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जानिये छत्तीसगढ़ के आदिवासी कैसे एक बेहतर प्रतिरक्षा प्रणाली बनाये रखते हैं

हर डॉक्टर और पोषण विशेषज्ञ आपको बताएंगे कि हरी सब्जियां खाना आपके स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है। आदिवासी लोग जो परंपरागत रूप से जंगलों के पास रहते हैं और जिन्हें पौधों का अच्छा ज्ञान है, वे हमेशा से इस तथ्य को जानते थे। लंबे समय से, आदिवासी नियमित रूप से हरी सब्जियों और उनके पास पाए जाने वाले भाजियों का सेवन करते रहे हैं। इन भाजियों में बहुत सारे औषधीय गुण होते हैं, जो लोगों में उनके रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाती हैं। ये भाजियां गांवों में आसानी से उपलब्ध हैं और लोग स्वस्थ रहने के लिए नियमित रूप से इनका सेवन करते हैं।हर घर की बाड़ी में भाजी का फसल बोया जाता है, और कुछ भाजी तो ऐसे होते हैं, जो बरसात के छीटें पड़ते ही बाड़ी में खुद-ब-खुद जमीन से निकल आते हैं।

कोरोना वायरस के समय में, यह महत्वपूर्ण है कि हम खुद को मजबूत रखने के लिए हर संभव प्रयास करें। भाजी का सेवन, ऐसा हे एक प्रयास है। भाजी शरीर के लिए इतना फायदेमंद समझा जाता है की छत्तीसगढ़ के कई जिलों में भाजी खाने के निर्देश दिए जा रहे हैं।


कहा जा रहा है की भाजी के सेवन से कोरोना जैसे रोगों से लड़ने के लिए हमें शक्ति मिलती है। छत्तीसगढ़ के कई जिलों में कलेक्टर द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के भाजियों का सेवन करने का और अधिक से अधिक खेती करने के निर्देश दिए जा रहा है। उनका मानना है कि इन औषधि भाजी का प्रयोग करने से लोगों का इम्यून सिस्टम मजबूत होगा और उनमें रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ेगी। भाजियों में अच्छी मात्रा में प्रोटीन, मिनरल्स, और फाइबर पाया जाता है।


गाँवों के बाड़ी में पाई जाने वाली कुछ अनोखी भाजियां हैं—केना भाजी, खपरैल भाजी, रोपा भाजी, चरोटा भाजी, मुनगा भाजी और कांदा भाजी। बहुत सारे भाजी ऐसे भी हैं जो जंगलों से पाई जाती है, जैसे कोईलार भाजी, ढाई भाजी, और फैंग भाजी। नदी और तालाबों में पाई जाने वाली भाजी हैं कर्मता और सुनसुनिया भाजी। यह सभी भाजियों में कई प्रकार के विटामिन और आयरन प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। शहरी क्षेत्रों में इन सभी भाजियों को खरीदना पड़ता है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इसे आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में इन सभी भाजियों को बड़े चाव से खाते हैं।

शकुंतला कहती हैं कि गर्भवती महिलाओं को बहुत सारे पोषण की आवश्यकता होती है जो इन भाजियों में पाई जा सकती हैं

महिलाओं के लिए भाजी खाना बहुत जरूरी है

श्रीमती शकुंतला निर्मलकर ग्राम बिंझरा की निवासी हैं, और वे एक मितानिन का कर्तव्य निभातीं हैं। उन्होंने कहा कि वे हर मोहल्ले में एक बैठक रखती हैं जिसमें शिशुवती, गर्भवती और बालिकाओं को उनके पोषण और आहार के बारे में सुझाव देते हैं, ताकि उनका शिशु और स्वयं स्वस्थ रह सकें। बालिकाओं को माहवारी के दौरान होने वाली संक्रमण से बचने के लिए सलाह देती हैं। विभिन्न प्रकार के पौष्टिक आहार के सेवन करने का सुझाव देती हैं। ग्रामीण क्षेत्र में अधिकतर मध्यम और गरीब परिवार के लोग निवास करते हैं जो कि महंगे फल और सब्जियों का सेवन नहीं कर सकते इसलिए जो ग्रामीण क्षेत्र में भाजी पाई जाती है, उनका सेवन करें।

गौतम कुमार का मानना है कि मुनगा भाजी हमेशा उपयोगी होती है

गांव के किसान नागरिक

श्री गौतम कुमार प्रजापति जी का कहना है, कि वह एक मध्यम परिवार से हैं, और किसान के बेटे हैं। उनका मानना है कि ग्रामीण क्षेत्र में अधिक से अधिक मुनगा भाजी के पेड़ होते हैं, जिसकी भाजी हमेशा उपयोगी होती है, वह सदाबहार पेड़ हैं। "मुनगा भाजी शहरी क्षेत्रों में बेचा जाता है, और लोगों द्वारा खरीदी जाती है। लेकिन हमारे ग्रामीण क्षेत्र में यह हर घर में पाई जाती है, इस मुनगा भाजी की खासियत यह है, कि इसमें सभी प्रकार के पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। सभी प्रकार के विटामिन, फाइबर, प्रोटीन, वसा कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है, इसलिए यह एक औषधि के रूप में भी प्रयोग किया जाता है, अतः हम हमारे घर में अधिक से अधिक भाजी का सेवन करते हैं। जितनी भी भाजी होती है, वह शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाती है।"

मुनगा भाजी की सब्जी बनाने की विधि

मुनगा भाजी, जिसको मोरिंगा भी कहा जाता है, की सब्जी बनाने के लिए हमें मुनगा भाजी की पत्तियों को इकट्ठा कर लेना होता है। फिर उसे छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है। अब एक कड़ाही में पानी और स्वाद अनुसार उसमें नमक डालकर भाजी को धोकर उस कड़ाही में डाला जाता है और कम से कम 5 मिनट तक उसे पकाया जाता है। पकाने के बाद में उसमें लहसुन और मिर्च का तड़का लगाकर खाया जाता है।


हमारे छत्तीसगढ़ में विभिन्न प्रकार के औषधीय भाजी पाई जाती है, जिसका प्रयोग करके हम अपने इम्यून सिस्टम को मजबूत कर सकते हैं और रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ा सकते हैं।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


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