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मुश्किलों से लड़कर स्वालंबी बनने का संदेश दे रहे हैं, छत्तीसगढ़ के आदिवासी मछुआरे

आदिवासी समुदाय प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर अपना जीवन जीते हैं। दुनिया के हर हिस्से का आदिवासी प्रकृति के अनुरूप ही जीता है। जो लोग जंगलों में रहते हैं वे जंगल के संसाधनों से अपना जीवन चलाते हैं, जो जंगल के बाहर के गाँवों में रहते हैं वे कृषि तथा पशुपालन कर अपना जीवन व्यतीत करते हैं, और जो लोग नदी किनारे रहते हैं, वे मछली मारकर अपना जीवन बिताते हैं।


छत्तीसगढ़ में ऐसे ही अनेक आदिवासी मछुआरों का समुदाय रहता है। राज्य में मॉनसून का असर कम हो रहा है और बारिश थमने लगी है, वे बरसाती नदियाँ जो अब तक उफ़ान मार रहीं थीं, अब धीरे-धीरे शाँत होकर बहने लगी हैं। नदियों में पानी का धीरे-धीरे बहना, मछली पकड़ने के लिए बहुत ही अनुकूल माहौल होता है। नदी किनारे रहने वाले सभी आदिवासी मछुआरे इस मौसम में मछ्ली पकड़ने में लग जाते हैं।


मछ्ली पकड़ कर बेचना ही इन मछुआरों का मुख्य पेशा है, इसीलिए बरसात के पहले से ही ये लोग अपना-अपना जाल बनाना शुरू कर दिए रहते हैं। ज्यादातर लोग अपना जाल खुद ही बनाते हैं। किसानों की तरह ये मछुआरे भी बारिश पर ही निर्भर रहते हैं, यदि बारिश कम हो तो नदियों में मछलियाँ कम मिलती हैं, वहीं यदि बारिश ज्यादा हो जाये तो काफ़ी दिनों तक नदी का जल सामान्य नहीं हो पाता, और इस वजह से मछली पकड़ना भी संभव नहीं होता।


बरसात के मौसम में जैसे ही नदियों का जलस्तर बढ़ता है, बड़ी-बड़ी नदियों से मछलियाँ छोटी नदियों में आ जाती हैं और जलस्तर के कम होने के साथ वे वापिस जाने लगती हैं, उसी समय उन्हें पकड़ा जा सकता है। कुछ प्रजाति की मछलियाँ जलस्तर के कम होने पर बड़ी नदियों से छोटी नदियों में विचरण करने के लिए आती हैं। ये मछुआरे इस वक़्त का इंतजार कई महीनों से करते हैं, वैसे तो साल भर ये नदी व तालाब में मछली पकड़ते रहते हैं, परंतु बरसात के बाद ही इन्हें ज्यादा मछली पकड़ने का अवसर मिलता है।


दिन-रात करके ये अपने जालों से मछलियाँ पकड़ तो लेते हैं, परंतु सही बाज़ार के न मिलने से बिचौलियों के हाथों ही इन्हें अपने मछलियों को कम कीमत पर बेच देना पड़ता है। इसी तरह साल भर ये मछुआरे अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं।


हमने चर्रा गाँव के कार्तिक राम जी से बातचीत की, कार्तिक जी पत्नी सहित अपने घर पर ही जाल बनाकर मछलियाँ पकड़ते हैं। उनके बेटे-बेटियाँ शादी करके अलग रहते हैं। कार्तिक जी कहते हैं कि, "मैंने अपने पिताजी से जाल बनाना एवं मछली पकड़ना सीखा है। जाल बनाने के लिए कच्चे धागों, बाँस के लकड़ियों और अलुमिनियम के मोटे तार की आवश्यकता होती है। अलुमिनियम के तार को औज़ार जैसा बनाकर धागा को बुना जाता है। धागों के कीमत बढ़ने से अब अच्छे क्वालिटी के धागों को खरीद पाना मुश्किल होता है, ऐसे में चालू क्वालिटी के धागों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

अपने हाथों से ही जाल बुनता मछुआरा

अच्छी मछलियाँ रात को मिलती हैं, ऐसे में प्रतिदिन दो से चार घंटे ठंडे पानी में रहना पड़ता है जिससे तबियत खराब होने की संभावना बनी रहती है। बरसात के समय तो मछली पकड़ने वालों की संख्या भी बढ़ जाती है ऐसे में कम दामों में ही मछलियों के बेचना पड़ता है। मुश्किलें हैं पर पुरखों से यह काम करते आये हैं, और कहीं बाहर जाकर किसी के यहाँ काम करने के बजाय यहीं रहकर मछली पकड़ना ज्यादा अच्छा लगता है।"


स्वालंबी बनकर ज़रूरत आधारित जीवनशैली अपनाना आदिवासियों से बेहतर कोई नहीं जानता। काम के लिए किसी पर निर्भर न होकर स्वालंबी होना कितना आवश्यक है, इसका एहसास हमें इस कोरोना काल में हो चुका है। मछली पकड़ कर बेचना भी स्वालंबी होना ही है, सरकार को मछुआरों की सहायता कर उन्हें बढ़ावा देना चाहिए।


यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है जिसमें Prayog samaj sevi sanstha और Misereor का सहयोग है l


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