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दुःख और कष्टों से मुक्ति के लिए मनाते है उड़ीसा के भुंजिया आदिवासी गढ़ जात्रा

उड़ीसा राज्य के ग्राम साल्हेपारा में भुंजिया जाति के लोग रहते हैं। इस जाति के मांझी गोत्र के लोग गढ़ जात्रा निकालते हैं। भव्य रुप से मनाया जाने वाला यह पर्व मनोकामना पूर्ती के लिए एक सामूहिक धार्मिक पूजन है। यह दीपावली के 15 दिन बाद आयोजित किया जाता है। इसमें देवी-देवता को ठाकुर-ठकुराइन के रूप में पूजा जाता है। ऐसी मान्यता है कि देवी देवता की शरण में जाने से हर दुःख और कष्टों से मुक्ति मिलती है और सभी कामनाएं पूर्ण होती है। मन्नत के अनुसार कामना पूर्ती के बाद भक्तों को देवी-देवता की पूजा का संकल्प पूरा करना होता है। अगर कोई औरत और उसका पति संतान-प्राप्ति की प्रार्थना करते है, और गढ़जात्रा में मन्नत मांगने के बाद उसे पुत्र या पुत्री को इस रत्न की प्राप्ति होती है, तब जिस दिन मन्नत मांगी गई हो, अगले साल उस ही दिन गढ़जात्रा के स्थान पर जाकर संकल्पित चढ़ावा, जैसे कि बकरा या जो भी क्षमतानुसार अर्पित किया जा सके, देवी-देवता को भेंट-स्वरुप चढ़ाया जाता है।

ठाकुर ठकुराइन देवी देवता का आसन (स्थान)


देवी देवताओं के द्वार में महिलाओं का देवी देवता के आसन तक जाना वर्जित है, इसलिए वे द्वार से ही दर्शन कर भेंट अर्पण कर पाती हैं। अन्यथा उनके पति भीतर जाकर भेंट चढ़ाकर आते पर ऐसा नहीं है कि स्त्रियों का मूर्ती-दर्शन भी वर्जित है। इसके लिए सल्हेपारा ग्राम की बस्तियों में मुखिया के घर के आंगन में महिलाओं और बच्चों को ठाकुर ठकुराइन के दर्शन करवाए जाते हैं। मुझे भी यह दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सल्हेपारा गाँव में ठाकुर-ठकुराइन की दैवीय शक्तियों की प्रशस्ति करती बहुत सी लोक कथाएं प्रचलित हैं।

गढ़जात्रा की पूजा होते देखते पुरुष


उनमें से एक कहानी जो कि सर्वाधिक प्रचलित है वो बताती है कि कैसे देवी-देवता ने अपहृत बच्चों की रक्षा की। एक बार साल्हेपारा गांव से लगभग-लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर गढ़जात्रा मनाई जा रही थी। लगभग सारे पुरुष पूजा के लिए अपने अपने घरों से दूर थे। घरों में केवल महिलाएं और बच्चे थे। इसी बात का ग़लत फ़ायदा उठाकर तीन – चार आदमियों (जिन्हें आदिवासी फूसाहा या ओरकीरा कहते हैं) ने वहां के चार बच्चों का अपहरण कर और उन्हें बोरी में बांधकर अपने घर के पिछवाड़े में रख दिया और किसी काम से बाहर चले गए।


उसी दौरान गाँव के एक महिला शौच करने के लिए अपने घर के पिछवाड़े में जब आई तो उसने कुछ दूरी पर बोरी में से बच्चे का हाथ निकला हुआ देखा। वह महिला घबरा गयी और तुरंत उसने ये बात गाँव की अन्य महिलाओं को बताई। सब महिलाएं सोचने लगीं कि अब क्या किया जाए। गाँव के सब पुरुष तो गढ़ जात्रा के लिए गए हुए थे। उन महिलाओं ने घर में ही ठाकुर- ठकुराइन से उन चार अपहृत बच्चों की रक्षा के लिए प्रार्थना की। कहते हैं ठाकुर-ठकुराईन ने तुरंत उन स्त्रियों की विनती स्वीकार की। जहाँ पुरुष गढ़जात्रा की पूजा भोजन कर रहे थे, वहां देवी-देवता की आकाशवाणी सुनाई दी। उन्होंने पुरुषों को जल्दी से वापिस जाकर उन चार बच्चों को बचाने का आदेश दिया।पुरुषजन भागते हुए वापिस आए। उन्होंने अपहरणकर्ताओं को धर दबोचा और बच्चों को बचाया।

ठाकुर ठकुराइन देवी देवता के लिए प्रसाद


ऐसी कई सारी मान्यताओं के चलते अफ़सर और नेता जैसे बड़े लोग भी गढ़जात्रा के दिन यहाँ आकर मन्नत मांगते है। पूरी हो जाने पर वे भेड़, बकरी, मुर्गी, नारियल, आदि चढ़ाते हैं। इस तरह कई वर्षों से यह आदिवासी परंपरा जारी है।



लेखक के बारे में – खाम सिंह मांझी छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। उन्होंने नर्सिंग की पढ़ाई की है और वह अभी अपने गाँव में काम करते हैं। वह आगे जाकर समाज सेवा करना चाहते हैं।


यह लेख पहली बार यूथ की आवाज़ पर प्रकाशित हुआ था

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