल में डाल देंगे। मैं उन्हें हमेशा समझाती थी कि मेरा नक्सलियों से कोई संबंध नहीं है लेकिन वो मुझे फिर भी परेशान करते रहते थे। साल 2011 में उन्होंने मुझ पर एस्सार की तरफ से नक्सलियों को पैसे पहुंचाने का केस दर्ज करवा ही दिया।”


वह आगे कहती हैं, “मेरे पति को पुलिस ने 2010 में गिरफ़्तार किया था। उनको जेल में पुलिस बहुत मारती थी। जब भी मैं उनसे मिलने जाती थी तो वो रोते हुए जेल में उनके साथ हो रहे टार्चर (प्रताड़ना) के बारे में बताते थे। जहां एक तरफ पुलिस ने मेरे पति को जेल में बंद कर रखा था, वहीं जून 2011 में नक्सलियों ने बड़ेबिड़मा स्थित मेरे पिता मुंद्राराम सोरी के घर पर हमला बोल दिया था। उनके घर में तोड़-फोड़ करने के बाद उनके पैरों में गोली मार दी थी। वो बच गए थे और दंतेवाड़ा के महारानी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। मेरे तीन छोटे बच्चे भी थे उनकी देख-रेख भी करनी थी।”


आगे कहा, “मेरे पिता पर हुए हमले की शिक़ायत दर्ज़ कराने के लिए 9 सितंबर 2011 को मैं और मेरे भतीजे लिंगाराम कोडोपी, अपने वकील से आवेदन लिखवाने के लिए दंतेवाड़ा आए थे। वकील से आवदेन लिखवाने के बाद हमने कुवाकोंडा पुलिस थाने में आवेदन दिया और फिर हम दोनों मेरी मां से मिलने पालनार पहुंचे। मेरी मां ने समोसे खाने की इच्छा जाहिर की तो लिंगा बाजार से समोसे लेने गया। जब वह लौट रहा था तो सादे कपड़ों में पुलिस वाले उसे ज़बरदस्ती अपने साथ ले जाने लगे। हमने उन्हें बहुत रोकने की कोशिश की लेकिन वो लिंगा को ज़बरदस्ती अपने साथ उठा ले गए। हम पुलिस के पीछे भी गए लेकिन बहुत पीछे रहे गए। हम नकुलनार और पालनार पुलिस थाने भी गए लेकिन हमें किसी ने कुछ नहीं बताया।”


उस दिन अपने भतीजे लिंगा की तलाश करने के बाद, सोरी शाम को जबेली स्थित हॉस्टल में आईं। वहां बच्चों से मिलने के बाद समेली में वह अपने घर लौट गईं। अगले दिन वह फिर लिंगाराम को तलाशने निकलीं। जब वह पालनार पहुंची तो उनके छोटे भाई ने उनके पिता से फोन पर बात करने के लिए कहा। जब उन्होंने अपने पिता को फोन किया तो वह बहुत घबराए हुए थे। वह सोरी से कहीं भाग जाने के लिए कह रहे थे। पिता ने बताया कि एक पुलिस वाले ने उन्हें जानकारी दी है कि पुलिस सोरी को गिरफ़्तार करने वाली है। सोरी को तब तक यह पता ही नहीं था कि पुलिस ने उन पर और लिंगाराम पर नक्सलियों को पैसे पहुंचाने का मामला दर्ज़ कर लिया था। सोरी ने कहा, “मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि पुलिस मुझे क्यों गिरफ़्तार करना चाहती है। इसके बाद में वहां से जबेली हॉस्टल पर आई, फिर वहां से जब मैं समेली अपने घर जा रही थी, तब कुछ गाय चराने वाले बच्चे भाग रहे थे। जब मैंने उनसे पूछा कि क्या हुआ तो वो बोले कि बहुत सारे पुलिस वाले उनकी तरफ आ रहे हैं। यह सुनते ही मैं वापस जबेली की तरफ लौटने लगी, मैं हॉस्टल नहीं गई लेकिन वहां से गुजरते हुए जंगल में चली गई। मुझे डर लग रहा था कि इतनी सारी पुलिस क्यों आ रही है। मैं तो हॉस्टल नहीं गई लेकिन पुलिस ने हॉस्टल पर धावा बोल दिया था।”


वह आगे कहती हैं, “पुलिस ने हॉस्टल से निकलकर जंगल का रुख किया और जिस इलाके में मैं छुपी थी वहां कुछ देर तक वो अंधाधुंध गोली चलाते रहें। मेरी किस्मत थी कि मुझे गोली नहीं लगी। मुझे आज भी वो जगह याद है। सुबह 5 बजे तक मैं वहीं जंगल में छुपी रही और फिर 15 किलोमीटर पैदल चलकर अपने पिता के गांव बड़ेबिड़मा पहुंची। बड़ेबिड़मा के हमारे घर को भी नक्सलियों ने तहस-नहस कर दिया था। सुबह हॉस्टल के चपरासी मुझे ढूंढ़ते हुए गांव पहुंचे। उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें बहुत पीटा है। बहुत से बच्चों के साथ भी मारपीट की। सलवा जुडुम हिंसा के शिकार तकरीबन 50 बच्चे डर के मारे जंगल में भाग गए थे।”


कुछ लोगों की मदद से दिल्ली पहुंची सोनी


11 सितंबर 2011 तक सोनी सोरी के बारे में अख़बारों में खबरें छपनी लगी थीं कि वह एस्सार ग्रुप की तरफ से नक्सिलयों को पैसे पहुंचाती हैं। 3-4 दिनों बाद नक्सलियों ने ग्रामीण इलाके में बैठक बुलाई और कहा कि सोनी सोरी उनके नाम पर पैसे खा रही है। उन्होंने ऐलान किया कि सोरी को जनअदालत में पेश किया जाए और जो भी उन्हें अपने घर में जगह देगा उसे नक्सली सजा देंगे। इस वारदात के बाद सोरी जिनके घर में छिप कर रह रही थीं उन्होंने सोरी को वहां से तुरंत निकल जाने की सलाह दी क्योंकि पुलिस और नक्सली दोनों से उनकी जान को खतरा था।


सोरी कहती हैं, “मैं बुरी तरह फंस गई थी। कुछ समझ में नहीं आ रहा था फिर मैंने दिल्ली में समाजसेवी हिमांशु कुमार से मदद मांगी। उन्होंने मुझसे किसी भी तरह से दिल्ली पहुंचने के लिए कहा, लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं वहां कैसे पहुँचूँ। उस रात मैं उस घर से निकलकर गांव के दूसरे पारा (मोहल्ले) में पहुंची। वहां एक बुज़ुर्ग विधवा महिला ने मुझे पनाह दी। मैं दिनभर घर में बंद रहती थी और सिर्फ रात को ही बाहर निकलती थी। मैंने खाना-पीना भी बिलकुल कम कर दिया था, जिससे दिन में शौच न जाना पड़े। फिर 3-4 दिन बाद कुछ लोगों को पता चला तो उन्होंने बुज़ुर्ग महिला को डराना शुरू कर दिया कि पुलिस और माओवादी उसे मार देंगे। एक दिन जब उस महिला ने रोते हुए मुझे इस बारे में बताया तो मैंने वहां से निकलने का फैसला लिया।”


इसके बाद सोरी रात को तकरीबन 2 बजे उस बुज़ुर्ग महिला के घर से निकल गयीं। कहा, “कुछ 4-5 लोगों ने मेरी वहां से निकलने में मदद की। कोरीरास नाला कंधे तक भरा हुआ था लेकिन उन लोगों की मदद से मैंने वो नाला पार किया। नाला पार करने के बाद एक मोटरसाइकल पर मैं तकरीबन चार बजे एक रिश्तेदार के घर मुखपाल गांव पहुंची। वहां जाकर मैंने पूरी आदिवासी वेशभूषा पहनी और फिर सुकमा की तरफ मोटरसाइकल पर निकली। सुकमा पहुंचने के बाद एक गाड़ी में बैठकर मैं ओडिशा के मलकानगिरी होते हुए विशाखापट्नम पहुंची। रास्ते में दो जगह पुलिस वालों ने रोका लेकिन जाने दिया। विशाखापट्नम पहुंच कर एक दिन मैंने स्टेशन पर ही बिताया। स्टेशन पर भी जब पुलिस दिखती थी तो मैं अखबार से अपना मुंह छुपाने की कोशिश करती थी। बहुत डर लग रहा था। अगले दिन मैं ट्रैन पकड़ कर दिल्ली के लिए रवाना हो गई। उस दिन मैं जीवन में पहली बार ट्रैन में बैठी थी।” – ( सोनी सोरी द्वारा न्यूज़्लॉन्डरी से की गयी बातचीत)

credit – Twitter

सारे झूठे आरोपों से अदालत ने सोनी सोरी का नाम साफ़ तो कर दिया लेकिन मामले में जिन पुलिस अधिकारियों की गलती थी उन्हें पकड़ने को लेकर कोई आदेश नहीं दिए। सोरी ने जिस बड़े अधिकारी अंकित गर्ग पर आरोप लगाया था, वह इस समय भी अपने डिप्टी इंस्पेक्टर की कुर्सी पर हैं। एक निडर सामाजिक कार्यकर्ता महिला को पुलिस और कानून ने 11 साल पहले मिलकर दोषी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज यही कानून एक बार फिर आरोपियों के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कह रहा। उन पुलिसकर्मियों के ऊपर कोई सवाल नहीं उठाये जा रहे, जो मामले के इंचार्ज थे। उन पुलिस कर्मियों को सज़ा नहीं दी जा रही जिन्होंने महिला के साथ यौन और मानसिक उत्पीड़न की घटना को अंजाम दिया था। यह आख़िर कैसा इंसाफ है? यह मामला सीधे तौर न्यायिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।


नोट:- यह लेख ख़बर लहरिया की अनुमति के साथ पुनर्प्रकाशित किया गया है।

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