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क्यों आदिवासी जेष्ठ महीने में ही मनाते हैं महुआ त्यौहार

मनोज कुजूर द्वारा सम्पादित

हमारे देश में विभिन्न प्रकार के धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। सबकी अपनी-अपनी परंपरा, संस्कृति और शैली होती है। जिसके आधार पर उन्हें पहचाना जाता है। कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र है। जितने भी धर्म हैं, उनमें उनकी परंपरा, शैली, वेशभूषा का विशेष महत्व है। यहां तक की उनके रहन-सहन, खान-पान और तौर-तरीके भी भिन्न होते हैं। उसी तरह हमारे देश के कई राज्यों में आदिवासी निवास करते हैं। अलग-अलग राज्यों के आदिवासियों में उनके रहन-सहन, खानपान और पहनावे में काफी अंतर देखने को मिलता है। आदिवासियों के रहन-सहन, तौर-तरीके अलग होने के साथ-साथ काफी रोचक भी हैं। अगर उनके खानपान की बात करें तो वे अधिकतर प्रकृति पर निर्भर होते हैं। यहां प्रकृति का तात्पर्य जंगलों से प्राप्त लघु वनोपज, फल फूल, जड़ी बूटी, कंदमूल आदि से है। इन सबों के बिना वे स्वयं को अधूरा समझते है क्योंकि जंगल से प्राप्त यह उपज उनके पालन पोषण ही नहीं बल्कि उनके आय का एकमात्र साधन है। प्रकृति के बीच में रहकर, ये आदिवासी कई प्रकार के त्योहारों को मनाते चले आ रहे हैं और त्यौहार मनाने की प्रथा उनके पूर्वजों के काल से चली आ रही है।ये सभी त्योहारों को बड़ी धूम धाम से मनाते हैं।


अगर हम त्यौहार की बात करें, तो हमारे छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के द्वारा कई प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं जैसे कर्मा, हरेली का त्यौहार। इस त्यौहार को मनाने के लिए सभी क्षेत्र में एक निश्चित समय निर्धारित होता है। जिसमें सभी आदिवासी एक साथ सहभागिता निभाते हैं, चाहे वे लोग किसी भी परिस्थिति या किसी भी क्षेत्र में हों। लेकिन, कुछ त्यौहार ऐसे भी हैं जिसे मनाते वक्त आसपास के लोगों को जानकारी भी नहीं होती है कि, किस घर में यह त्यौहार मनाया जा रहा है। और अगर जानकारी हो भी जाती है तो, जिस घर पर नवाखाई या महुआ त्यौहार मनाते हैं, उस घर पर अन्य लोग नहीं जाते। यह आदिवासियों का महुआ त्यौहार है। हमारे क्षेत्र में इसे महुआ तिहार कहते हैं।

देवस्थल सरना

यह त्यौहार आदिवासियों के घरों में, जेष्ठ के महीने में मनाया जाता है। किन्हीं-किन्हीं क्षेत्र में एक निश्चित समय पर ही महुआ का त्यौहार मनाते हैं। कोरिया जिला के आसपास रहने वाले आदिवासी और कोरिया जिला में रहने वाले आदिवासी इस त्यौहार को जेष्ठ महीने में मनाते हैं। लेकिन कोरबा जिला के रहने वाले आदिवासियों द्वारा, यह त्यौहार कुंवार के महीने में मनाते हैं। इस त्यौहार में एक परिवार के सभी सदस्य शामिल होते हैं। इस त्यौहार में शादी हो चुकी बेटी या बेटी के ससुराल पक्ष को शामिल नहीं किया जाता। एक ही गोत्र के सभी सदस्य शामिल होते हैं। महुआ त्यौहार मनाते समय अगर कोई मेहमान पहुंच जाते हैं, तो बनाए गए पकवान या खाना को उस मेहमान को नहीं परोसा जाता है, बल्कि उनके लिए अलग से खाना पकाया जाता है। इस त्यौहार में बनाया गया प्रसाद दूसरे लोगों को भी नहीं दिया जाता, केवल घर के ही सदस्य प्रसाद को खाते हैं।

प्रसाद के रूप में खीचड़ी, मीठी रोटी और नारियल

महुआ त्यौहार में एक ही घर के लोग शामिल होते हैं। महिला हो या पुरुष इन सबों का, इस दिन विशेष भागीदारी होती है। घर के सभी सदस्य को अलग-अलग कार्य दिए जाते हैं। बच्चों को छोटे-छोटे कार्य दे दिए जाते हैं। जिसे वे आसानी से कर लेते हैं। महिलाएं घर के अंदर रसोई का काम करती हैं। घर की बहुओं का विशेष योगदान होता है। इस दिन महुआ फूल का महत्व बढ़ जाता है क्योंकि महुआ फूल को आदिवासी अपने देवता पर चढ़ाते हैं। घर में जितनी भी बहुएं होती हैं। भोर में उठकर नहा-धोकर घर की सफाई करती हैं। घर की बड़ी बहू थोड़े से चावल को भिगोकर सिलबट्टे की सहायता से पीस लेती हैं। फिर घर के सभी दीवारों पर हांथा देती हैं।


घर के जिस स्थान को देवता स्थल मानते हैं, उसी जगह काले रंग के मटके को उल्टा रखकर उस पर भी हाथों का चांवल से निशान करती हैं या हांथा देती हैं। अन्य बहुएं चावल की सफाई करके कुछ समय के लिए पानी में भिगो देती है। फिर, महुआ फूल की सफाई कर पानी से अच्छी तरह से धोकर धूप में सुखा देती हैं। भीगे हुए चावल और महुआ फूल को एक साथ मिलाकर खलबट्टा या ढेकी की सहायता से पीस लेते हैं। घर की मुखिया महिला पीसे हुए चांवल, महुआ से हथेली के आकर की, शुद्ध देसी घी डालकर रोटियां पकाती हैं और काले मटके में खिचड़ी पकाती हैं।

महुआ और चांवल से बनाई गयी मीठी रोटी

घर के पुरुष अपने देवस्थल में इन्ही रोटियों और खिचड़ी, सूखे महुवे, नारियल, धुप-दीपक के साथ पूजा अर्चना करते हुए खिचड़ी, रोटी, महुआ को चढ़ाते हैं। अपने सरना में पूजा के लिए इसी प्रकार से सामग्री को रखकर जाते हैं। चढ़ाने के बाद सरना के पास बचे हुए रोटी खिचड़ी नारियल को घर के सभी पुरुष प्रसाद के रूप में उसी स्थान पर खाते हैं। घर की सभी महिलाएं घर के अंदर बचे प्रशाद को घर के अंदर ही खाती हैं इस त्यौहार की एक खासियत यह होती है कि प्रसाद को सिर्फ साल पत्ते के दोना पत्तल में ही खाते हैं और घर के अंदर के प्रसाद को सिर्फ अंदर में ही, महिलाओं द्वारा खाया जाता है।


श्रीमती कदम कुंवर ग्राम पंचायत कोड़गार जिला कोरबा की एक आदिवासी महिला हैं इनका कहना है कि जेष्ठ महीना समाप्त होने के बाद में आषाढ़ महीना आ जाता है और बारिश शुरू हो जाती है। जिससे सभी आदिवासी किसान खेती करने में व्यस्त हो जाते हैं। नए फसल प्राप्त करने के लिए खेतों की जुताई एवं रोपा लगाना शुरू करते हैं। यह त्यौहार इसी कामना के साथ मनाते हैं कि हर साल की तरह इस साल भी अधिक से अधिक धान की फसल हों । इस त्यौहार को मनाने का एक विशेष धारणा यह भी है कि, जब तक इस त्यौहार को मनाएंगे नहीं तब तक नए फसल के एक भी बीज को मुंह में नहीं लेते हैं। अर्थात, जब तक यह त्यौहार नहीं मनाएंगे तब तक नए फसल को उपयोग नहीं करते है। यह त्यौहार हर साल जेष्ठ महीने में ही मनाते हैं।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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