top of page
Adivasi lives matter logo

विश्व आदिवासी दिवस का इतिहास


पूरे विश्व में लगभग 37 करोड़ आदिवासी हैं। 13 सितम्बर 2007 को विश्व भर के आदिवासियों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन था। इसी दिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने, आदिवासियों के अधिकार का संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र (यूएनड्रिप) को अंगीकृत किया था। घोषणा पत्र के शुरुआत में ही कहा गया है कि आदिवासी समुदाय को अन्य समुदायों की भाँति ही बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। आदिवासी समाज में विविधता है और वे एक विशिष्ट भाषा एवं संस्कृति को मानने वाले समाज हैं। इस विविधता का सम्मान होना चाहिए। आदिवासी समुदाय को उनकी विशिष्ट संस्कृति और जीवन शैली के आधार पर कोई भी राष्ट्र उनसे भेदभाव नहीं कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस तथ्य पर भी चिंता जतायी कि बाहरी समुदाय के द्वारा आदिवासी समुदाय के जल जंगल और ज़मीन के दोहन का एक ऐतिहासिक क्रम रहा है और फलस्वरूप आदिवासी समुदाय ने निरंतर दर्द और अन्याय ही झेला है।


संयुक्त राष्ट्र संघ के एक विशेष पदाधिकारी ज़ोस आर मार्टिनेज़ कोबो को विश्व के सभी आदिवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, जातीय भेदभाव और आर्थिक परिस्थिति के विषय में एक विस्तृति अध्ययन और उस पर आधारित एक प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का कार्यभार मिला।तत्पश्चात उन्होंने एक विस्तृत रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्तुत किया जिसमें आदिवासियों के घोर शोषण का ज़िक्र था। पूरे विश्व में आदिवासियों के जल जंगल और ज़मीन के शोषण और संघर्ष की गाथाएँ एक समान थीं। इसी प्रतिवेदन के आधार पर 9 अगस्त 1982 को प्रथम बार संयुक्त राष्ट्र संघ के एकनॉमिक एंड सोशल काउन्सिल (ईकोसोक) ने आदिवासियों से संबंधित एक कार्यकारी समूह का गठन किया जिसे ‘वर्किंग ग्रूप ऑन इंडिजेनस पॉप्युलेशन’ कहा गया।


1994 में संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा गठित आदिवासियों से संबंधित कार्यकारी समूह ने इसी 9 अगस्त को सर्वसम्मति से प्रत्येक वर्ष ‘विश्व के आदिवासियों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस’, के रूप में मनाए जाने का प्रस्ताव पारित किया। तब से यह चलन में है और पूरे विश्व में हर वर्ष 9 अगस्त को आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इस वर्ष का घोषित थीम (फोटो साभार: Rabindra Gilua)

1994 में संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा गठित आदिवासियों से संबंधित कार्यकारी समूह ने आदिवासियों के अधिकार के घोषणा पत्र का एक प्रारंभिक ड्राफ़्ट, ‘अल्पसंख्यकों के भेदभाव और संरक्षण पर रोकथाम के लिए गठित उप-आयोग’, को प्रस्तुत किया था। समीक्षा के बाद इसे अनुमोदित कर दिया गया। इसके पश्चात, इसे संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के पास विचार के लिए भेजा गया, जिसे आगे की चर्चा के लिए एकनॉमिक एंड सोशल काउन्सिल (एकोसोक) और संयुक्त राष्ट्र संघ के आम सभा में प्रस्तुत किया गया।


जैसा कि अपेक्षित था, अनेक राष्ट्र तुरंत विरोध में खड़े हो गए। मूल रूप से इसकी दो वजह थीं। पहला, इस प्रारंभिक प्रारूप में आदिवासी समुदाय के लिए स्वशासन या आत्मनिर्णय के प्रावधान का ज़िक्र था, जिसके अंतर्गत आदिवासी समुदाय को अपने क्षेत्र में अपने पारंपरिक शासन व्यवस्था को लागू करने और आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त होता। दूसरा, इस प्रारूप में एक महत्वपूर्ण माँग यह थी कि आदिवासी भूमि पर जल जंगल और ज़मीन पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासियों का प्रथम अधिकार होगा ना कि किसी राष्ट्र का।यह दोनो प्रावधान अनेक सरकारों को स्तब्ध करने के लिए काफ़ी था। कालक्रम देखें तो पाते हैं की इस ‘प्रारंभिक प्रारूप’ को यहाँ तक पहुँचने में ही 12 वर्ष लग गए। पर ये तो मात्र अभी संघर्ष की शुरुआत थी।


1994 के प्रारंभिक ड्राफ़्ट के बहुराष्ट्रीय विरोध को संतुलित करने के लिए 1995 में एक ‘ओपन एनडेड इंटर शेशनल वर्किंग ग्रूप’, का गठन किया गया। उसी दरमियान, संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1995-2004 को विश्व आदिवासी दशक घोषित कर दिया। ‘ओपन एनडेड इंटर शेशनल वर्किंग ग्रूप’ को यह उम्मीद थी कि शायद इसी विश्व आदिवासी दशक के दौरान ही आदिवासियों के अधिकार के घोषणा पत्र पारित कर दिया जाएगा। किंतु ऐसा हुआ नहीं। संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग ने पुनः आदिवासी दशक (द्वितीय) को दस वर्षों के लिय 2005-2015 तक बढ़ा दिया।


2006 में संयुक्त राष्ट्र संघ के आंतरिक ढाँचे में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए और इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र संघ का मानवाधिकार आयोग परिवर्तित होकर संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार परिषद बन गया। और 2006 में ही 29 जून को संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार परिषद ने संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र को विभिन्न राष्ट्रों के समक्ष प्रस्तुत करने की लिए अनुमोदित कर दिया।


अंततः 13 सितम्बर 2007 को, लगभग 25 वर्षों के अथक परिश्रम और सतत संघर्ष के पश्चात आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंगीकृत कर लिया। कुल 144 राष्ट्रों ने इसके समर्थन में वोटिंग की, 11 देश तटस्थ रहे और कुछ विकसित राष्ट्रों ने इसका विरोध किया। जो 11 देश तटस्थ रहें वो थे बंग्लादेश, भूटान, रूसी संघ, जॉर्जिया, केन्या, नाइजीरिया, कोलम्बिया, बुरुंडी, समोआ, अजेरबैजान और उकरेंन। अनेक विकसित राष्ट्र जैसे कि अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेल्या ने शुरुआत में विरोध किया और वहीं यूकरैन, प्रशांत महासागर के उपद्वीप देश, अनेक एशियाई देशों ने उदासीन रवैया अपनाये रखा।


कनाडा में वहाँ के आदिवासियों को ‘प्रथम नागरिक’ या ‘फ़र्स्ट नेशन’ का दर्जा प्राप्त है। शुरूआत में कनाडा ने संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र का विरोध किया था। उनका मानना था कि संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र कनाडा के संविधान के अनुकूल नहीं था और विशेष रूप से कनाडा के संविधान के अनुच्छेद 35 के ठीक विपरीत था। ‘असेम्ब्ली ओफ़ फ़र्स्ट नेशन’, ने जब संगठित होकर इसके लिए दबाव बनाया तब उनको उत्तर देते हुए तब की कनाडा की सरकार ने कहा कि मात्र कुछ आदिवासियों के हित के रक्षा के लिए हम अन्य सामान्य नागरिकों के साथ असंतुलित व्यवहार नहीं कर सकते हैं। ‘असेम्ब्ली ओफ़ फ़र्स्ट नेशन’ का संगठित प्रयास होता रहा और अंततः 12 नवंबर 2010 को कनाडा सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र को अंगीकृत कर लिया।


ऑस्ट्रेलिया में भी इसी प्रकार का घटनाक्रम चला। और 3 अप्रैल 2009 को ‘रुड्ड सरकार’ ने आदिवासियों के संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र को अंगीकृत कर लिया जिसके लिए उनके संविधान में विशेष बदलाव भी करना पड़ा। तत्पश्चात्, ऑस्ट्रेलिया के अनेक सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत पारम्परिक उद्घोषणा के साथ होती है जिसमें वो उस भूमि के पारंपरिक स्वामी, वहाँ के आदिवासियों का आभार व्यक्त करते हैं। वे उन सभी अतीत के आदिवासी पुरखों, वर्तमान आदिवासी समुदाय और आने वाली इस पवित्र भूमि की पीढ़ी का भी आभार और सम्मान व्यक्त करते हैं।


न्यूजीलैंड सरकार ने ‘माओरी' आदिवासियों के दबाव में 19 अप्रैल 2010 को संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र को अंगीकृत कर लिया था। उत्तरी अमेरिका ने भी 16 दिसम्बर 2010 को राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र को अंगीकृत कर लिया।


विकसित देशों से जो सफल उदाहरण हमें देखने को मिले हैं उनका यहाँ एक विशेष संदर्भ है। उन देशों में मानवाधिकार के प्रति लोग जागरूक हैं। उन सबमें सामूहिकता है। शिक्षित जन, समाजिक बदलाव को सकारात्मक ढंग से देखते हैं। अप्रैल 2009 में आयोजित डरबन रिव्यू कॉन्फ़्रेन्स में तब तक कुल 182 देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के अधिकार के लिए घोषणा पत्र को अंगीकृत कर लिया था।


इतनी चर्चा के पश्चात अब हम धरातल की सच्चाई से भी अवगत हो लें। संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के लिए घोषणा पत्र क़ानूनी रूप से किसी राष्ट्र को बाध्य नहीं कर सकता है। यह एक बहुत बड़ी विडम्बना है। यहाँ संयुक्त राष्ट्र एक दंत हीन और विष रहित सर्प के जैसा प्रतीत होता है, जो डरा तो सकता है किंतु हानि नहीं पहुँचा सकता।


भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ का आदिवासियों के लिए घोषणा पत्र के समर्थन में वोट किया था किंतु भारत का हमेशा से कहना है की उनके देश में सभी नागरिक मूलवासी हैं। भारत यह भी मानता है कि उन्होंने पहले ही इस प्रकार के अधिकार यहाँ के आदिवासियों को दे रखा है। भारत के पक्ष को समझने के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन के 2 महत्वपूर्ण कन्वेन्शन को जानना निहायत आवश्यक है। अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन के कन्वेन्शन संख्या 107 जो वर्ष 1957 में आयी थी और कन्वेन्शन संख्या 169 जो वर्ष 1989 में आयी थी।


अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आइएलओ) कन्वेन्शन 107 में जनजाति शब्द का ज़िक्र है।भारत ने इस कन्वेन्शन को अंगीकृत किया था क्योंकि भारत ने अनुसूचित जनजाति को संवैधानिक अधिकार और मान्यता पहले से ही दिया हुआ था। इस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आइएलओ) कन्वेन्शन 107 के अनुसार भारत को किसी भी प्रकार के अतिरिक्त अधिकार आदिवासी समुदाय को देने की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए भारत ने इस कन्वेन्शन को बिना हिचक के अंगीकृत कर लिया था।


वहीं जब अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आइएलओ) कन्वेन्शन 169, वर्ष 1989 में आयीं तो उसमें देशज और आदिवासी समुदाय के अधिकारों में ऐसे अनेक प्रावधान और अधिकारों का ज़िक्र था जो सरकार को असहज स्तिथि में डाल देतीं। आदिवासी समुदाय को आत्मनिर्णय और स्वशासन का अधिकार, भूमि वन और जल संसाधनों पर एकाधिकार, रूढ़िवादी सांस्कृतिक एवं धार्मिक, शिक्षा और पूर्व सूचना एवं दवाब मुक्त सहमति जैसे अनेक प्रकार के अधिकार देने की बात करता है। पूर्व सूचना एवं दवाब मुक्त सहमति ऐसा अधिकार था जिस से सरकार को भारी आर्थिक नुक़सान हो सकती थी क्योंकि बिना आदिवासियों के सहमति के संसाधनों का दोहन संभव नहीं था। और हम जानते हैं कि अनेक प्राकृतिक संसाधन आदिवासी समुदाय के संरक्षण में उनके क्षेत्रों में बची हुई है और शायद उनके दोहन के बिना राष्ट्र निर्माण संभव नहीं है।


इस पर भी बहुत बहस हुई थी कि देशज आदिवासी किसे मानेंगे और उसकी क्या परिभाषा होगी। ज़ोस आर मार्टिनेज़ कोबो ने देशज आदिवासी शब्द को परिभाषित किया है। सरल रूप में, देशज आदिवासी समाज हम उन्हें कहेंगे जो किसी एक निवास स्थान में आदिकाल से निवास करते आए हैं। उनके पूर्वजों ने उनके निवास स्थान को सर्वप्रथम प्राकृतिक रूप से बदलकर द्वितीयक वातावरण में परिवर्तित किया। इसमें निवास और खेती के लिए भूमि निर्माण शामिल था। यह क्षेत्र पारंपरिक और ऐतिहासिक रूप से आदिवासी देशज समाज की धरोहर मानी जाती है। प्रायः यह क्षेत्र किसी भी प्रकार के बाहरी आक्रमण या औपनिवेशिक शक्ति के आगमन के पहले से स्थापित समाज हैं। ऐसे समाज की विशिष्ट भाषा, विशिष्ट संस्कृति और विशिष्ट जातीय पहचान होती है जो मुख्य धारा की समाज से भिन्न होती है। ऐसे विशेषताओं वाले समाज को ही हम देशज आदिवासी समाज कहेंगे। जैविक विविधता के कन्वेन्शन के अनुच्छेद संख्या 8 (ज) में भी आदिवासी समाज को इसी तरह परिभाषित किया गया है।


लेखक परिचय :- डॉ अभय सागर मिंज वर्तमान में 14 साल के शिक्षण अनुभव के साथ डीएसपीएम विश्वविद्यालय (पूर्व में रांची कॉलेज रांची) के मानवशास्त्र विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा रांची से प्राप्त की एवं दिल्ली विश्वविद्यालय से मानवशास्त्र में एम.एस.सी किया। उन्होंने राँची विश्वविद्यालय राँची से झारखंड से आदिवासी पलायन पर अपनी मानद उपाधि अर्जित की है। उनके प्रमुख कार्य क्षेत्रों में आदिवासी अधिकार, संस्कृति और स्वदेशी भाषा संरक्षण संवर्धन शामिल है। वर्तमान में वह डीएसपीएम विश्वविद्यालय में स्थित लुप्तप्राय देशज भाषाओं और संस्कृतियों के अंतर्राष्ट्रीय प्रलेखन केंद्र के निदेशक हैं। वह ICCA कंसोर्टियम, जिनेवा में मानद सदस्य के साथ-साथ YFEED नेपाल में अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ सलाहकार और फिलीपींस के AYIPN में भी सलाहकार हैं। वह WUJA संगठन, लक्ज़मबर्ग में यंग एलुमनी भी हैं।

6 Comments


dwainnervi55
2 days ago

Khi quan sát sự phát triển của các nền tảng giải trí trực tuyến, new88 tạo cho mình ấn tượng về cách kết hợp nhiều loại hình trò chơi trên một giao diện thống nhất. Các danh mục như casino trực tuyến, slot game, bắn cá H5, nổ hũ và game bài được tổ chức khoa học giúp người dùng dễ dàng tiếp cận. Mình nhận thấy giao diện có sự cân bằng trong việc hiển thị thông tin, vừa cung cấp nhiều lựa chọn nhưng vẫn giữ được sự rõ ràng. Khi sử dụng trong thời gian dài, tốc độ tải duy trì khá đều, thao tác điều hướng mượt và trải nghiệm tổng thể khá ổn định

Edited
Like

Khi theo dõi khả năng hiển thị nội dung trên màn hình nhỏ, tôi thấy 33win vẫn giữ được cách phân chia khá dễ hiểu. Các nhóm casino, thể thao, slot và xổ số được thu gọn theo khu vực phù hợp, giúp người dùng không phải cuộn quá nhiều để nhận biết những lựa chọn chính. Những thành phần tương tác có mức độ nhận diện tương đối tốt, hỗ trợ thao tác chạm trong quá trình truy cập bằng điện thoại. Khi chuyển sang nội dung khác, tốc độ phản hồi duy trì khá ổn định và không gây cảm giác đứt quãng. Cách xử lý này giúp trải nghiệm di động trở nên thuận tiện hơn, nhất là…

Like

dwainnervi55
6 days ago

Khi xem trang chủ 78win ở góc độ màu sắc, mình thấy tông xanh - trắng tạo cảm giác khá dễ chịu cho một trang có nhiều nội dung giải trí. Casino, bắn cá và đá gà đều có thể tạo nhiều hình ảnh mạnh, nên nền màu dịu giúp tổng thể cân bằng hơn. Mình thử đá gà qua góc quay đa chiều và lựa chọn thắng - thua để cảm nhận phần trực tiếp. Khu này cần hình ảnh rõ nhưng không nên làm người dùng bị choáng bởi hiệu ứng. Ngoài ra, tốc độ xử lý nhanh giúp việc chuyển giữa các khu mượt hơn. Cá nhân mình thích giao diện có màu chủ đạo ổn định vì…


Like

dwainnervi55
6 days ago

เมื่อผมสำรวจ F168 บนหน้าจอมือถือ สิ่งที่อยากดูเป็นพิเศษคือเมนูหลักยังใช้งานสะดวกหรือไม่ ผมลองสลับจากคาสิโนสดไปกีฬา แล้วเปิดหน้าบัญชีต่อเพื่อดูว่าการแตะและการเลื่อนมีความลื่นแค่ไหน โดยรวมแล้วปุ่มสำคัญยังเข้าถึงได้ง่าย และข้อมูลไม่ได้แน่นจนทำให้รู้สึกอึดอัด การเปลี่ยนหมวดบนหน้าจอเล็กยังคงทำได้ค่อนข้างดี สำหรับผม การรองรับมือถือไม่ใช่แค่ย่อหน้าเว็บให้เล็กลง แต่ต้องทำให้ผู้ใช้ยังจับทิศทางของระบบได้เหมือนเดิม


Like

dwainnervi55
7 days ago

Ở góc nhìn sử dụng thường ngày, RR88 cho mình cảm giác phù hợp với người thích đổi nhịp trong cùng một lần truy cập. Có thể bắt đầu bằng game bài, chuyển sang bắn cá rồi xem thêm nổ hũ mà không thấy các khu quá rời nhau. Mình thử quan sát game bài qua Tài xỉu và Xóc đĩa, vì đây là những lựa chọn dễ tạo cảm giác quen thuộc với người dùng Việt. Các chuyên mục còn lại giúp phiên trải nghiệm có thêm màu sắc khác. Sau đó mình xem thêm về app trên nhiều thiết bị. Cá nhân mình nghĩ sự tiện dụng nằm ở việc người dùng có thể thay đổi nhu cầu mà…


Like
bottom of page