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जानें अदरक की खेती कैसे करते हैं एवं उसके महत्त्व के बारे में

पंकज बांकिरा द्वारा सम्पादित


अदरक एक ऐसा जड़ी-बूटी है, जिसका उपयोग खाने के लिए और दवा के रूप में किया जाता है। अदरक की खेती जून माह में की जाती है। अदरक का पौधा देखने में बहुत सुंदर और हरा-भरा दिखता है। और इसकी खेती, बागान या खेतों में कहीं भी की जा सकती है। इसके जड़ से बीज निकलते हैं, जो बोए जाते हैं। इन्हीं जड़ो को मिट्टी में बोने से पहले, खेत या बागानों को लकड़ी और बांस से घेरा जाता है। ताकि, कोई भी व्यक्ति या जानवर, इसे नुकसान नहीं पहुँचा सके। अदरक एक बहुत गुणकारी और फायदेमंद औषधि के रूप में भी जाना जाता है।

खेत की अच्छी तरह जोताई करने के बाद, खेत को अच्छे से साफ किया जाता है। फिर मिटटी को, रांपा की सहायता से, पार बनाया जाता है। उसके तैयार होने के बाद, अदरक के पतले-पतले जड़ को एक-एक कर लगाया जाता है। यह कार्य मई-जून में प्रारंभ कर देते हैं। अदरक का फसल कम पानी में होता है। चार महीने बाद अदरक का फसल तैयार हो जाता है। आमतौर पर एक पौधे के जड़ से, एक से आधा किलो अदरक प्राप्त हो जाता है।

अदरक का पौधा

जैसा कि हमें पता है कि, अदरक का उपयोग चाय में डालकर भी किया जाता है। जोकि, सर्दी-खांसी के लिए दवा के रूप में काम आता है। अदरक को गुड़ के साथ सोंट, काली-मिर्च, लॉन्ग और इलायची को पिसकर अच्छे से मिला लेते हैं और इसे संभाल कर रखे रहते हैं। और नयी-नयी माँ बनी महिलाओं को, एक महीने, सुबह-शाम खाली पेट खाने के लिए देते हैं। अदरक को सुखाकर, उसको पीसकर, गुड़ के साथ लड्डू में मिलाकर भी नयी मांओं को खिलाते हैं, ऐसा दो-तीन महीनों तक करते हैं। इसको खाने से कोई हानि नहीं होता है। बल्कि, मां-बच्चे दोनों को स्वस्थ और मजबूत रखता है। इसके सेवन से सर्दी-खांसी नहीं पकड़ता है।


अदरक की खेती इतनी आसानी से होती है कि, किसान लोग बहुत खुश रहते हैं। इसमें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती, इसे गाय-भैंस नहीं खाते हैं। क्योंकि, इसका फल जड़ में रहता है, इसका जड़ ही असली काम का होता है। इसके पत्ते किसी काम के नहीं आते, और पत्तों के सूख जाने के बाद, कुदाली की मदद से अदरक को निकाला जाता है। फिर, अदरक को साफ पानी से धोकर धूप में सुखाया जाता है, और इसे दो-चार दिनों तक धूप में रखा जाता है।


अदरक की खेती बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। इससे किसानों को बहुत ही लाभप्रद और फायदा भी होता है। इसका लाभ, दवाई के रूप में एवं आर्थिक पूंजी के रूप में प्राप्त किया जाता है। अदरक की खेती हो जाने के बाद, उसको निकाल कर बेचते हैं, और कुछ को बचा कर रखते हैं। ताकि, साल-दर-साल उसी का बीज हमेशा लगाते रहें। इससे घर में प्रयोग करने के लिए, उनको खरीदना नहीं पड़ता।

धुप में सूखे अदरक

अदरक को शोंट के नाम से भी जाना जाता है। जिसका उपयोग, छेवर्या महिलाओं के लिए, किया जाता है। उसे दवाई के रूप में, दो-तीन महीने तक दिया जाता है और जरूरत पड़ने पर पांच महीने तक इसका सेवन कर सकते हैं। ताकि, माँ और बच्चा स्वस्थ रहे। इससे सर्दी-खांसी नहीं होती है और रक्त भी साफ़ रहता है। जब नसों में गड़बड़ी होती है, तो रक्त नहीं दौड़ता है। इसलिए, लोग अदरक खाते रहते हैं। ताकि, इस समस्या से बचा जा सके। इसके सेवन से शरीर में रक्त का बहाव बढियाँ रहता है। अदरक का उपयोग, सब्जी में भी किया जाता है। और इसे कई प्रकार की सब्जियों में, पीस कर डाला जाता है। इससे सब्जी का स्वाद और भी अधिक बढ़ता है, साथ ही हमारे शरीर को फायदा भी मिलता है।


अदरक को पानी से धोकर, उबाला जाता है और शोंट बनाया जाता है। अदरक को धूप में सूखाने के बाद पतला-पतला घिसा जाता है।उसके बाद, उसको दोबारा धूप में सुखा दिया जाता है। फिर अच्छी तरह सूखने के बाद, उसको कूटकर, घर में रख दिया जाता है। ताकि, यह खराब ना हो। और अदरक का उपयोग, हमेशा करते रहें, इसको हमेशा चाय के साथ एवम सब्जी के साथ सेवन किया जाता है। कच्चा अदरक को, पतला-पतला काट कर, गरम तवा में तेल से अच्छे से सिकाई करने के बाद भी, इस को अच्छे से चबा-चबा कर खाया जाता है। और इसको लगातार खाने से खांसी ठीक हो जाता है। हमारे गोंड जनजाति के लोग अदरक को औषधि के रूप में मानते हैं। चूँकि, यह सुखा हो या कच्चा हो, दोनों ही दवाई के रूप में काम आता है।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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