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जानें गर्मियों में, कैसे गन्ने की फसल बर्बाद होती है?

पंकज बांकिरा द्वारा सम्पादित


गन्ने का मुख्य उपयोग, शक्कर और गुड़ बनाने में किया जाता है एवं गन्ने के फसल का वेस्ट पदार्थ, खाद के रूप में खेतों में उपयोग किया जाता है। और गन्ने से निकला हुआ ‘मरी’ का उपयोग, शराब बनाने में किया जाता है। गन्ने की फसल का उत्पादन, शुगर फैक्ट्री बनने के वजह से उत्पादन में तेजी आई है। जिससे शुगर फैक्ट्री के आस-पास के क्षेत्रों के, सभी किसान बाकी फसलों को छोड़ कर, गन्ना की खेती करने में लगे हैं। कबीरधाम जिला में, दो ‘शुगर फैक्ट्री’ लगने से गन्ने की फसल में अत्यधिक वृद्धि हुई है। क्योंकि, गन्ने की फसल बाकी फसलों से ज्यादा मुनाफा देती है और मौसम के परिवर्तन होने पर भी फसल को अधिक नुकसान नहीं होता है।

जलता हुआ गन्ने का खेत

कबीरधाम जिला में गन्ने की फसल में आग लगने की शिकायत, गर्मी के दिनो में मिलते ही रहता है। क्योंकि, हर गन्ने का खेत हर दूसरे गन्ने के खेत से सटा रहता है और जब गन्ने के किसी सुखे पत्ते पर आग लगती है, तो चारों ओर आग की लपटें पकड़ लेती हैं। गन्ने के सूखे पत्ते, कचरे के ढेर के सामान खेतों में बिखरी रहती हैं, जिस कारण से गन्ने की फसल में आग बहुत जल्दी फैलती है। गन्ने की फसल में आग लगने का मुख्य कारण, बिजली का तार है। क्योंकि, गर्मी के दिनों में हवा बहूत तेज गति से चलती है और बिजली के तार इतने ढीले रहते हैं कि, एक दूसरे तार से चिपक कर स्पार्क करते हैं और आग उत्पन्न हो जाता है। जिस कारण, बिजली के तार के नीचे मौजूद गन्ने के फसल में आग लग जाती है। उप्पर तस्वीर में आप देख सकते हैं कि, गन्ने का खेत जलता हुआ दिखाई दे रहा है। जिस से जुड़े हुए 3 एकड़ का प्लाट आग लगने से पूरा बर्बाद हो गया।

आग बुझाती फायर बिग्रेड का टीम

जलते हुए गन्ने को बचाने के लिए, आसपास के लोग फायर ब्रिगेड वालों को बुलाते हैं। लेकिन, फायर ब्रिगेड वालों के आने तक, आग कंट्रोल होने लायक नहीं रहता। क्योंकि, आग बहुत ही तेजी से फैलता है, जिस कारण से पूरे गन्ने खेत को बचाना मुश्किल हो जाता है। और पूरा प्लाट आग की चपेट में नष्ट हो जाता है। उप्पर तस्वीर में आप देख सकते हैं कि, फायर ब्रिगेड की टीम आग को बुझाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, उनसे केवल रास्ते से सटे हुए गन्ने के खेत ही जलने से बच पाते हैं। चूँकि, फायर ब्रिगेड की गाड़ी खेतों के अंदर नहीं घुस सकता। इस कारण से पास के ही गन्ने के खेत आग से बच पाते हैं। क्योंकि, जब तक उस खेत में गाड़ी ले जाने के लिए रास्ता नहीं बनेगा, तब तक उस खेत का फसल काटा नहीं जा सकेगा और काटा भी गया तो जला हुआ गन्ना काटने से ज्यादा दिन तक ताजा नहीं रह पाता है। और तेजी से सूखने लगता है, जले हुए गन्ने को ‘शुगर फैक्ट्री’ ताजा गन्ने की तुलना में कुछ परसेंट काटकर खरीदता है। जिससे किसान को ज्यादा मुनाफा नहीं हो पाता है और मजदूरों को देने लायक ही पैसा मिलता है।


कबीरधाम जिला के ग्राम हरिनछपरा के निवासी, रामजी साहू का 3 एकड़ का गन्ने का खेत, आग लगने से पूरा जल गया। और उन्हें काफी आर्थिक नुकसान हुआ है। इस घटना पर ग्राम हरिनछपरा के कैलाश का कहना है कि, “आग की चपेट में आने से लगभग हर साल 80 से 90 एकड़ खेत, तो यूं ही बर्बाद हो जाता है। क्योंकि, आग लगने से केवल एक खेत ही नहीं बल्कि आसपास के सभी खेतों में आग पहुंच जाता है और गन्ने के पत्ते इतने अधिक सूखे रहते हैं कि उनमें बहुत जल्दी आग लग जाता है। और यदि हवा तेज गति से चलने लग जाए, तो आधे से एक घंटे में 10 से 20 एकड़ खेत जल के राख हो जाता है।”


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।

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