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आखिर क्यों आत्म निर्भर कहे जाने वाले आदिवासी हो रहे हैं दूसरों पर निर्भर ?

आदिवासी हमेशा से ही अपने दिनचर्या में इस्तेमाल किए जाने वाले सभी आवश्यक सामग्री का निर्माण स्वयं ही करते आए हैं। आदिवासी समुदाय के लोग कभी भी किसी सामग्री के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहे हैं, वे प्रकृति की पूजा करते हैं और प्रकृति जो उन्हें देती है उनसे ही वे अपने पूरे जीवन भर की आवश्यकताओं के अनुसार अपने उपयोग में आने वाली सामग्री तैयार करते आए हैं, चाहे वह पहनने के लिए कपड़ा हो या खाने के लिए भोजन या रहने के लिए घर, सभी के लिए आदिवासी खुद निर्माण करते आए हैं।


लेकिन आज इस आधुनिक युग में विकास के नाम पर बहुत सारे सुख सुविधाएं के मोह में कई आदिवासी समुदाय अपनी पुरानी जीवनशैली को भूलने के कगार पर आ चुके हैं, जो आदिवासी थोड़े शहरी क्षेत्रों में रहने लगे हैं उन्हें आज अपनी संस्कृति के बारे में इतनी अच्छी तरह से जानकारी नहीं है, और न ही इसके बारे जानकारी है कि उनके पूर्वज अपने आवश्यक सामग्री खुद निर्माण कर लेते थे, आज सदियों से स्वालंबी कहे जाने वाले आदिवासी अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दूसरे के सामने हाथ फैला रहे हैं।

पहले लोग कुछ इस तरह से अपने धान को संरक्षित किया करते थे

पहले के समय में आदिवासी रुपये पैसा को उतना महत्व नहीं दिया करते थे। पहले आदिवासी समुदाय में धान से ही सभी आवश्यक सामग्री की खरीदी की जाती थी। आदिवासी किसान धान उगाते थे और जितने धान की पैदावार होती थी उन्हीं से साल भर गुजारा करना होता था, जिसमें से आधे धान को चावल बनाया जाता था, चावल बनाने के लिए भी वह अपने ही संसाधनों का उपयोग करके धान से चावल अलग करते थे, और बाकी बचे हुए धान को रखे रहते थे ताकि कभी कोई आवश्यकता पड़ने पर उस धान को बेचकर उसकी जगह दूसरी कोई वस्तु खरीद सकें। लेकिन आज यही धान की पैदावार पूरी की पूरी मंडी में जाकर किसान बेच देता है और उसकी जगह बैंकों में जाकर लाइन लगा लेता है जहाँ से उन्हें पैसे मिलते हैं वह पैसा ज्यादा देर तक रख नहीं पाते हैं कोई न कोई काम में खर्च कर लेते हैं उसके बाद सेठ साहूकार के पास से आवश्यकतानुसार ऋण ले लेते हैं जिसका ब्याज पटाते हुए पूरे साल निकल जाता है।


सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग के अध्यक्ष नरेंद्र धुर्व जी बताते हैं - "हमारे समुदाय में विकास के कारण कई चीज़ें विलुप्त होती जा रही है इसमें कोई दो मत की बात नहीं है, जैसे- हमारे समुदाय में कोई भी विवाह या कोई भी विशेष शुभ कार्य होता था तो गाँव के सभी घर से एक-एक व्यक्ति जिसके यहाँ शादी होनी होती थी उसके लिए जंगल से लकड़ी और पत्तल इकट्ठा करके लाते थे और उसी लकड़ियों से भोजन पकाया जाता था और उन्हीं पत्तरों में सभी लोगों को बिठा कर खाना खिलाया जाता था। सभी को बिठा कर भोजन कराने के लिए एक मंडप तैयार किया जाता था जिसके लिए जामुन के डालियों को काटकर छत की तरह बनाया जाता था, धीरे-धीरे यह सभी चीज़ें विलुप्त होती जा रही हैं और इनकी जगह डिस्पोजल पत्तल और टेंट हाउस ने ले ली है। अपने समय बचाने के लिए एवं थोड़ी सी सुविधा के लिए लोग अपनी अद्भुत संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। पानी के लिए भी एक सामूहिक कुएं या नदी के आसपास को साफ़ कर पानी पिया जाता था, जिसके आसपास की सफ़ाई की ज़िम्मेदारी स्वयं गाँव वालों की होती थी तो गाँव वाले प्रतिदिन उस जगह को साफ़ भी करते थे और आसपास को गंदा होने भी नहीं देते थे, लेकिन जैसे-जैसे गाँव में बिजली आई नलकूप की सुविधा पर आश्रित हो गए हैं, आज की स्थिति ऐसी है कि गाँव में कुएं, तालाब और नदी के जल का स्तर इतना कम हो गया है कि वह गर्मी आने से पहले ही सूख जाते हैं और लोग बोरिंग किए हुए नलकूपों पर निर्भर हो गए हैं,ऐसा भी होता है कि बिजली नहीं होती है तो कई दिनों तक पानी के लिए तड़पना भी पड़ जाता है क्योंकि बोर के अलावा और कहीं से पानी पीने का साधन नहीं बच पाया है।"


आज की तारीख में गाँव में दो से तीन घर में अपने खुद के लिए बोर किए हुए नलकूप का साधन उपलब्ध है तो इससे प्रकृति का भी दोहन हो रहा है और गाँव में जो कुएं और तालाब जो पहले साफ नजर आते थे आज उनका उपयोग नहीं होने से गंदा होता जा रहा है। कई जगहों पर तो कुआं व तालाबों को मिट्टी डालकर बंद भी कर रहे हैं। हमारे समुदाय में विवाह में हल्दी का बहुत ही विशेष महत्व माना जाता है इसलिए हमारे समुदाय में पहले के लोग कार्ड नहीं छपवाते थे, सिर्फ एक हल्दी का छोटा सा टुकड़ा विवाह में नेवता के रूप में दिया जाता था। इसी को ही मुख्य निमंत्रण माना जाता था अब लोग महंगे से महंगे कार्ड छपवा लेते हैं जिसे पढ़ने के बाद आदमी उसे घर के किसी कोने में छोड़ देता है जो कुछ दिनों बाद कचरे के डब्बे में चला जाता है।


प्रकृति प्रेमी आदिवासियों में ऐसी बहुत सारी बदलाव हो रहे हैं जो इस आधुनिकता का असर है, थोड़ी सी आरामदेह जीवन सुख सुविधा के लालच में लोग वर्षों पुरानी अपनी परंपराओं और संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, जो बहुत ही चिंताजनक है। सरकारों और आदिवासी संगठनों को आगे आकर इस समस्या का हल जल्द करना होगा अन्यथा आने वाले समय में आदिवासी अपने अस्तित्व को ही भूल जाएंगे।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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