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क्या आदिवासियों में भी कभी सती की घटना हुई है? जानिए छत्तीसगढ़ के गाँव के नाम के पीछे की कहानी


जलके गाँव का प्रवेश द्वार

भारत के आदिवासी समुदायों में महिलाओं को कई ऐसे अधिकार प्राप्त हैं जो अन्य समाज की महिलाओं को नहीं हैं। आदिवासी महिलाओं को अपना साथी स्वयं चुनने का अधिकार है। कई आदिवासी समुदायों में उन्हें जमीन का मालिकाना हक भी मिलता है। लेकिन कई साल पहले एक ऐसी घटना हुई जो आदिवासियों के लिए बेहद असामान्य बात थी। छत्तीसगढ़ के एक गाँव में एक मुखिया थे। उनका नाम था कोराम ठाकुर। वे एक दिन बीमार पड़े और अचानक उनकी मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी इस घटना से इतनी दुखी हुई कि उन्होंने अपने मृत पति की चिता पर अपनी ज़िंदगी खत्म करने का फैसला कर लिया। जब कोराम ठाकुर का अंतिम संस्कार किया जा रहा था तो उनकी पत्नी जलती हुए चिता पर बैठ गयी और सती हो गई। उसी दिन से उस गाँव को जलके गाँव कहा जाने लगा। यह गाँव कोरबा जिला में स्थित है।


गाँव के नाम के पीछे की कहानी हमें गाॅव के बुजूर्ग श्यामलाल टेकाम, रनसाय राज, और गनिराम मरकाम ने बताया। उनका कहना है की आदिवासी समाजों में, यह सती का पहला और एकमात्र मामला दर्ज किया गया था।

लेकिन ऐसी स्थिति है कि जहाँ गाँव के बुजुर्गों को मुखिया का नाम याद है, वहीँ किसी को उस महिला का नाम याद नहीं है जिसकी मृत्यु ने गाँव को उसका नाम दिया। एक नदी है जो गाँव के पास बहती है। नदी पर एक स्थान है जहाँ कहा जाता है कि महिला ने अपनी काजल और बिंदी को हटा दिया था, उस स्थान को आज भी कजरकुंडी कहा जाता है।

यही वह स्थान है जहाँ कोरम ठाकुर की पत्नी अपने पति के जलती हुए चिता पर बैठ कर सती हो गई

सती प्रथा की ये कहानी जलके गाँव के आदिवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस गाँव में कोराम ठाकुर और उनकी पत्नी के लिए मंदिर का निर्माण किया गया था। इस जगह को स्थानीय भाषा में चौरा कहते हैं। गांववाले साल में एक बार स्थान पर पूजा करते हैं। उनका मानना ​​है कि स्थान पर प्रार्थना करने से वे किसी भी आपदा से सुरक्षित रहते हैं।


गाॅव में पहली पूजा इस मंदिर में की जाती है और किसी भी काम की शुरुआत करने से पहले यहाँ दीपक जलाया जाता है । क्योंकि आदिवासियों के घर मिटटी के बनाये जाते हैं तो हर साल गांववाले मंदिर का भी मिटटी का लिपाई करते हैं।

यह आदिवासियों के लिए एक और पवित्र स्थल है। इसे मतीन दाई कहा जाता है

जिस जगह पर कोराम ठाकुर का अंतिम संस्कार किया गया, उस जगह को लोग अक्सर सती दाई के नाम से जानते हैं। सती दाई को भी हर साल मिटटी से लिपाई किया जाता है। लिपाई खत्म कर लेने पर महिलाएं एक दूसरे को हाथ जोड़ कर जोहार बोलते हुए वहां से निकलती है। सती दाई की लिपाई के बाद अगर मिटटी बच जाता है तो सभी महिलाएं थोड़ा थोड़ा मिटटी अपने घरों को लेजाती हैं ।


सती दाई के अलावा, जलके गांव में मतीन दाई भी है। यह दोनों स्थान ग्रामीणों के लिए पवित्र हैं, जो मानते हैं कि ये दो देवियाँ उनकी देखभाल करती हैं और उनको सुरक्षित रखती हैं। छत्तीसगढ़ के कई गाँवों के नाम के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। आपके गाँव के नाम के पीछे की कहानी क्या है? हमें कमैंट्स में बताएं।


यह आलेख आदिवासी आवाज़ प्रोजेक्ट के अंतर्गत मिजेरियोर और प्रयोग समाज सेवी संस्था के सहयोग से तैयार किया गया है।

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