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छत्तीसगढ़ की एक जनजाति है जिनके घरों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व ब्राह्मणों तक का प्रवेश वर्जित है

Updated: Mar 6, 2021


लाल बंगले को इष्ट देवी-देवताओं का पवित्र स्थान मानते हैं

हर समाज या जनजाति की अपनी एक अनूठी परम्परा और रीति रिवाज होते हैं जो उन्हें बांकी समाजों से अलग करते हैं और एक अलग पहचान देते हैं। ऐसे ही भुंजिया आदिवासी जनजाति के लाल बंगले की परम्परा उन्हें बांकियों से अलग पहचान देती है। वे अपने लाल बंगले को इष्ट देवी-देवताओं का पवित्र स्थान मानते हैं।

भुंजिया आदिवासी कहते हैं कि लाल बंगला देवी-देवताओं का प्रमाण और उनकी देन है। इस लाल बंगले में सबकी आस्था और सबका विश्वास आज भी बना हुआ है।


यह बंगला महिलाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। ये अपने लाल बंगले में ही खाना पकाते और खाते हैं। महिलाऐं लाल बंगले के आस-पास ही खाना खाती हैं, बंगले से दूर नहीं खाती हैं। ये महिलाएं अन्य समुदाय में भी खाना-पीना नहीं खाती हैं। चोकोटिया भुंजिया जनजाति में ही लाल बंगला बनाने का रीति-रिवाज है ।


भुंजिया जनजाति में तीन उपजातियाँ हैं - 1. चोकोटिया भुंजिया जनजाति, 2. खोलारझीया भुंजिया जनजाति, और 3. चिन्डा भुंजिया जनजाति चोकोटिया भुंजिया जनजाति में लाल बंगला बनाने का रिवाज है। यह एक खास कमरा (रूम) है, जो उनकी आस्था से जुड़ा हुआ है। भुंजिया जनजाति के लोग इस लाल बंगले को अपने इष्ट देवी-देवताओं का पवित्र स्थान मानते हैं। इस समुदाय के लोग लाल बंगला को ऊँचाई में अक्सर छोटा ही बनाते हैं। इसे बनाने के लिए छीन्द (खजूर), बांस, खड़ (खादर), लकड़ी इत्यादि का प्रयोग करते हैं।

इसके दीवार को लाल रंग या लाल रंग की मिट्टी से पोता जाता है

क्यों खास है लाल बंगला? चोकोटिया भुंजिया समुदाय के लोग अपने घरों के साथ अलग से एक छोटा-सा घर बनाते हैं, जिसको लाल रंग दिया जाता है। इस ख़ास घर को लाल बंगला कहते हैं। ये लाल बंगला का उपयोग रसोई के लिये करते हैं।

किसी दूसरी जनजाति या अन्य किसी भी समुदाय के लोग लाल बंगले में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। इसका कारण है कि भुंजिया समुदाय के लोग अपने लाल बंगले में इष्ट देवी-देवता, कुलदेवी की पूजा-अर्चना करते हैं और वे इसे अपना पवित्र स्थान मानते हैं। लाल बंगला इस समुदाय के हर परिवार में होता है क्योंकि इनके पूर्वजों का मानना है कि यह इनकी प्रमुख पहचान है जो एक अनूठी परम्परा को कायम रखती है।


लाल बंगले का रसोई में उपयोग : इसके दीवार को लाल रंग या लाल रंग की मिट्टी से पोता जाता है और नीचे गोबर पानी से लीपा जाता है। ये लोग खाना पकाने के बाद थोड़ा सा खाना और सब्जी पत्ते में निकालकर चूल्हे में या लाल बंगले के छत्ते में देवी-देवताओं के नाम से डाल देते हैं, उसके बाद ही घर का कोई सदस्य खाना खाता है।

इनका विशेष भोजन महुआ का फूल है, जिसे ये लोग पका कर खाते हैं और इनका लड्डू भी बनाते हैं। लाल बंगले से बाहर निकाले हुए खाने को वापस लाल बंगले में नही लाया जाता है।

भुंजिया समुदाय में महिलाएँ जब मासिक धर्म में होती हैं तब वे लाल बंगले में प्रवेश नहीं करती हैं।

लाल बंगले में जूते-चप्पल व रबर का बेल्ट पहनकर प्रवेश नहीं करते हैं।

महिलाओं का खाली पैर चलने की पुरानी प्रथा आज भी है।


लाल बंगले में यदि कोई दूसरी जाति के व्यक्ति प्रवेश कर जाए या स्पर्श कर ले तो वे लाल बंगले को आग से जला देते हैं। लाल बंगले को जलाने के बाद प्रवेश या स्पर्श करने वाले व्यक्ति द्वारा लाल बंगले का निर्माण कराया जाता है, यदि वह व्यक्ति बनाने के लिए तैयार नहीं होता है तो भुंजिया समुदाय के लोग इसे स्वयं बनाते हैं, और नए लाल बंगला के निर्माण होते तक वे अन्न व जल ग्रहण नहीं करते हैं। परिवार के सभी सदस्य लाल बंगला के निर्माण पूरा होने के बाद ही अन्न व जल ग्रहण करते हैं।

इनके प्रमुख देवी-देवता बूढ़ा- देव, बूढ़ी - माई, डुमादेव (पूर्वज) आदि हैं। ये अपने धार्मिक पुजारी को बैगा कहते हैं।

अपने इष्ट देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए भुंजिया सामुदाय में हर 3 वर्ष में या हर वर्ष अपनी क्षमता अनुसार मुर्गा और बकरे की बलि दी जाती है, भुंजिया समुदाय के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी अपने पूर्वजो की परम्परा को निभाते आ रहे हैं। पूर्वजों के रीति-रिवाज के अनुसार भुंजिया जनजाति में विवाह के बाद जब बेटियाँ मायके आती हैं तो उनका लाल बंगले में प्रवेश निषेध होता है। बेटियाँ इसका विशेष ख्याल रखती हैं।

वे इस रीति-रिवाज का निर्वाह जीवन भर करेंगे। साथ ही उनकी आने वाली पीढ़ी भी अपने रीति-रिवाज को निभाएगी।


छत्तीसगढ़ का गरियाबंद जिला :

गरियाबंद जिले के टेंवारी गाँव में चोकोटिया भुंजिया जनजाति के लोग रहते हैं।

यहां स्थित पैरी नदी के किनारे रहने वाले इस समुदाय की मान्यता है कि इस किनारे को छोड़ भुंजिया समुदाय कहीं और नहीं रह सकता।

इस मान्यता के पीछे किंवदंती प्रचलित है कि महाभारत काल में इन्हें यह जगह रहने के लिए दी गई थी।

जिले के कोदोपाली, हाट महुआ, बाघमार, तेंदुवाय, लिमडीही, डुमरबाहर, गुडलबाय, रायमा, महुआभाटा, कंनफाड, जिडार, बीजापानी, सुकलापारा, सुखरीडबरी, कोपेकसा, केरगांव, धमना, पीपरछेडी, पोटिया, अमेठी, कोठीगांव, जलकीपानी, बागबाहरा, जुनवानी, केडीआम, तालेशर, हरदी, कोसुमबुडा आदि इलाकों में यह जनजाति रहती है।


This article is created as a part of the Adivasi Awaaz project, with the support of Misereor and Prayog Samaj Sevi Sanstha.





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