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आदिवासी सृजन का सनातन संसार

आदिवासियत केवल अवधारणा नहीं है बल्कि यह ऐसी विराट सभ्यता, संस्कृति और समाज से उपजी धरोहर है जिसे शेष समाज कभी उसका गौरवपूर्ण स्थान नहीं दे पाया। शेष समाज ने विकास और विचार की जिस मुख्यधारा की स्थापना की उसका मकसद ही आदिवासियत की धरोहर को खारिज़ करना था / है। सभ्यता के अग्रगामी होने के साथ-साथ उस समूचे आदिवासी समाज से उसका सर्वस्व छीनने का जो इतिहास शुरू हुआ, उसने दुनिया के प्रथम समाज को सदा सर्वदा के लिये दूसरे दर्ज़े में धकेल दिया। शनैः शनैः आदिवासी समाज के संसाधन ही नहीं बल्कि उनके अस्तित्व से जुड़ी भाषा, संस्कृति और ज्ञान को भी (तथाकथित) मुख्यधारा के समाज नें खारिज़ कर दिया।


लेकिन, सर्वकालीन आदिवासी शब्दकोष और विचारकोष की जडें इतनी व्यापक और गहन हैं कि उसकी अभिव्यक्ति को कदाचित, कभी भी - कोई भी समाप्त कर ही नहीं सकता। वास्तव में पूरी दुनिया के आदिवासी समाज के अपने ज्ञान और रचना संसार में इसे महसूस किया जा सकता है।


15 मार्च वर्ष 1932 में सूदूर कनाडा के मूल निवासियों की अपनी भूमि नोवा स्कोटिया में विलक्षण प्रतिभा रीता जोय का जन्म हुआ था । रीता अपने आपको एस्कासोनी मूलनिवासियों की बेटी कहा करती थी । वर्ष 1999 में लिखित कृति “हम स्वप्नदर्शी हैं” में दर्ज़ विचार वास्तव में मुख्यधारा के समक्ष ऐसे प्रश्न खड़ा करते हैं – जिसके उत्तर हैं ही नहीं।

रीता जोय (फ़ोटो स्रोत-stu-acpa.com)

रीता जोय लिखती हैं


मैं अपनी भाषा भूल गई

क्यूंकि चुरा लिये तुमनें शब्द मेरे

मुझे मज़बूर किया तुमनें

अपने तरह अपनी भाषा बोलने

मैं बोलने लगी तुम्हारी भाषा

सोचने लगी तुम्हारी तरह

देखने लगी समाज और देश को तुम्हारी दी हुई नज़रों से

और फिर

धीरे धीरे वीरान होती गयी मेरी दुनिया

सदियों बाद

अब - मैं हासिल करना चाहती हूँ

अपनी भाषा - अपने शब्द - अपनी दृष्टि – अपने विचार

ताकि बता सकूँ तुम्हें कि

मैं कौन हूँ


आज कनाडा में रीता के वंशज - मूल निवासियों की अपनी भाषा, अंग्रेजी की नई भाषाई उपनिवेश की आखेट बन चुकी है। उनका भूगोल अपघटित कर दिया गया है और उन्हें विपन्नता के हाशिये पर खदेड़ दिया गया है। उस हाशिये में जहाँ शेष समाज और उसके प्रगतिशील प्रयास, उन्हें हर क़दम पर पिछडे होने का दोयम अहसास कराना चाहते हैं। रीता का वैचारिक प्रतिरोध मुख्यधारा के नशे में लड़खड़ाते उस समूचे व्यवस्था के प्रति है, जो मूल निवासियों को जड़हीन और अस्तित्वहीन बना देना चाहता है। यहाँ तक कि मूलनिवासियों भाषा और रचना संसार को भी मुख्यधारा से अलग साबित कर दिया गया। रीता जोय मानती हैं कि उनसे भाषा और विचार और दृष्टिकोण छीनकर उन्हें वीरान करती इस दुनिया को अब यह बतानें का वक़्त आ गया है कि “हम कौन हैं”।

सुषमा असुर (फ़ोटो स्रोत- फॉरवर्ड प्रेस)

कनाडा के मूल निवासियों की धरती से हज़ारों मील दूर यहाँ भारत में झारखण्ड की सुषमा असुर, अपने उस आदिवासी समाज की युवा प्रतिनिधि रचनाकार है जिनके शब्द, मुख्यधारा को बपौती मानने वालों के विरुद्ध तीखे सवाल खडे करती हैं। सुषमा मानती हैं कि आदिवासी समाज की जीवटता ही उनकी धरोहर है। 5 जुलाई 1983 को गुमला के सखुआपानी गाँव के असुर आदिवासी परिवार में जनमी सुषमा नें वर्ष 2010 में ‘असुर सीरिंग’ रचा जो असुर समाज के साहित्य की पहली किताब है। ‘आदिम राग’ के रूप में उनका काव्य संग्रह, उसके अपने समाज के बरक्स उस पूरी व्यवस्था के समक्ष निर्भीक वक्तव्य है - जिसनें सुषमा के अपने असुर समाज को लगभग निहत्था कर दिया। सुषमा का अपना गाँव सखुआपानी, गुमला के नेतरहाट के घने जंगल के अंधेरे में तथाकथित विकास से वंचित लेकिन संसाधनों से संपन्न है। सुषमा असुर के अपने हिस्से, आज अपने ही वतन में मुट्ठीभर ज़मीन हासिल का शेष ज़िन्दा सपना भर रह गया है। बॉक्साइट के खदानों से खोखले होते जंगल-ज़मीन के मुआवज़ों की भीख को नकारती सुषमा असुर अपने ही समाज को पूछती है


कितने दिन

ज़मीन बेचा हुआ रुपया पैसा रहेगा?

कितने दिन पत्थर तोड़ोगे?

देखना - एक दिन ऐसा समय आयेगा

जब बच्चे

तुम्हारे खून से

दीपक जला-जला कर खोजेंगे सब

उस दिन तुम्हारी आँखों से गिरेगा पानी

सभी सूख गये झरनों का पानी

झर झर झर


सुषमा असुर की निडरता वास्तव में मुख्यधारा के नाम पर शोषण और अन्याय का आविष्कार करते उस व्यवस्था के विरुद्ध आदिवासी समाज का अपना मौलिक जवाब है – जिसे नये शब्दों और अर्थों में बाहर आना ही होगा। भारत में आज बहुसंख्यक आदिवासी समाज – उनकी अपनी संस्कृति और संसाधनों के अधिग्रहणों भर के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि अपने उस पूरे परिवेश को बचाने के संकल्प के साथ खड़ा है, जो उनके अपने आदिवासियत का नया पर्याय है।


भारत के झारखण्ड से हज़ारों मील के फासले पर 3 नवम्बर 1920 को जनमी ऊद्गेरू नूनुच्कल, ऑस्ट्रेलिया की विख्यात मूलनिवासी रचनाकार रही हैं। उन्होनें अपने सपनों के अनुरूप ‘शैक्षणिक सांस्कृतिक केंद्र’ की स्थापना की और हज़ारों मूलनिवासी बच्चों को नई दृष्टि (अथवा मूलदृष्टि) देने का ऐतिहासिक कार्य किया। ऊद्गेरू कहती हैं कि मैनें मूलनिवासियों की नई पीढ़ी को अपनी ‘संस्कृति और प्रकृति’ से परिचय कराना, अपनें जीवन का लक्ष्य बना लिया। उद्गेरू की पूरी जीवनयात्रा में उन्हें गहरी टीस रही कि उनकी अपनी मातृभूमि से लाखों मूलनिवासियों को हमेशा के लिये बेवतन कर दिया गया। यही नहीं बल्कि मूलनिवासियों की सांस्कृतिक धरोहर और पहचान को नेस्तनाबूद करने के लिये तथाकथित (अ)सभ्य क़ानून और (अ)व्यवस्था का आक्रामक साम्राज्य स्थापित किया गया।


अपनें कालजयी “उम्मीदों का गीत” के माध्यम से उद्गेरू, पुरज़ोर पुकारती है

भोर हो रही है

आओ मेरे लोगों को तलाशो

शब्द जाग रहे हैं

एक नई सुबह की प्रत्याशा में

मुझे प्रतीक्षा है

जब कोई हमें कलंकित न करे

जब कोई बंदिशे हमें रोक न सकें

कोई रंग, शर्मिंदगी का अहसास न करवा सके

कोई उपहास निराश न कर सके

मुझे उस भोर – उस सुबह – उन बच्चों की तलाश है


सदियों बाद भी ऑस्ट्रेलियन मूलनिवासियों के लिये वो सुबह नहीं आई। उनकी अपनी धरती में खड़ी सम्पन्नता की इमारतों के जंगल में मानो, उद्गेरू के वक्तव्य कहीं खो गये। ऑस्ट्रेलिया, उस तथाकथित सभ्य औपनिवेशिक दुनिया की संपत्ति बन गयी जहाँ मूल निवासी लगभग बेपनाह हो गये।

सफ़िया एल्हिल्लो (फ़ोटो स्रोत-thefourthriver.com)

अफ्रीका के आदिवासियों के गुमनाम होने का अर्धसत्य भी, किसी दूसरे महाद्वीपों के मूलनिवासियों से अलग नहीं है। अफ्रीका की अन्नदा धरती के वीरान होने की सच्चाई और उस सच्चाई मे छिपे शेष समाज की साजिशों नें उन्हें इतना अधिक खोखला कर दिया है कि उनका आत्मविश्वास तक बिखर चुका है। 16 दिसंबर 1990 को सूडान में जनमीं सफ़िया एल्हिल्लो का अपेक्षाकृत नया रचना संसार मानों समूचे अफ्रीका के अंधेरे का एकालाप है।

सफ़िया अपनी विद्रोही रचना ‘मैं नहीं मरूंगी’ में बेबाकी से कहती हैं कि


गुजर गई शताब्दियाँ

अफ्रीका के मानचित्र पर रोते हुये

अब मैं सीखना नहीं चाहती

अपने पितरों का गीत

बल्कि लिखना चाहती हूँ - मैं कवितायें

अपने दरकते हुये देह पर

उन सुलगते खेतों पर

उन बीहड़ मैदानों पर

मिटते मानचित्रों पर

और

उन सबके पीछे छिपे हाथों पर

जिन्हें अब - मैं पहचान सकती हूँ


अपने स्वनिर्वासन की त्रासदी मानों सफ़िया भर का दंश नहीं बल्कि अफ्रीका के हर उस नौजवान का वर्तमान है जो आज इक्कीसवीं सदी में पश्चिमी देशों के नये गुलाम बनकर वो चुका रहे हैं। जहाँ, अपनी धरती और अपने खेत के प्रति बेइंतिहा मोहब्बत भी, उनके भूखे पेट और अपने ही वतन में पराये हो जाने के भय के आगे अर्थहीन है। ऐसे में अफ्रीका के नये दौर की प्रतिनिधि रचनाकार सफ़िया, उन सबको ‘पहचानने’ का साहस दिखाती है- जो आदिवासियत को समाप्त करने के शर्म से एक सदी आगे बढ़ चुके हैं।


संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित “आदिवासी भाषा का दशक” (2022-2032) मालूम नहीं अपने निहित लक्ष्यों में किस हद तक सफ़ल – असफ़ल रहेगा। लेकिन इतना तो तय है कि अमरीका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया सहित एशिया के मूल निवासियों और आदिवासियों में उनके बीते हुये ‘कल’ के विरुद्ध ‘आज’ से सवाल करने का साहस फिर ज़ाग चुका है। साहस के इस नये सपनों के मध्य रीता जोय, सुषमा असुर, ऊद्गेरू नूनुच्कल और सफ़िया एल्हिल्लो के शब्द्बीज, शनैः शनैः (मुख्य) धारा के विरुद्ध लहलहाती फ़सल बनकर तैयार हो रही हैं। आज आदिवासी समाज को अपना बीता हुआ कल चाहिये, इसलिये नहीं कि वे अपने अतीत में जीना चाहते हैं – बल्कि इसलिये कि वे अपनी जड़ों को फिर से उसकी गहराई और गहनता दे सकें।


नोट:- यह लेख लेखक के अनुमति के बाद डाउन टू अर्थ से पुनर्प्रकाशित किया गया है।


लेखक परिचय:- रमेश शर्मा एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक के रूप में कार्यरत हैं। वे भारत में ऐसे कई गठबंधनों के सक्रिय सदस्य हैं जो मुख्य रूप से भूमि अधिकार, किसान अधिकार, आदिवासी, खानाबदोश और दलित समुदायों के अधिकार, महिला भूमि अधिकार आदि से संबंधित मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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