top of page

आइये जानें, महिला समूह के द्वारा बनाये जा रहे, घनजीवामृत खाद के बारे में

पंकज बांकिरा द्वारा सम्पादित


वर्तमान समय में, छत्तीसगढ़ में अभी महिला समूह का ही बोल-बाला है। महिला समूह की महिलाएं, सभी तरह के खाद बना रही हैं। जो हमने इससे पहले कभी देखा ही नहीं और न ही कभी सूना था। यह महिलाएं ऐसे बहुत से खाद बना चुके हैं, जिसे आपने भी शायद नहीं देखा होगा।

महिला समूह

हमारे कोडगार क्षेत्र के समूह की महिलाएं, समूह में खाद बनाने का काम करती हैं। हमने गांव में ही रहने वाले एक समूह के महिला, जिनका नाम कौशल्या बाई है और जिनकी उम्र 33 वर्ष है। उन्होंने हमें बताएं कि, अभी गोबर से तरह-तरह के खाद बनाकर, उसे बिक्री कर, एक व्यवसाय का रूप दिए हैं। हर एक समूह में यहां अलग-अलग तरह के खाद का निर्माण कर रहे हैं। कहा जाए, तो हर प्रकार के खाद, सभी गौठान में बनाए जा चुके हैं। लेकिन, अभी जो महिला समूह की महिलाएं, जो खाद बना रही हैं। वह सभी खादों से अलग है, उसे देखने में ऐसा प्रतीत होता है, मानो गोबर के कंडे बना रहे हों। आप सभी जान रहे हैं कि, गोबर के कंडे कैसे दिखते हैं और उसे किस तरह से बनाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली जो महिलाएं होती हैं, वह गोबर कंडे बहुत ही अधिक मात्रा में बनाती हैं।

खाद बनाने के लिए गोबर इक्कठा करते हुए

आइए जानते हैं, घनजीवामृत कैसे बनाया जाता है?


घनजीवामृत बनाने के लिए, सर्वप्रथम 100 किलोग्राम गोबर लिया जाता है। फिर उसमें 2 किलोग्राम चने का बेसन और गुड़ लेते हैं, और उसे अच्छी तरह से मिलाया जाता है, फिर गोबर में डाला जाता है। इसमें जंगल तरफ मिलने वाली दीमक की मिट्टी को भी मिलाते हैं, उसके बाद हाथ के द्वारा सभी मिश्रण को, अच्छी तरह से फेटा जाता है। तैयार मिश्रण को, गोबर के छोटे-छोटे कंडे की तरह बनाया जाता है और धुप में सूखा लिया जाता है। इस तरह घनजीवामृत को तैयार करके, खेतो में जोताई के समय डाला जाता है। इस खाद से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है। घनाजिवामृत, मिटी को सूक्ष्मा पोषक तत्व प्रदान करती हैं। यह भूमि में उपस्थित सूक्ष्म जीवाणु को सक्रिय करता है।


इस प्रकार के खाद को बनाने के लिए, कितनी मात्रा में वस्तु लेना चाहिए, आइए जानें।


सबसे पहले घनाजिवामृत खाद बनाने के लिए पानी की आवश्यकता लगभग 200 लीटर होती है, गोमूत्र 10 लीटर, गोबर 10 किलोग्राम, गुड़ 2 किलोग्राम, चने के बेसन 2 किलो और दिमक वाली मिटी ½ किलोग्राम। फिर इन सभी चीजों का मिश्रण करके, खाद तैयार किया जाता है।


चलिए इसके बारे में हम थोड़ा विस्तार से बताते हैं। सबसे पहले इसे तैयार करने के लिए, हमें पानी की आवश्यकता होगी, उसके बाद गोमूत्र, गोबर, बेसन, गुड और मिट्टी को एक साथ मिलाकर, चार दिन तक ऐसे ही छोड़ देते हैं और हर रोज लकड़ी की सहायता से उस मिश्रण को हिलाते हैं। चौथे दिन के बाद यह मिश्रण तैयार हो जाता है। यह खाद, सभी फसलों को ताकत प्रदान करता है, साथ ही फसलों को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व प्रदान करता है। इस तरह हाथ से बनाए गए खाद को बिना किसी मिलावट के खेतों में छोड़ दिया जाता है।

गोबर कंडे के रूप में तैयार घनजीवामृत खाद

इस तरह से समूह की महिलाएं, बहुत सारे खाद का निर्माण करने में सक्षम हो रहे हैं। महिला समूह की महिलाएं, समूह में पदस्थ होकर। ऐसे बहुत से कार्य कर रहे हैं, जो किसानों के लिए अत्यधिक फायदेमंद साबित हो रहा है। क्योंकि, आप सभी जान रहे हैं कि, कुछ सालों से सभी किसान अपने फसलों के लिए 'केमिकल रुपी खाद व दवाइयों' का प्रयोग कर रहे थे। लेकिन, जबसे समूह की महिलाओं ने अपने हाथों से जैविक खाद बनाना शुरू किया, तब से किसानों को बहुत ही ज्यादा फायदा हुआ। किसानों का कहना है कि, पहले मिट्टी की उपजाऊ शक्ति धीरे-धीरे खत्म होती चली जा रही थी और फसल भी उतना अच्छा प्राप्त नहीं हो पा रहा था। लेकिन, जब से हम सभी किसानों ने गोबर के खाद का प्रयोग करना चालू किया, तब से मिट्टी की उर्वरता शक्ति भी बढी और जो बंजर भूमि थी, वह भूमि भी उपजाऊ होने लगी। समूह की महिलाओं के बताए गए निर्देश के अनुसार, इस साल जिन किसानों ने अपनी फसल इस जैविक खाद से तैयार की उन्हें अच्छा-खासा मुनाफा हुआ है। समूह की महिलाओं का कहना है कि, किसानों को हमेशा फसल के लिए 'जैविक खाद' का ही प्रयोग करना चाहिए। और श्री विधि लाइन विधि और कतार विधि के द्वारा, फसल उत्पादन करना चाहिए, ताकि उन्हें अच्छी फसल प्राप्त हो सके।


आइए जाने श्री विधि लाइन विधि क्या है?


श्री विधि में रस्सी के द्वारा फसल तैयार करना और 1 मीटर की दूरी में फसल को लगाया जाता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हो और फसल को पानी की जो कमी होती है, वह कम हो। अगर रस्सी के द्वारा, फसल तैयार किया जाता है, तो फसल अपना फैलाव बहुत दूर तक कर सकता है। जिससे उसमें और भी ज्यादा फल लगने का, आसार बढ़ जाता है। अगर हम इस खाद को फसलों में डाले तो, खाद बहुत अच्छी तरह से पौधों की जड़ों में अवशोषित होगा। फसल को पोषक तत्व की प्राप्ति बहुत अच्छी तरह से होगी, साथ ही साथ पारिस्थितिक तंत्र में सुधार देखने को मिलता है।


यह जो महिला समूह है, वह अपने कामों के जरिए पहचाने भी जा रहे हैं। अब तो गांव के लोग अपनी फसलों के लिए, महिला समूह से ही खाद उठाते हैं। इससे महिला समूह को भी मुनाफा होता है, साथ-साथ महिला समूह की महिलाएं, गौठान में स्वयं के द्वारा साग-सब्जी व बाड़ी लगाने का काम करती हैं। और वे भी अपने हाथों से बनाए गए खाद का ही प्रयोग, स्वयं अपने सब्जियों के लिए करते हैं और उसे बाजारों में भी बिक्री करते हैं। जिससे महिला समूह को बहुत ही अच्छी-खासी आमदनी भी प्राप्त हो जाती है। इस तरह से हाथों से बनाया गए खाद में, किसी भी तरह का कोई खास खर्च नहीं होता और न ही नुकसान देखने को मिलता है। कहा जाए तो यह सरल व सस्ता जैविक खाद है, जिसे सभी किसानों को अपनाना चाहिए और अपनी मिट्टी के उर्वरक शक्ति को बढ़ाने के साथ-साथ अपनी फसलों में भी बढ़ोतरी करनी चाहिए।


हमारे गांव में लगभग 50% लोग ही जैविक खाद का प्रयोग कर, फसल तैयार करते हैं। और हमारे गांव में, कुछ सालों से सभी किसानों को बहुत ही ज्यादा फायदा हुआ है। यहां सभी किसानों का कहना है कि, वे अब अपने फसलों के लिए, सिर्फ जैविक खाद का ही प्रयोग करेंगे।


नोट: यह लेख Adivasi Awaaz प्रोजेक्ट के अंतर्गत लिखा गया है, जिसमें ‘प्रयोग समाजसेवी संस्था’ और ‘Misereor’ का सहयोग है।


Comments


bottom of page